Mood of The Nation: नौकरी या शिक्षा... Gen-Z के लिए सबसे बड़ा मुद्दा क्या है? पढ़ें- देश का मिजाज

इंडिया टुडे के 'मूड ऑफ द नेशन' (MOTN) सर्वे में जेन-जी के रुख और देश के बदलते मूड को समझने की कोशिश की गई है. जेन-जी प्रोटेस्ट के बाद यह अब तक का सबसे बड़ा सर्वे है. इसमें रोजगार से लेकर CJP के चुनाव लड़ने जैसे मुद्दों पर सवाल पूछे गए हैं.

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सर्वे का फोकस मौजूदा हालात से लेकर आने वाले चुनाव तक के सवालों पर है (Photo: ITG) सर्वे का फोकस मौजूदा हालात से लेकर आने वाले चुनाव तक के सवालों पर है (Photo: ITG)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 27 अगस्त 2026,
  • अपडेटेड 8:10 PM IST

इंडिया टुडे और सी-वोटर के 'मूड ऑफ द नेशन' (MOTN) सर्वे में देश की बदलती राजनीतिक और सामाजिक बयार का बड़ा आकलन सामने आया है. हालिया 'Gen-Z' प्रोटेस्ट के बाद किया गया यह अब तक का सबसे बड़ा और व्यापक सर्वे है, जिसमें युवाओं और आम जनता की नब्ज टटोलने की कोशिश की गई है. इस सर्वे में देश के मूड को लेकर कई अहम सवाल पूछे गए हैं. सर्वे का फोकस मौजूदा हालात से लेकर आने वाले चुनाव तक के सवालों पर है. 

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नौकरी या शिक्षा, बड़ा मुद्दा क्या?

सर्वे में जब देश के GenZ से पूछा गया कि अभी उनके लिए सबसे अहम मुद्दा क्या है, तो सबसे बड़ी संख्या में उन्होंने नौकरी को चुना. 53 प्रतिशत युवाओं ने साफ कहा कि रोजगार ही उनकी सबसे बड़ी चिंता है. इसके बाद 22 प्रतिशत ने शिक्षा को अपना सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा बताया. रहन-सहन का खर्च यानी महंगाई 12 प्रतिशत युवाओं के लिए सबसे बड़ा मुद्दा निकला, जबकि मानसिक स्वास्थ्य को सिर्फ 4 प्रतिशत ने प्राथमिकता दी. 

ये आंकड़े स्पष्ट रूप से दिखाते हैं कि बेरोजगारी की समस्या युवाओं के मन में बाकी सब मुद्दों से ऊपर है.

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युवाओं को उपलब्ध मौके पर क्या राय है?

सर्वे में युवाओं से यह भी पूछा गया कि देश में उन्हें उपलब्ध मौकों को लेकर उनकी क्या राय है. जवाब में 32 प्रतिशत युवाओं ने कहा कि कठिन मेहनत और प्रतिभा आज भी मायने रखती है. 26 प्रतिशत का मानना था कि असल में पैसा और संपर्क ही काम आते हैं. 22 प्रतिशत युवाओं ने यह राय रखी कि देश में बहुत कम मौके उपलब्ध हैं, जबकि 14 प्रतिशत का कहना था कि मौके तो हैं लेकिन वे चुनिंदा क्षेत्रों तक ही सीमित हैं.

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रोजगार योग्य बनाने की जिम्मेदारी किसकी?

जब युवाओं से पूछा गया कि उन्हें रोजगार योग्य बनाने की जिम्मेदारी सबसे ज्यादा किसकी है, तो भारी बहुमत ने केंद्र और राज्य सरकारों का नाम लिया. 63 प्रतिशत युवाओं का मानना है कि रोजगार योग्य बनाने की मुख्य जिम्मेदारी केंद्र-राज्य सरकारों की है. 

इसके बाद 14 प्रतिशत ने स्कूल-कॉलेज को जिम्मेदार ठहराया, 9 प्रतिशत ने निजी नियोक्ताओं को और सिर्फ 5 प्रतिशत ने आम लोगों व परिवार को इस जिम्मेदारी का हिस्सा माना. ये आंकड़े बताते हैं कि युवा रोजगार के मामले में सबसे ज्यादा सरकार पर निर्भर हैं.

अभी सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता क्या होनी चाहिए?

सर्वे में लोगों से यह भी पूछा गया कि अभी सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता क्या होनी चाहिए. सबसे ज्यादा 23 प्रतिशत लोगों ने शिक्षा और स्वास्थ्य में सुधार को प्राथमिकता दी. 21 प्रतिशत ने बुनियादी ढांचा और पूंजीगत खर्च बढ़ाने की बात कही. 18 प्रतिशत का मत था कि सभी क्षेत्रों को बराबर प्राथमिकता दी जाए, जबकि 16 प्रतिशत ने सीधे परिवारों को मदद पहुंचाने की वकालत की. टैक्स घटाने की मांग 8 प्रतिशत लोगों ने की और सामाजिक सद्भाव बढ़ाने को सिर्फ 4 प्रतिशत ने सर्वोच्च प्राथमिकता बताया. 

