करगिल युद्ध के दौरान कैप्टन विक्रम बत्रा ने दो महत्वपूर्ण चोटियों को पाकिस्तानियों के कब्जे से छुड़ाया था. प्यार से लोग 'लव' और 'शेरशाह' बुलाते थे. विक्रम ने अदम्य साहस और देश के लिए अभूतपूर्व निष्ठा दिखाते हुए सर्वोच्च बलिदान दिया. उन्हें मरणोपरांत परमवीर चक्र से नवाजा गया. आज उनकी 23वीं पुण्यतिथि है. करगिल युद्ध के शेरशाह को देश हमेशा याद रखेगा, क्योंकि इस जवान ने हमेशा युवाओं से कहा कि कुछ भी हो जाए, कितनी भी विपरीत परिस्थिति हो. हम बस ये कहें कि 'ये दिल मांगे मोर'. (फोटोः रक्षा मंत्रालय)
करगिल की लड़ाई में कैसे बने हीरो
5 जून 1999 को लेफ्टिनेंट विक्रम बत्रा के बटालियन को आदेश में मिला कि वो द्रास पहुंचे. 13 J&K RIF बटालियन 6 जून को द्रास पहुंच गई. उन्हें दूसरी बटालियन-राजपुताना राइफल्स (2 RJ RIF) के लिए रिजर्व बने रहने का आदेश दिया गया था. 18 ग्रेनेडियर्स बटालियन को तोलोलिंग पर कब्जा करने का आदेश मिला. बटालियन चार प्रयासों के बाद भी असफल रही. भारी नुकसान हुआ. तब राजपुताना राइफल्स को यह काम दिया गया. उन्होंने 13 जून 1999 को सफलतापूर्वक पहाड़ की चोटी से पाकिस्तानी घुसपैठियों को भगा दिया. इसके बाद, टोलोलिंग पर्वत और हंप कॉम्प्लेक्स के एक हिस्से को भी जीत लिया. (फोटोः ऑनरप्वाइंट)
ऐसे आया था 'दिल मांगे मोर'
टोलोलिंग मिशन के बाद तत्कालीन कमांडिंग ऑफिसर योगेश कुमार जोशी ने प्वाइंट 5140 को जीतने की योजना बनाई. जोशी ने दो टीम बनाई. पहले का नेतृत्व लेफ्टिनेंट संजीव सिंह जामवाल को दिया गया. दूसरे का कमान लेफ्टिनेंट विक्रम बत्रा को दिया गया. कहा गया कि प्वाइंट 5140 पर दो तरफ से हमला करना है. हंप कॉम्प्लेक्स में जामवाल और बत्रा को सीधे जोशी ने आदेश दिया था. उनसे कहा गया कि अपनी जीत का मंत्र चुनिए. तब बत्रा ने कहा था 'ये दिल मांगे मोर'. (फोटोः ऑनरप्वाइंट)
कैसे हुआ था प्वाइंट 5140 पर हमला
19 जून को हमला रात में साढ़े आठ बजे करना था. भारतीय तोपों की फायरिंग के बीच 20 जून की आधी रात को ऊपर चढ़ाई की जाएगी. जब सैनिक टारगेट से 200 मीटर दूर रहते तब तोपों से फायरिंग बंद कर दी जाती. जैसे ही तोपों से गोले दागने बंद किए गए. पाकिस्तानी सैनिक बंकरों से बाहर आए. भारतीय जवानों पर मशीनगनों से फायरिंग शुरु कर दी. तब बत्रा और जामवाल ने आर्टिलरी से संपर्क किया और दुश्मनों पर तोप से गोले दागते रहने को कहा. तब तक जब तक दोनों की टीमें 100 मीटर नजदीक नहीं पहुंच जातीं. (फोटोः ऑनरप्वाइंट)
नजदीकी लड़ाई में तीन पाकिस्तानियों को मारा
सवा तीन बजे दोनों अपनी-अपनी टीम को लेकर प्वाइंट 5140 पर पहुंच गए. 15 मिनट में जामवाल ने अपनी टीम के साथ रेडियो पर अपनी जीत का संकेत भेजा. तब तक बत्रा ने दुश्मन को हैरान-परेशान करने के लिए पीछे से हमला किया. उनके बंकरों पर तीन रॉकेट दागे. लेकिन दुश्मन मशीनगन से लगातार फायर कर रहा था. बत्रा ने मशीन गन पोस्ट पर दो ग्रैनेड फेंककर उन्हें खत्म कर दिया. इसके बाद वो सबसे ऊंचे शिखर पर पहुंच गए थे. लेफ्टिनेंट विक्रम बत्रा ने अकेले ही क्लोज कॉम्बैट में तीन पाकिस्तानी सैनिकों को मार गिराया. लेकिन इस दौरान जख्मी हो गए. इसके बाद भी दुश्मन के अगले पोस्ट पर कब्जा किया. 5140 अंक पर पूरी तरह कब्जा हो चुका था. फिर रेडियो पर अपनी जीत का मंत्र 'ये दिल मांगे मोर' कहा. (फोटोः ऑनरप्वाइंट)
जीत के बाद प्रमोट हुए, कैप्टन बन गए
