केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने अरुणाचल प्रदेश में चीन के नए कब्जे की खबरों को खारिज किया है. हालांकि, उन्होंने माना कि सीमावर्ती इलाकों में चराई की जमीन तक पहुंच को लेकर स्थानीय लोगों की चिंता जायज है. उन्होंने कहा कि जिस अवैध चीनी मौजूदगी की बात की जा रही है, वह नई नहीं है और इसका इतिहास 1959 तक जाता है.
इंडिया टुडे को दिए एक्सक्लूसिव इंटरव्यू में अरुणाचल प्रदेश से आने वाले रिजिजू ने कहा कि अरुणाचल में चीन की ओर से कोई नया कब्जा नहीं हुआ है. उन्होंने उन खबरों को भी खारिज किया, जिनमें दावा किया गया था कि चीनी सैनिक राज्य की चीन से लगी संवेदनशील सीमा पर कुछ अहम जगहों पर भारतीय सैनिकों को गश्त करने से रोक रहे हैं.
रिजिजू ने कहा कि स्थानीय लोगों की चराई से जुड़ी चिंताएं सामने आने की एक वजह यह भी है कि 2014 के बाद नरेंद्र मोदी सरकार ने सीमावर्ती इलाकों में बुनियादी ढांचे के विकास की रफ्तार तेज की है. उनके मुताबिक, चीन ने जिन इलाकों में पहले सड़क और अन्य बुनियादी ढांचा बनाया था, वहां भारत की ओर से उस समय ऐसी सुविधाएं नहीं थीं. इसी पुराने घटनाक्रम से जुड़ी चिंताएं अब सामने आ रही हैं.
उन्होंने साफ कहा, 'राज्य में चराई को लेकर स्थानीय लोगों की चिंताएं जायज हैं, लेकिन अरुणाचल प्रदेश में चीन का कोई नया कब्जा नहीं हुआ है.'
अरुणाचल प्रदेश को चीन अपना हिस्सा बताता है और इसे ‘जांगनान’ कहता है. भारत चीन के इस दावे को लगातार खारिज करता रहा है.
रिजिजू का यह बयान ऐसे समय आया है जब 2020 में गलवान घाटी में हुई हिंसक झड़प के बाद भारत और चीन के रिश्तों में तनाव रहा है. गलवान संघर्ष में 20 भारतीय सैनिकों, जिनमें एक कमांडिंग ऑफिसर भी शामिल थे, की जान गई थी. कई चीनी सैनिक भी मारे गए थे. हाल के समय में दोनों देशों के रिश्तों में कुछ सुधार के संकेत मिले हैं.
CJP प्रदर्शन में पुलिस की कार्रवाई पर क्या बोले
दिल्ली के जंतर-मंतर पर NEET-UG पेपर लीक के खिलाफ हुए Gen Z आंदोलन के दौरान पुलिस पर लगे अत्यधिक बल प्रयोग के आरोपों को भी रिजिजू ने खारिज किया. उन्होंने कहा कि प्रदर्शनकारियों को बड़े पैमाने पर चोटें नहीं आई थीं.
संसद का मॉनसून सत्र 13 अगस्त को अनिश्चितकाल के लिए स्थगित होने के एक दिन बाद दिए इंटरव्यू में रिजिजू ने कहा कि विपक्ष ने प्रदर्शनकारियों के खिलाफ अत्यधिक बल प्रयोग और कथित तौर पर पेलेट गन के इस्तेमाल को लेकर सरकार से जवाब मांगा था.
इंडिया टुडे ने अपनी रिपोर्ट में बताया था कि 20 जुलाई को संसद मार्च में शामिल 25 वर्षीय एक प्रदर्शनकारी के शरीर पर करीब 20 पेलेट के निशान मिले थे. मेडिकल रिकॉर्ड के मुताबिक उसकी पीठ और कोहनी पर पेलेट से चोटें आई थीं. एक अन्य प्रदर्शनकारी की आंख में गंभीर चोट लगने की भी रिपोर्ट सामने आई थी. हालांकि दिल्ली पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को तितर-बितर करने के लिए पेलेट गन के इस्तेमाल से इनकार किया था.
‘पेलेट गन चली होती तो कितने लोग घायल होते?’
पेलेट गन के इस्तेमाल से जुड़े सवाल पर रिजिजू ने कहा कि पेलेट गन में एक गोली नहीं बल्कि कई पेलेट होते हैं. उन्होंने सवाल किया कि अगर हजारों लोगों के प्रदर्शन के दौरान पेलेट गन का इस्तेमाल हुआ होता तो कितने लोग घायल होते. उन्होंने कहा कि अगर 4,000-5,000 लोग एक जगह प्रदर्शन कर रहे हों और पेलेट गन चलाई जाए तो कम से कम 300-400 लोग घायल होने चाहिए.
सुप्रीम कोर्ट में पेलेट गन के कथित इस्तेमाल को लेकर लंबित याचिकाओं पर उन्होंने कहा कि अदालत पहले मामले की जांच करेगी और फिलहाल इस पर कुछ कहना उचित नहीं होगा.
रिजिजू ने पिछली कांग्रेस सरकारों के दौरान कश्मीर में पेलेट गन के इस्तेमाल का भी जिक्र किया. उन्होंने कहा कि कांग्रेस के शासनकाल में कई जगहों पर पेलेट गन का इस्तेमाल हुआ था.
संसद मार्च के दौरान पुलिस की कार्रवाई का बचाव करते हुए रिजिजू ने कहा कि करीब 30-40 हजार लोग संसद की ओर मार्च कर रहे थे. ऐसे में पुलिस की जिम्मेदारी थी कि उन्हें संसद तक पहुंचने से रोके. उन्होंने सवाल किया कि इतनी बड़ी भीड़ को रोकने के लिए पुलिस को बल प्रयोग नहीं करना चाहिए था क्या?
