भारत के चीफ जस्टिस (CJI) सूर्यकांत सोमवार को राम जेठमलानी मेमोरियल लेक्चर में पहुंचे. यहां उन्होंने जजों के खिलाफ शिकायतों और न्यायपालिका की जवाबदेही सहित कई मुद्दों पर बातचीत की.
इस दौरान ज्यूडिशियरी में पारदर्शिता और जवाबदेही को लेकर उठाए गए सवालों के बीच CJI ने सवाल उठाया कि क्या जजों के खिलाफ आने वाली हर शिकायत को वेबसाइट पर सार्वजनिक कर देना चाहिए. उन्होंने कहा कि जजों के खिलाफ शिकायतें हर स्तर पर आती हैं. ऐसे में हर शिकायत को पब्लिक करना सही तरीका नहीं हो सकता.
राम जेठमलानी मेमोरियल लेक्चर में बोलते हुए CJI सूर्यकांत ने कहा कि जजों के खिलाफ शिकायतों से निपटने के लिए मौजूदा व्यवस्था पहले से मौजूद है. उन्होंने इसे समय पर काम करने वाली और मजबूत व्यवस्था बताया. हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि न्यायिक संस्थानों में सुधार की गुंजाइश हमेशा बनी रहती है.
‘सुधार व्यवस्था का हिस्सा होना चाहिए’
CJI सूर्यकांत ने कहा कि कोई भी संस्था स्थिर नहीं रह सकती. उसमें समय के साथ सुधार होना जरूरी है. सुधार को नियम बनाया जाना चाहिए. हालांकि, कुछ मुद्दे ऐसे भी होते हैं जिन पर सार्वजनिक मंच से चर्चा करना सही नहीं होता.
दरअसल, CJI की यह ज्यूडिशियरी में पारदर्शिता और जवाबदेही को लेकर उठाए गए सवालों के बीच आई. वरिष्ठ वकील महेश जेठमलानी ने न्यायपालिका पर लोगों के भरोसे को लेकर चिंता जताई. उन्होंने एक India Today-CVoter सर्वे का हवाला दिया. इसमें 48 फीसदी लोगों ने कहा था कि उन्हें ज्यूडिशियरी पर भरोसा नहीं है.
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जेठमलानी ने जजों के खिलाफ आने वाली शिकायतों का एक डेटाबेस बनाने की मांग की. उन्होंने कहा कि हाई कोर्ट, निचली अदालतों और ट्रिब्यूनल के जजों के खिलाफ आई शिकायतों और उनके नतीजों की जानकारी उपलब्ध होनी चाहिए. इससे व्यवस्था में पारदर्शिता बढ़ सकती है.
महेश जेठमलानी ने जस्टिस यशवंत वर्मा से जुड़े कैश विवाद का भी मुद्दा उठाया. उन्होंने सवाल किया कि जस्टिस वर्मा के इस्तीफा देने के बाद भी FIR दर्ज क्यों नहीं की गई. उन्होंने ज्यूडिशियरी में भ्रष्टाचार और जजों को प्रभावित करने वाले कथित ‘फिक्सर वकीलों’ के खिलाफ भी कार्रवाई की जरूरत बताई.
वरिष्ठ वकील हरीश साल्वे ने भी जस्टिस वर्मा मामले पर सवाल उठाए. उन्होंने कहा कि इस मामले में कानून को अपना काम करने देना चाहिए था. जजों के खिलाफ शिकायतों से सुरक्षा का मकसद उन्हें परेशान होने से बचाना था. लेकिन वर्मा मामले में कथित तौर पर नकदी मिलने का मुद्दा अलग था.
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कॉलेजियम सिस्टम पर भी उठाए गए सवाल
कार्यक्रम में कॉलेजियम सिस्टम और न्यायिक सुधार पर भी चर्चा हुई. वकील हरीश साल्वे ने कॉलेजियम व्यवस्था पर सवाल उठाए. उन्होंने कहा कि जजों का जजों को नियुक्त करना सही व्यवस्था नहीं है. उन्होंने NJAC से जुड़े सुप्रीम कोर्ट के फैसले की भी आलोचना की. साल्वे ने कहा कि संस्थानों के बीच संतुलन फिर से कायम करने की जरूरत है.
CJI सूर्यकांत ने कहा कि कॉलेजियम सिस्टम के इतिहास और उसके काम करने के तरीके को लेकर उनके पास कानूनी जवाब हैं. कॉलेजियम और सरकार के बीच कामकाज में बहुत बड़ी रुकावट नहीं है.
वकील हरीश ने सुप्रीम कोर्ट की बढ़ती भूमिका पर भी सवाल उठाया. उनका कहना था कि आम लोगों को छोटी-छोटी समस्याओं के लिए देश की सबसे बड़ी अदालत तक नहीं पहुंचना चाहिए. न्याय लोगों को शुरुआती स्तर पर ही मिलना चाहिए.
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‘भरोसा वही, जहां हारने वाला भी प्रक्रिया को सही माने’
CJI सूर्यकांत ने न्यायपालिका में जनता के भरोसे को लेकर भी अपनी बात रखी. उन्होंने कहा कि जनता का भरोसा और जनता की पसंद एक जैसी चीज नहीं है. कोर्ट का फैसला लोगों की इच्छा के मुताबिक होना जरूरी नहीं है.
उनके मुताबिक, कोर्ट पर भरोसा तब बढ़ता है जब केस हारने वाला व्यक्ति भी यह महसूस करे कि उसके साथ निष्पक्ष प्रक्रिया अपनाई गई. सिर्फ केस जीत जाना किसी कोर्ट को वैधता नहीं देता. निष्पक्ष प्रक्रिया भी उतनी ही जरूरी है.
CJI ने कहा कि संस्थाएं जांच और सवालों का सामना करके ही मजबूत होती हैं. कोर्ट को भी आलोचना और जांच के लिए तैयार रहना चाहिए. CJI ने न्याय तक आसान पहुंच की जरूरत पर भी जोर दिया. उन्होंने कहा कि सिर्फ किसी जिले में कोर्ट का होना पर्याप्त नहीं है. आम आदमी के लिए अदालत तक पहुंचना आसान होना चाहिए.
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उन्होंने कहा कि किसी व्यक्ति के लिए अदालत तक पहुंचना ही आधी लड़ाई नहीं बन जाना चाहिए. लंबे समय से लोगों को भौतिक दूरी और जटिल कानूनी प्रक्रियाओं के कारण परेशानी होती रही है. ऐसे में न्याय व्यवस्था को आम लोगों के लिए और आसान बनाने की जरूरत है.
अनीषा माथुर