Facial Recognition कैसे करती है काम, चेहरा देखते ही कच्चा-चिट्ठा खोलने वाली तकनीक कितनी भरोसेमंद?

फशियल रिकग्निशन करने वाली मशीन किसी चेहरे की उस तरह पहचान नहीं करती है जैसे इंसान पहचानते हैं. बल्कि ये उस चेहरे की विशेषताओं को आंकड़ों में बदलकर उसकी गिनती करती है कि यह दू्सरी तस्वीर से कितनी मिलती है.

Advertisement
कैसे फैशियल रिकग्निशन सिस्टम काम करता है कैसे फैशियल रिकग्निशन सिस्टम काम करता है

बिदिशा साहा

  • नई दिल्ली,
  • 05 सितंबर 2026,
  • अपडेटेड 4:42 PM IST

दिल्ली पुलिस की फेशियल रिकग्निशन टेक्नोलॉजी (FRT) एक बार फिर जांच के दायरे में आ गई है. हाल ही में जंतर-मंतर पर हुए 'कॉकरोच जनता पार्टी' (CJP) के प्रदर्शन में विपक्ष ने फेशियल रिकग्निशन टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल किए जाने को लेकर सवाल उठाए थे. मीडिया में भी फेशियल रिकॉग्निशन टेक्नोलॉजी की कमियों को लेकर सवाल उठाया गया था. 

दिल्ली पुलिस का कहना है कि फेशियल रिकग्निशन सिस्टम अपने आप की पहचान नहीं करता बल्कि संभावित मैच मिलने पर एक अलर्ट जारी करता है. जिसके बाद जांचकर्ता उस व्यक्ति की स्वतंत्र रूप से पुष्टि करते हैं. 

Advertisement

दरअसल, मशीन किसी चेहरे की उस तरह पहचान नहीं करती है जैसे इंसान पहचानते हैं. बल्कि ये उस चेहरे की विशेषताओं को आंकड़ों में बदलकर उसकी गिनती करती है कि यह दू्सरी तस्वीर से कितनी मिलती है. अब सवाल खड़े होते हैं कि आखिर ये टेक्नोलॉजी कितनी भरोसेमंद है. और सार्वजनिक जगहों पर लोगों की पहचान करने में कितनी कारगर है और पुलिस इसपर कितना भरोसा कर सकती है?

इंडिया टुडे की ओपन सोर्स इंटेलिजेंस (OSINT) टीम ने रिसर्च पेपर, तकनीकी अध्ययन और अन्य ओपन-सोर्स सामग्री की जांच की ताकि यह समझा जा सके कि फेशियल रिकग्निशन कैसे काम करता है, इसमें कहां गड़बड़ी हो सकती है और भारत में इसके इस्तेमाल से जुड़े कानूनी ढांचे की स्थिति क्या है.

मशीन आपको कैसे देखती है?

इसकी शुरुआत बहुत सरल लगती है. टेक्सास के 'जर्नल ऑफ़ लॉ एंड टेक्नोलॉजी' के मुताबिक, कंप्यूटर में स्टोर की गई तस्वीर असल में आंकड़ों का एक समूह होती है. किसी चेहरे को पहचानने की कोशिश करने से पहले, सॉफ्टवेयर को उस संख्यात्मक ग्रिड में चेहरे का पता लगाना होता है. पुराने जियोमेट्रिक सिस्टम चेहरे के खास बिंदुओं को मापकर ऐसा करते थे, जिसमें आंखों और नाक की सापेक्ष स्थिति और खास विशेषताओं का आकार और रूप शामिल होता था.

Advertisement

फोटोमेट्रिक तकनीकें इस समस्या को एक ही अलग नजरिए से देखती हैं. सिर्फ चेहरे के खास बिंदुओं पर निर्भर रहने के बजाय, फोटोमेट्रिक तकनीकें पूरी तस्वीर के पैटर्न का विश्लेषण करती थीं. ऐसी ही एक तकनीक, 'आइगनफेसेस' (eigenfaces), चेहरों को दिखाने और उनकी तुलना करने के लिए रोशनी और अंधेरे के सांख्यिकीय पैटर्न का इस्तेमाल करती थी.