इससे साफ है कि शिक्षा-स्वास्थ्य और इंफ्रास्ट्रक्चर अभी भी जनता की नजर में सबसे ऊपर हैं.

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यह भी पढ़ें: Mood of The Nation: सीजेपी अगर चुनाव लड़ी तो क्या वोट करेंगे? सर्वे में मिला ये जवाब

CJP को चुनाव भी लड़ना चाहिए?

एमओटीएन सर्वे में छात्रों के नए संगठन सीजेपी को लेकर भी दिलचस्प नतीजे आए. जब पूछा गया कि सीजेपी प्रेशर ग्रुप बने रहना चाहता है तो आप क्या कहेंगे, तो 39 प्रतिशत लोगों ने कहा कि वह केवल प्रेशर ग्रुप ही बने रहें. वहीं 26 प्रतिशत का मत था कि सीजेपी को चुनाव भी लड़ना चाहिए.

सीजेपी चुनाव लड़े तो क्या आप उसे वोट देंगे?

आगे जब यह सवाल पूछा गया कि अगर सीजेपी चुनाव लड़े तो क्या आप उसे वोट देंगे, तो 33 प्रतिशत लोगों ने हां कहा. वहीं 43 प्रतिशत लोगों ने नकारात्मक जवाब दिया. ये आंकड़े दिखाते हैं कि सीजेपी को लेकर जनता में दिलचस्पी तो है, लेकिन अभी वह व्यापक चुनावी समर्थन जुटाने की स्थिति में नहीं दिख रही. 

भारत में चुनावों को स्वतंत्र और निष्पक्ष मानते हैं?

जब लोगों से पूछा गया कि क्या वे भारत में चुनावों को स्वतंत्र और निष्पक्ष मानते हैं, तो सकारात्मक जवाब देने वालों की संख्या लगातार घटती दिख रही है. अगस्त 2025 में 64 प्रतिशत लोग चुनावों को स्वतंत्र और निष्पक्ष मानते थे, जो जनवरी 2026 में घटकर 57 प्रतिशत रह गई और अगस्त 2026 में और कम होकर 52 प्रतिशत हो गई. 

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वहीं नकारात्मक जवाब देने वालों का प्रतिशत बढ़ता गया. अगस्त 2025 में 32 प्रतिशत लोग चुनावों को स्वतंत्र-निष्पक्ष नहीं मानते थे, जो जनवरी 2026 में 37 प्रतिशत और अगस्त 2026 में 41 प्रतिशत पहुंच गया. ये आंकड़े चुनाव प्रक्रिया पर जनता के विश्वास में गिरावट का संकेत देते हैं.

यह भी पढ़ें: बेरोजगारी या महंगाई, देश की सबसे बड़ी समस्या क्या है? सर्वे में जनता ने दिया जवाब

चुनाव आयोग पर बढ़ा या घटा लोगों का विश्वास?

सर्वे में चुनाव आयोग में विश्वास को लेकर भी सवाल पूछा गया. 43 प्रतिशत लोगों ने कहा कि चुनाव आयोग में उनका विश्वास बढ़ा है, जबकि 38 प्रतिशत का मानना था कि विश्वास घटा है. 9 प्रतिशत लोगों ने कहा कि इसमें कोई अंतर नहीं आया. इससे साफ है कि चुनाव आयोग को लेकर जनता की राय लगभग बंटी हुई है, हालांकि थोड़ी अधिक संख्या विश्वास बढ़ने की बात कह रही है.

आज भारत की सबसे बड़ी समस्या क्या है?

एमओटीएन सर्वे में आज भारत की सबसे बड़ी समस्या क्या है, इस सवाल पर भी जवाब आए. गरीबी को 5 प्रतिशत लोगों ने सबसे बड़ी समस्या बताया, भ्रष्टाचार को भी 5 प्रतिशत ने चुना, जबकि महिला सुरक्षा को 4 प्रतिशत लोगों ने देश की सबसे बड़ी समस्या करार दिया. 

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कुल मिलाकर यह मूड ऑफ द नेशन सर्वे देश के मौजूदा मिजाज को दर्शाता है. युवा रोजगार के लिए सरकार को सबसे ज्यादा जिम्मेदार मान रहे हैं, आम लोग शिक्षा-स्वास्थ्य और इंफ्रा को प्राथमिकता दे रहे हैं और नए राजनीतिक प्रयोगों को लेकर सतर्क लेकिन जिज्ञासु रुख अपनाए हुए हैं.

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