सोचिए, आप लद्दाख के बर्फीले पहाड़ों के बीच हैं. चारों तरफ सन्नाटा है. दूर तक फैली चट्टानें हैं. ठंडी हवा चल रही है. तभी अचानक एक चट्टान के पीछे कुछ हलचल होती है. आप दूरबीन लगाकर देखते हैं. बर्फीले पहाड़ों का एक ऐसा शिकारी सामने आता है, जिसे देख पाना आसान नहीं होता. लंबे बालों वाली पूंछ, धब्बेदार शरीर और पहाड़ों पर ऐसे चलने की कला कि नजरें पीछा करती रह जाएं.
ये है स्नो लेपर्ड यानी हिम तेंदुआ... अब लद्दाख में इस दुर्लभ वन्यजीव को उसके प्राकृतिक ठिकाने पर देखने के लिए एक खास सफारी शुरू की गई है. 8 सितंबर को लद्दाख के उपराज्यपाल विनय कुमार सक्सेना ने छह गाड़ियों को हरी झंडी दिखाकर रवाना किया. यह भारत की पहली हाई-एल्टीट्यूड वाइल्डलाइफ सफारी है. इसके पीछे वन्यजीव संरक्षण, स्थानीय लोगों के रोजगार और लद्दाख के नाजुक पर्यावरण को बचाने की एक बड़ी प्लानिंग है.
आखिर ये सफारी कैसे काम करेगी, हिम तेंदुए कहां दिख सकते हैं और इससे लद्दाख के लोगों को क्या फायदा होने वाला है... समझिये पूरी कहानी... लद्दाख में स्नो लेपर्ड सफारी की शुरुआत रुमबक, शांग और उले जैसे इलाकों से की गई है. इन जगहों पर हिम तेंदुओं के दिखाई देने की संभावना रहती है.
यह भी पढ़ें: तीन महीने बाद खुले रणथंभौर के दरवाजे, तिलक-माला से हुआ स्वागत... पहले दिन ही जंगल सफारी के लिए उमड़े पर्यटक
इसके अलावा, हेमिस नेशनल पार्क, चांगथांग और काराकोरम वाइल्डलाइफ सैंक्चुअरी समेत कई क्षेत्रों में सफारी के लिए उपयुक्त रास्ते तय किए जाएंगे. योजना में नुब्रा, जांस्कर, शाम, कारगिल और द्रास जैसे इलाके भी शामिल हैं. सफारी के लिए खास गाड़ियां तैयार की गई हैं, जिनका पिछला हिस्सा खुला होगा. इनके साथ स्थानीय ड्राइवर और प्रशिक्षित वन्यजीव गाइड मौजूद रहेंगे.
इसका मतलब यह नहीं है कि टिकट लेकर गाड़ी में बैठते ही हिम तेंदुआ दिख जाएगा. वह जंगली जानवर है. उसका अपना इलाका है, अपनी दिनचर्या है. वह पर्यटकों के सामने आएगा या नहीं, इसकी गारंटी नहीं दी जा सकती. ऐसी सफारी में गाइड की भूमिका अहम होती है.
भारत के 718 हिम तेंदुओं में से 477 लद्दाख में
आखिर हिम तेंदुए को देखने के लिए लद्दाख पर इतना जोर क्यों दिया जा रहा है? भारत में हिम तेंदुओं की अनुमानित आबादी 718 है. इनमें से 477 लद्दाख में हैं. यानी देश में दर्ज अनुमानित आबादी का बड़ा हिस्सा इसी इलाके में है. हिम तेंदुआ ऊंचे पहाड़ी इलाकों में रहने वाला एक दुर्लभ शिकारी है. उसका धूसर-सफेद फर और शरीर पर बने काले धब्बे उसे चट्टानी पहाड़ों के बीच छिपने में मदद करते हैं. लद्दाख में स्तनधारियों की 38 से ज्यादा प्रजातियां, पक्षियों की 340 से अधिक प्रजातियां और संवहनी पौधों की करीब 1,800 प्रजातियां हैं.
यहां की जैव विविधता काफी समृद्ध है. लेकिन इतनी ही नाजुक भी है. अगर पर्यटन के नाम पर गाड़ियों को मनमाने तरीके से पहाड़ों पर दौड़ाया जाए, जानवरों के पीछे भीड़ लगा दी जाए या उनके रहने की जगह में दखल दिया जाए, तो नुकसान भी हो सकता है.
सफारी शुरू करने की जरूरत क्यों पड़ी?
लद्दाख में पर्यटकों की दिलचस्पी लगातार उसके पहाड़ों, घाटियों और अनोखे प्राकृतिक नजारों में रही है. लेकिन वन्यजीवों को देखने के लिए अगर हर कोई अपनी गाड़ी लेकर जहां चाहे वहां पहुंचने लगे, तो परेशानी हो सकती है. अवैध ऑफ-रोडिंग, वाहनों का शोर और वन्यजीवों के करीब जाने की कोशिश उनके प्राकृतिक व्यवहार को प्रभावित कर सकती है.
इसी समस्या से निपटने के लिए प्रशासन ने नियंत्रित सफारी का मॉडल तैयार किया. इसके तहत तय रास्तों पर गाड़ियां चलेंगी, प्रशिक्षित गाइड पर्यटकों के साथ रहेंगे और वन्यजीवों को परेशान करने वाली एक्टिविटी रोकने पर जोर दिया जाएगा.