अब अगर आधुनिक फेशियल रिकग्निशन तकनीक इस फोटोमेट्रिक तकनीक से बहुत आगे निकल गई है. डीप न्यूरल नेटवर्क चेहरे को उस चीज़ में बदलते हैं जिसे रिसर्चर "एम्बेडिंग" (embedding) कहते हैं. यह एक संख्यात्मक फीचर वेक्टर होता है जिसका मकसद ऐसी विशेषताओं को कैप्चर करना होता है जो एक पहचान को दूसरी पहचान से अलग करने में काम आती हैं.

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, दिल्ली पुलिस दिल्ली की ही कंपनी इनेफु लैब्स के फेशियल रिकग्निशन सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल करती है. कंपनी के मुताबिक, गूगल का फेसनेट पहले चेहरे को 128 संख्याओं के एक सेट में बदलता है. वहीं, ArcFace जैसे नए सिस्टम इस तरह बने हैं कि अलग-अलग लोगों के चेहरों के बीच अंतर को साफ करें. 

इसे आसान तरीके से इस तरह समझा जा सकता है कि जैसे गणितीय स्पेस में हर चेहरे को एक खास जगह दी जा रही हो. एक ही इंसान की तस्वीरें आदर्श रूप से एक-दूसरे के करीब होनी चाहिए, जबकि अलग-अलग लोगों की तस्वीरें एक-दूसरे से दूर होनी चाहिए.

Advertisement

2025 में नेशनल इंस्टीट्यूट्स ऑफ़ हेल्थ (NIH) की 'जर्नल ऑफ़ इमेजिंग' में प्रकाशित एक व्यवस्थित समीक्षा के मुताबिक, यह प्रक्रिया पहले चेहरे की विशेषताओं को निकालती है. इसके बाद उसे पहले से मौजूद तस्वीर से मिलाकर संभावित मैच खोजे जाते हैं. फिर देखा जाता है कि मिला हुआ मैचिंग स्कोर तय की गई निश्चित सीमा या थ्रेशोल्ड से ज्यादा है या नहीं.  

थ्रेशोल्ड इसलिए भी जरूरी है क्योंकि फेशियल रिकग्निशन का इस्तेमाल दो अलग-अलग तरीके से किया जा सकता है. आइए इसके बारे में जानते हैं-

वन टू वन वेरिफिकेशन: इसमें दो फोटो की तुलना की जाती है और यह पूछा जाता है कि क्या दो तस्वीरों में एक ही व्यक्ति है. जैसे फोन अनलॉक करने के समय होता है. 

वन टू मैनी सर्च: इसका इस्तेमाल पुलिस के मामलों में होता है. इसमें किसी अनजान चेहरे की तुलना सैकड़ों, हजारों या लाखों तस्वीरों के डेटाबेस से की जा सकती है. 

इनेफु के मुताबिक, पुलिस सिस्टम सिर्फ दो तस्वीरों की तुलना नहीं करता है बल्कि ये एक चेहरे की तस्वीरों की पूरी गैलरी से मिलाता है. गिलरी जितनी बड़ी होगी, उतना ही किसी ऐसे व्यक्ति का नाम संभावित मैच के तौर पर सामने आने की संभावना बढ़ेगी, जिसका उस मामले से कोई लेना-देना ही नहीं हो. यानी फेशियल रिकग्निशन मशीने सीधे नहीं बताती है कि सामने वाला व्यक्ति है कौन, बल्कि यह संभावित उम्मीदवारों की सूची देती है. 

Advertisement

कैसे होती है कि फेशियल रिकग्निशन में गलती? 

