'गरिमा, स्वतंत्रता और समानता टेक्नोलॉजी से नहीं बदलती', बोले चीफ जस्टिस

दिल्ली हाई कोर्ट के 60 साल पूरे होने के कार्यक्रम में चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने नए तकनीकी सवालों पर न्यायपालिका की भूमिका बताई. उन्होंने कहा कि कानून में जवाब न मिलने पर संविधान रास्ता दिखाएगा और व्यक्तिगत अधिकारों की सुरक्षा का वादा कायम रहेगा.

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चीफ जस्टिस सूर्यकांत. (Photo- ITG) चीफ जस्टिस सूर्यकांत. (Photo- ITG)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 30 अक्टूबर 2026,
  • अपडेटेड 6:36 PM IST

भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत ने कहा है कि तकनीक कितनी भी बदल जाए, लेकिन गरिमा, स्वतंत्रता और समानता के संवैधानिक वादे नहीं बदलते. जहां कानून में किसी सवाल का जवाब न हो, वहां न्यायपालिका को संविधान के आधार पर फैसला करना चाहिए. उन्होंने कहा कि AI, डीपफेक और कॉपीराइट जैसे मुद्दों ने अदालतों के सामने नई चुनौतियां खड़ी कर दी हैं.

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CJI सूर्यकांत शुक्रवार को दिल्ली हाईकोर्ट के 60 साल पूरे होने के मौके पर आयोजित कार्यक्रम में बोल रहे थे. उन्होंने कहा कि आज अदालतों के सामने सवाल है कि क्या AI से तैयार किसी काम को कॉपीराइट मिल सकता है? डीपफेक से जुड़े मामलों में कानून कैसे जवाब देगा? तकनीकी विकास को बढ़ावा देते हुए लोगों के अधिकारों की रक्षा कैसे होगी?

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चीफ जस्टिस ने कहा, "ऐसे सवालों के जवाब कानून की किताबों में आसानी से नहीं मिलेंगे. जहां कानून खामोश है, वहां संविधान को हमारा मार्गदर्शन करना चाहिए. गरिमा, स्वतंत्रता और समानता का उसका वादा तकनीक के साथ नहीं बदलता. हर नए सवाल का जवाब इन्हीं मूल्यों को ध्यान में रखकर दिया जाना चाहिए."

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दिल्ली हाईकोर्ट का सुप्रीम कोर्ट से खास रिश्ता

CJI ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट का दिल्ली हाईकोर्ट से खास रिश्ता है. इसकी वजह सिर्फ दोनों अदालतों का पास होना नहीं, बल्कि दिल्ली हाईकोर्ट सुप्रीम कोर्ट पर मुकदमों का बोझ भी कम करता है. उन्होंने हल्के अंदाज में कहा कि कई बार वकीलों को याद दिलाना पड़ता है कि दिल्ली हाईकोर्ट पास ही है और वहां सुप्रीम कोर्ट पहुंचने से पहले राहत मिल सकती है.

1966 में चार जजों से शुरू हुआ था सफर

CJI ने कहा कि 1966 में जब दिल्ली हाईकोर्ट की स्थापना हुई, तब यह देश के राजनीतिक और प्रशासनिक केंद्र में स्थित थी. सरकार की शक्तियों, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और जवाबदेही से जुड़े मामलों की वजह से इसकी जिम्मेदारी हमेशा बड़ी रही है. चार जजों से शुरू हुई यह अदालत आज जटिल मामलों का निपटारा करने वाली बड़ी संस्था बन चुकी है.

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मुख्य न्यायधीश कहा कि दिल्ली हाईकोर्ट ने सिविल और कमर्शियल कानून के विकास में अहम योगदान दिया है. 2009 में इसने भारत का पहला हाईकोर्ट से जुड़ा आर्बिट्रेशन सेंटर बनाया. ई-फाइलिंग और डिजिटल प्रक्रियाओं की भी उन्होंने तारीफ की.

जस्टिस विक्रम नाथ ने भी की तारीफ

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कार्यक्रम में सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस विक्रम नाथ ने दिल्ली हाईकोर्ट के छह दशक के योगदान की सराहना की. उन्होंने मजाकिया अंदाज में कहा कि यहां के जज कभी-कभी सुप्रीम कोर्ट के जजों से भी ज्यादा ताकतवर नजर आते हैं. कार्यक्रम में दिल्ली हाईकोर्ट के कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश नितिन वासुदेव सांब्रे समेत कई मौजूदा और पूर्व जज मौजूद रहे.

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