जंतर-मंतर का आंदोलन खत्म हो चुका है, लेकिन इस मुद्दे पर सियासत अभी थमी नहीं है. धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद विपक्ष इसे अपनी बड़ी जीत बता रहा है. राहुल गांधी से लेकर अखिलेश यादव तक का कहना है कि सरकार जनता के दबाव के आगे झुकी है. ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या सड़क पर खत्म हुई यह लड़ाई अब संसद के भीतर नए रूप में दिखाई देगी.
धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद विपक्ष नेता राहुल गांधी ने इसे छात्रों की जीत बताया. उन्होंने कहा कि शिक्षा व्यवस्था लंबे समय से दबाव में है, इसलिए सिर्फ एक इस्तीफा काफी नहीं है. राहुल ने सरकार से शिक्षा व्यवस्था में बदलाव की मांग की. उन्होंने प्रधानमंत्री से माफी मांगने की बात भी दोहराई. उनके बयान से साफ संकेत मिला कि कांग्रेस इस मुद्दे को संसद में लगातार उठाएगी.
वहीं, समाज वादी प्रमुख अखिलेश यादव ने कहा कि छात्रों के आंदोलन ने सरकार को झुकने पर मजबूर कर दिया. उनके मुताबिक यह सिर्फ एक मंत्री के इस्तीफे का मामला नहीं, बल्कि युवाओं की ताकत का संदेश है. उन्होंने दावा किया कि शिक्षा के क्षेत्र में अभी कई बड़े सुधार की जरूरत है. साथ ही 2027 के चुनाव को लेकर भी इसे सकारात्मक संकेत बताया.
विपक्ष में श्रेय लेने की होड़
प्रियंका गांधी ने भी छात्रों को बधाई देते हुए कहा कि जनता ने सरकार को झुकाया है. वहीं अरविंद केजरीवाल ने इसे छात्रों की जीत बताया. जबकि, कांग्रेस नेता पवन खेड़ा ने कहा कि राहुल गांधी काफी समय से युवाओं की आवाज उठा रहे थे, जिसका असर अब दिखाई दे रहा है. इन बयानों के बाद विपक्षी दलों के बीच इस पूरे आंदोलन का राजनीतिक श्रेय लेने की होड़ भी साफ नजर आने लगी है.
शरद पवार ने बातचीत का किया जिक्र
शरद पवार ने कहा कि उन्होंने पहले ही प्रधानमंत्री से बातचीत कर समाधान निकालने की सलाह दी थी. उनका कहना था कि लोकतंत्र में संवाद सबसे जरूरी रास्ता है. उन्होंने सुझाव दिया था कि सरकार वरिष्ठ मंत्रियों की एक टीम बनाकर प्रदर्शनकारियों से बात करे. इसके अलावा, पवार ने भी इस्तीफे को युवाओं की जीत बताया.
सड़क पर प्रदर्शन भले खत्म हो गया हो, लेकिन राजनीतिक लड़ाई अभी बाकी है. सरकार पेपर लीक पर सख्त कानून लाने की तैयारी में है. दूसरी तरफ विपक्ष इसे बड़ा चुनावी और संसदीय मुद्दा बनाने के संकेत दे चुका है. ऐसे में आने वाले दिनों में संसद में शिक्षा व्यवस्था, पेपर लीक और जवाबदेही को लेकर सरकार को विपक्ष के तीखे सवालों का सामना करना पड़ सकता है. अब नजर इस बात पर रहेगी कि बहस सिर्फ इस्तीफे तक सीमित रहती है या शिक्षा व्यवस्था में सुधार पर भी आगे बढ़ती है.
आजतक ब्यूरो