इस पहल को स्नो लेपर्ड एंड हाई-एल्टीट्यूड नेचर कंजर्वेशन यानी SHAN सोसाइटी, लद्दाख के वन, पारिस्थितिकी और पर्यावरण विभाग के सहयोग से शुरू कर रही है. प्रशासन का कहना है कि सफारी का मकसद सिर्फ ज्यादा पर्यटक बुलाना नहीं है. कोशिश ऐसी व्यवस्था बनाने की है, जिसमें पर्यटन से कमाई भी हो और वन्यजीवों के संरक्षण पर भी असर न पड़े.
यह भी पढ़ें: असम के जंगलों में फिर लौटी रौनक... मानस-काजीरंगा में सफारी शुरू... पोबितोरा भी इसी महीने खुलेगा
इस योजना का दूसरा पहलू समझिए. मान लीजिए किसी पर्यटक को हिम तेंदुआ देखने लद्दाख आना है. उसे गाड़ी चाहिए, रास्तों की जानकारी चाहिए और ऐसा गाइड चाहिए, जिसे इलाके की अच्छी समझ हो. यानी सफारी शुरू होने से स्थानीय ड्राइवरों, गाइडों और पर्यटन से जुड़े कारोबारियों के लिए काम के अवसर पैदा होंगे.
उपराज्यपाल विनय कुमार सक्सेना ने कहा कि पर्यटन और पर्यावरण संरक्षण को साथ लेकर चलना जरूरी है. प्रशासन का जोर ऐसे पर्यटन मॉडल पर है, जिसमें स्थानीय लोगों की आजीविका बेहतर हो और लद्दाख के नाजुक पारिस्थितिकी तंत्र को नुकसान भी न पहुंचे.
लद्दाख में संरक्षण को रोजगार से जोड़ने की कोशिश केवल सफारी तक सीमित नहीं है. वाइल्डलाइफ वीक 2026 के दौरान प्रशासन ने बताया कि 20 स्थानीय युवाओं को पक्षियों की पहचान करने, बर्डवॉचिंग और पक्षियों को देखने से जुड़ी ट्रेनिंग दी जा रही है. युवाओं को दूरबीन भी मिलेगी. इसके अलावा, पक्षियों को देखने के लिए प्रमुख स्थानों पर विशेष ठिकाने तैयार करने प्लानिंग है. इससे स्थानीय युवा बर्ड गाइड, नेचर गाइड और इको-टूरिज्म से जुड़े उद्यमी के तौर पर काम कर सकेंगे.
इस कार्यक्रम में महिलाओं के रोजगार से जुड़ी एक पहल भी सामने आई. वाइल्ड एनिमल फेल्टिंग प्रोग्राम के तहत तुर्तुक, फोटोक्सर, संग्रह, चुशुल और शारगोल की 50 महिलाओं को शामिल किया गया है. इसमें स्थानीय ऊन और पारंपरिक कौशल को संरक्षण से जुड़े प्रोडक्ट और कारोबार से जोड़ने की कोशिश की जा रही है. प्रशासन का जोर इन उत्पादों की डिजाइनिंग, ब्रांडिंग, बाजार तक पहुंच और ऑनलाइन बिक्री को मजबूत करने पर है.
AI से मानव-वन्यजीव संघर्ष रोकने की तैयारी
इसी कार्यक्रम में एक और पहल सामने आई. कारगिल के वन्यजीव प्रभाग ने यूनिवर्सिटी ऑफ लद्दाख के कारगिल कैंपस के तकनीकी सहयोग से तैयार AI आधारित मानव-वन्यजीव संघर्ष कम करने वाला मॉडल पेश किया गया. कार्यक्रम के दौरान हिमालयन ब्राउन बियर पर बनी डॉक्यूमेंट्री जारी की गई.
SHAN सोसाइटी के वन्यजीव पर्यटन पैकेजों की पुस्तिका भी लॉन्च की गई. लद्दाख ब्लैक-नेक्ड क्रेन फेस्टिवल के दूसरे एडिशन का ऐलान किया गया. इसके अलावा, 50 स्कूलों में इको क्लबों के जरिए पर्यावरण शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए सहायता राशि से जुड़े चेक भी सौंपे गए. यानी योजना का दायरा सिर्फ पर्यटक को हिम तेंदुआ दिखाने से कहीं आगे है. इसमें पर्यावरण शिक्षा, स्थानीय रोजगार और इंसानों तथा वन्यजीवों के बीच टकराव कम करने की कोशिशें भी शामिल हैं.
लद्दाख में स्नो लेपर्ड सफारी शुरू होना एक दिलचस्प है. इससे पर्यटकों को दुर्लभ वन्यजीवों को देखने का मौका मिल सकता है और स्थानीय लोगों के लिए रोजगार के नए रास्ते खुल सकते हैं. लेकिन इसका दूसरा पहलू भी है. अगर पर्यटकों की संख्या जरूरत से ज्यादा बढ़ी, गाड़ियां वन्यजीवों के बहुत करीब पहुंचीं या कचरे और प्लास्टिक पर कंट्रोल नहीं रहा, तो जिस प्रकृति को देखने लोग आएंगे, उसी को नुकसान पहुंच सकता है. इसलिए प्रशासन ने पर्यटकों की संख्या, तय रास्तों, वन्यजीवों पर पड़ने वाले प्रभाव, कचरा प्रबंधन और प्लास्टिक प्रदूषण को कंट्रोल करने पर जोर दिया है.
अब असली परीक्षा इन नियमों को जमीन पर लागू करने की होगी. क्योंकि हिम तेंदुए की सफारी का मतलब सिर्फ एक दुर्लभ जानवर की तस्वीर लेकर लौट जाना नहीं है. इसका असली मकसद उस पूरे पर्यावरण को सुरक्षित रखना है, जिसमें वह जानवर जीवित रह सकता है.
अशरफ वानी