अमेरिकी नागरिक क्रिस्टोफर गैटलिन को खराब क्वालिटी की सर्विलांस तस्वीर के आधार पर गलत तरह से एक व्यक्ति से जोड़ दिया गया. इसके बाद उन्हें जेल में 17 महीने बिताने पड़े. फेडरेशन ऑफ अमेरिकन साइंटिस्ट्स (FAS) की एक रिपोर्ट के मुताबिक, पुलिस अधिकारियों ने एल्गोरिदम के नतीजे पर जरूरत से ज्यादा भरोसा किया और दूसरे सबूतों पर उतना ध्यान नहीं दिया. 

रॉबर्ट विलियम्स नामक एक और अमेरिकी को भी इसी तरह गलत तरह से गिरफ्तार किया गया था, जब फेशियल रिकग्निशन ने उन्हें दुकान में चोरी की धुंधली तस्वीर से जोड़ दिया था. 

ऐसे मामले दिखाते हैं कि फेशियल रिकग्निशन लगभग हर चरण में फेल हो सकते हैं- सिस्टम में इमेज के आने से लेकर उस आउटपोट पर इंसान के काम करने के तरीके तक. कई बार कमी तस्वीर में ही होती है.  पासपोर्ट की तस्वीरें सामने से ली गई, समान रोशनी वाली और हाई-रिज़ॉल्यूशन वाली होती हैं. वहीं, CCTV में साइड से, चलते हुए, आंशिक रूप से छिपी हुई भी तस्वीर ले लेता है. कई बार, CCTV में तस्वीर धुंधली या बहुत कम काम के पिक्सल वाली ले सकता है. रिसर्च में लाइटिंग, पोज़, रिज़ॉल्यूशन और रुकावट (ऑक्लूज़न) को गलती के मुख्य कारण बताया गया है.

Advertisement

इसी तरह इनेफू "कैमरा क्वालिटी, पोज़ में बदलाव, लाइटिंग, रुकावट, डेमोग्राफिक अंतर और परफॉर्मेंस पर असर डालने वाले कारकों में 'गैलरी साइज़' भी शामिल है और यह चेतावनी देता है कि, "अगर इनपुट खराब हों, तो सबसे अच्छा मॉडल भी खराब परफॉर्मेंस देता है." 

'वन-टू-मेनी' (एक से कई) सर्च में यह समस्या और मुश्किल हो जाती है, दहां एक चेहरे की तुलना हज़ारों या लाखों स्टोर की गई तस्वीरों से की जाती है. FAS का कहना है कि जैसे-जैसे गैलरी बड़ी होती है, गलत मैच की संभावना भी बढ़ जाती है. यह भी पाया गया है कि कंट्रोल की गई स्थितियों में मापी गई परफॉर्मेंस असल दुनिया की निगरानी से बहुत अलग हो सकती है, जहां पोज़, लाइटिंग और इमेज क्वालिटी को कंट्रोल करना मुश्किल हो जाता है. 

गलतियां आम तौर पर दो तरह की होती हैं. 'फॉल्स नेगेटिव' तब होता है जब सही व्यक्ति की पहचान नहीं हो पाती. 'फॉल्स पॉजिटिव' तब होता है जब दो अलग-अलग लोगों को गलती से एक ही मान लिया जाता है. FAS 'फॉल्स पॉजिटिव' को एक ऐसी गलती के तौर पर बताता है जिसमें सिस्टम "गलती से दो अलग-अलग लोगों को एक ही व्यक्ति बता देता है."

फेशियल रिकग्निशन टेक्नोलॉजी हर जनसांख्यिकीय समूह में एख जैसी सटीक नहीं होतीय फेडरेशन ऑफ अमेरिकन साइंटिस्ट्स(FAS) के मुताबिक, सिस्टम ने पुरुषों के मुकाबले महिलाओं और गोरे लोगों के मुकाबले अश्वेत लोगों के चेहरे की पहचान में ज्यादा गलती की है. 

Advertisement

NIST ने नतीजों में पाया कि सबसे बेहतर प्रदर्शन करने वाले सिस्टम ने 35-50 साल के पूर्वी यूरोपीय पुरुषों की तुलना में 65 साल से ज्यादा उम्र की पश्चिमी अफीक्री महिलाओं के लिए 258 गुना ज्यादा गलत मैच दिए हैं. 