बिल पर विपक्षी सांसदों ने मुझसे बात करने को कहा: रिजिजू
संसदीय कार्य मंत्री ने संसद के मॉनसून सत्र के दौरान विपक्ष के साथ गतिरोध को लेकर भी बड़ा दावा किया. रिजिजू ने कहा कि विपक्ष के कई सांसदों ने निजी तौर पर उनसे संपर्क कर राहुल गांधी, अखिलेश यादव और दूसरे वरिष्ठ नेताओं से बात करने को कहा था, ताकि FCRA, परिसीमन और महिला आरक्षण जैसे अहम विधेयकों पर संसद में चर्चा हो सके.
इंटरव्यू में रिजिजू ने कहा कि कई विपक्षी सांसद उनसे कहते थे कि वे राहुल गांधी और अखिलेश यादव से बात करें, क्योंकि वे विधेयकों पर चर्चा करना चाहते थे, लेकिन उनके नेता उन्हें बोलने का मौका नहीं दे रहे थे.
उन्होंने सरकार पर बिना चर्चा के विधेयक पारित कराने के आरोपों को खारिज किया. रिजिजू ने कहा कि विधेयक पेश करने से पहले बिजनेस एडवाइजरी कमेटी को जानकारी दी गई, चर्चा के लिए समय दिया गया और विपक्षी दलों से बातचीत भी की गई.
‘विपक्ष ही असली नुकसान में रहा’
मॉनसून सत्र में दोनों सदनों से 12 विधेयक पारित हुए, लेकिन खासकर लोकसभा में इन पर चर्चा बेहद सीमित रही. रिजिजू ने माना कि संसदीय नजरिए से सत्र उम्मीद के मुताबिक नहीं रहा.
उन्होंने कहा कि एक सांसद के तौर पर वह चाहते हैं कि विधेयकों की पूरी जांच हो और हर सदस्य को अपनी बात रखने के लिए पर्याप्त समय मिले. उन्होंने कहा कि इस स्थिति में असल नुकसान विपक्ष का हुआ, क्योंकि वह सदन के रिकॉर्ड में अपनी बात नहीं रख पाया.
रिजिजू ने कहा कि सरकार का विधायी एजेंडा पूरा हुआ, लेकिन कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस जैसे प्रमुख विपक्षी दलों के लोकसभा में चर्चा से दूर रहने के कारण सार्थक बहस नहीं हो सकी. हालांकि, कुछ विपक्षी दलों ने राज्यसभा की चर्चाओं में हिस्सा लिया.
महिला आरक्षण और परिसीमन पर सरकार ने नहीं बनाया दबाव
महिला आरक्षण और परिसीमन विधेयकों पर रिजिजू ने कहा कि दोनों संवैधानिक संशोधन से जुड़े विधेयक हैं और इन्हें पारित करने के लिए दो-तिहाई बहुमत की जरूरत होती है.
उन्होंने कहा कि सरकार के पास संख्या होने के बावजूद उसने इन विधेयकों को पारित कराने पर जोर नहीं दिया, क्योंकि पार्टियों के भीतर और ज्यादा चर्चा की जरूरत थी. उन्होंने स्पष्ट किया कि सरकार ने कभी दावा नहीं किया था कि इन दोनों विधेयकों को मॉनसून सत्र में ही पारित कराया जाएगा.
FCRA बिल को JPC के पास भेजने पर भी सफाई
विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026 (FCRA) को लेकर रिजिजू ने कहा कि सरकार ने विपक्ष की चिंताओं को देखते हुए इसे संयुक्त संसदीय समिति (JPC) के पास भेजने पर सहमति दी, जबकि सरकार के पास इसे पारित कराने के लिए संख्या मौजूद थी.
उन्होंने कहा कि समिति में विधेयक की विस्तृत जांच हो सकेगी. रिजिजू ने इस आरोप को भी खारिज किया कि विधेयक अल्पसंख्यकों को निशाना बनाता है. उन्होंने विपक्षी नेताओं को चुनौती दी कि वे विधेयक की ऐसी कोई धारा बताएं जो अल्पसंख्यकों के साथ भेदभाव करती हो.
NEET पेपर लीक और छात्रों के प्रदर्शन को लेकर भी उन्होंने कहा कि सरकार संसद में चर्चा के लिए तैयार थी, लेकिन विपक्ष 20 जुलाई की घटना पर विशेष जवाब चाहता था और व्यापक चर्चा में शामिल होने के लिए तैयार नहीं था.
13 अगस्त को खत्म हुए मॉनसून सत्र में 12 विधेयक पारित हुए. इनमें सार्वजनिक परीक्षाओं, जन्म-मृत्यु पंजीकरण, सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों की संख्या, कराधान, बैंकिंग रिकॉर्ड, न्यायाधिकरण, खनन, सहकारी विकास और केरल का नाम बदलने से जुड़े विधेयक शामिल थे.
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक लोकसभा अपनी निर्धारित अवधि के करीब 19 प्रतिशत समय ही काम कर सकी. 12 में से 11 विधेयक लोकसभा में बिना पर्याप्त चर्चा के पारित हुए.
रिजिजू ने कहा कि सरकार बातचीत के लिए तैयार है और उम्मीद है कि आगामी शीतकालीन सत्र में संसद में फिर से व्यापक और सार्थक बहस होगी. दूसरी ओर, विपक्ष का आरोप है कि मॉनसून सत्र में संसदीय निगरानी और जवाबदेही को गंभीर नुकसान पहुंचा है.
मारिया शकील