डेटासेट में असंतुलन और डेमोग्राफिक व एनवायरनमेंटल विविधता की कमी इन अंतरों को और बढ़ा सकती है. मास्क, चश्मा, उम्र बढ़ना, जुड़वां बच्चे और करीबी रिश्तेदार भी पहचान को मुश्किल बना सकते हैं. इसके अलावा, अगर असरदार 'लाइवनेस डिटेक्शन' का इस्तेमाल न किया जाए, तो तस्वीरों, स्क्रीन या मास्क का इस्तेमाल करके सिस्टम को धोखा दिया जा सकता है.

हालांकि दिक्कतें सिर्फ तकनीकी गलतियों तक सीमित नहीं है. FAS फेशियल रिकग्निशन को एक सोशियो टेक्निकल सिस्टम मानता है. इसका मतलब है कि तकनीक से होने वाला नुकसान सिर्फ मशीन की गलती पर ही निर्भर नहीं करता.   

कुछ और भी चिंताएं हैं, जैसे सबूतों के अस्पष्ट मानक, बिना सहमति के बड़े पैमाने पर बायोमेट्रिक डेटा एकत्रित करना, कमर्शियल निगरानी और विरोध प्रदर्शनों या सार्वजनिक जगहों पर लगातार स्कैनिंग से पैदा होना वाला डर. इसलिए जो मुख्य दिक्कत है वह कोई खराब एल्गोरिदम नहीं है. बल्कि विश्वसनीयता इमेज, डेटासेट, मॉडल, डेटाबेस के आकार, छेड़छाड़ से सुरक्षा, कानूनी सुरक्षा उपायों और मशीन से मिले संभावित नतीजे  के साथ इंसान क्या करते हैं, इस पर निर्भर करती है.

Advertisement

यह सवाल दिल्ली में इसलिए भी बहुत अहम हो जाता है क्योंकि पुलिस एक खास थ्रेशोल्ड (सीमा) का इस्तेमाल करती है.

दिल्ली पुलिस का 80% थ्रेशोल्ड

2022 में इंटरनेट फ्रीडम फाउंडेशन (IFF) को दिए RTI के जवाब में दिल्ली पुलिस ने बताया था कि 80% से ज्यादा समानता वाले फेशियल मैच को पॉजिटिव रिजल्ट मान लिया जाता है. इससे कम स्कोर वाले मैचों को फॉल्स पॉजिटिव माना जाता था और उनकी आगे जांच की जाती थी.

हालिया विवाद के बाद पुलिस सूत्रों ने यह भी कहा है कि फेशियल रिकग्निशन सिस्टम से मैच मिलने के बाद मोबाइल लोकेशन, अतिरिक्त CCTV फुटेज और दूसरे सबतों के जरिए पहचान की पुष्टि की जाती है कि यह सही है या नहीं. 

लेकिन जंतर मंतर पर CJP के विरोध प्रदर्शन के दौरान पुलिस की ओर से जो दस्तावेज़ जारी किया गया इसमें इस सावधानी का कोई जिक्र नहीं किया गया था. इसमें कहा गया था कि प्रदर्शन में 2873 अपराधी शामिल थे, जिनमें से 2402 की पहचान क्राइम कुंडली और 471 की पहचान डोजियर के जरिए की गई थी. 

इस दस्तावेज में इस बात का जिक्र नहीं था कि इन पहचानों का सिमिलैरिटी स्कोर क्या था, संभावित मैच, फॉल्स पॉजिटिव या बाद में कितनी पहचानों की पुष्टि हुई, इसका भी कोई जिक्र नहीं था. इसके बजाय, इन आंकड़ों को पक्के पहचान के तौर पर पेश किया गया, जिसमें हत्या के मामलों से जुड़े 101 लोग, डकैती या लूट से जुड़े 284 लोग, आर्म्स एक्ट के मामलों से जुड़े 229 लोग और रेप से जुड़े 61 लोग शामिल हैं. 

---- समाप्त ----

Read more!
Advertisement

RECOMMENDED

Advertisement
Latest News in Hindi »