इसके बाद प्वाइंट 4700, जंक्शन पीक और थ्री पिंपल कॉम्प्लेक्स में ऑपरेशन हुआ. जिसमें किसी भारतीय सैनिक की जान नहीं गई. न ही जख्मी हुआ. प्वाइंट 5140 की जीत और बहादुरी के बाद लेफ्टिनेंट विक्रम बत्रा को प्रमोशन दिया गया. उन्हें कैप्टन बना दिया गया. 26 जून को उनकी बटालियन को आराम करने के लिए द्रास से घुरमी जाने का आदेश मिला. 30 जून को बटालियन मुशकोह घाटी चली गई. (फोटोः फेसबुक)
Koo AppCaptain Vikram Batra, the gallant officer who broke the stalemate at Point 5140, was tasked to clear another narrow feature with heavily fortified enemy. Leading from the front, he fought till his last breath, rallied his men & helped achieve the task, capture of Point 4875. - Spokesperson Ministry of Defence (@SpokespersonMoD) 7 July 2022
अगला टारगेट था प्वाइंट 4875 पर कब्जा
मुशकोह घाटी पहुंचने के बाद अगला टारगेट था प्वाइंट 4875. इस पर कब्जा करना जरूरी था क्योंकि यहां से सीधे नेशनल हाइवे -1 पर पाकिस्तानी सीधे हमला कर रहे थे. क्योंकि वहां से पाकिस्तानी भारतीय सेना की सारी गतिविधियां देख रहे थे. कैप्टन विक्रम बत्रा की 13 जेएके आरआईएफ प्वाइंट 4875 से 1500 मीटर दूर फायर सपोर्ट बेस पर तैनात किया गया था. 4 जुलाई 199 की शाम 6 बजे प्वाइंट 4875 पर मौजूद दुश्मन पर हमला करना शुरू किया. रात भर बिना रुके गोलीबारी जारी रही. साढ़े आठ बजे दो टीमें ऊपर भेजी गई. तब बत्रा की तबियत खराब थी. वो अपने स्लीपिंग बैग में लेटे हुए थे. 5 जुलाई की सुबह साढ़े चार बजे फीचर के ऊपर बैठे दुश्मनों पर तेजी से फायरिंग की गई. सुबह सवा दस बजे कमांडिंग ऑफिसर जोशी ने दो फागोट मिसाइलें दागी जो दुश्मन के ठिकानों पर जाकर लगीं. पूरे दिन संघर्ष चलता रहा लेकिन सफलता नहीं मिल रही थी. (फोटोः ऑनरप्वाइंट)
घायल थे पर देश के लिए चढ़ गए चोटी
कैप्टन विक्रम बत्रा फायर सपोर्ट बेस से स्थिति देख रहे थे. वो अपनी इच्छा से फ्लैट टॉप पर जाने की अनुमति मांग रहे थे. फ्लैट टॉप पर जाने से पहले बत्रा ने अपनी टीम के 25 अन्य जवानों के साथ मंदिर में प्रार्थना की. पाकिस्तानी बत्रा से इतने डरे हुए थे कि उन्हें धमकाने के लिए वायरसेल सिस्टम में सेंध लगाई. हालांकि, बत्रा चढ़ते रहे. बत्रा की टीम ने प्वाइंट 4875 पर मौजूद दुश्मनों के बंकरों पर ऐसी ताबड़तोड़ फायरिंग की दुश्मन की हालत पस्त हो गई. मशीन गन को खत्म करने के लिए ग्रैनेड से हमला कर दिया. बत्रा ने दुश्मनों की दो मशीनगनों को नष्ट कर दिया था. बत्रा एक-एक करके दुश्मन के संगड़ की ओर बढ़ रहे थे. हर एक संगड़ को खत्म करते जा रहे थे. नजदीकी संघर्ष में उन्होंने 5 पाकिस्तानियों को मार डाला. इसके बाद उन्होंने चार और पाकिस्तानी सैनिकों को मारा. (फोटोः ट्विटर/कृष्ण चैतन्य वेल्गा)
घायल सैनिक की मदद कर रहे थे तब लगी गोली
बत्रा की टीम के दो सैनिक जख्मी थे. बत्रा और रघुनाथ सिंह दोनों अपने घाटल सिपाही को बचाने के लिए उठाकर नीचे ले जा रहे थे, तभी पाकिस्तानी स्नाइपर ने कैप्टन विक्रम बत्रा के सीने में गोली मार दी. इसके बाद एक आरपीजी के हमले में निकले छर्रे से सिर में चोट लग गई. प्वाइंट 4875 के ऐतिहासिक कब्जे के कारण उनके सम्मान में पहाड़ का नाम बत्रा टॉप रखा गया. बत्रा को मरणोपरांत भारत के सर्वोच्च सैन्य सम्मान परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया. (फोटोः PIB)
कैप्टन विक्रम बत्रा कौन सी रेजिमेंट में थे?
साल 1996 के जून महीने में कैप्टन विक्रम बत्रा मानेकशॉ बटालियन में इंडियन मिलिट्री एकेडमी (IMA) में शामिल हुए. 19 महीने की कठिन ट्रेनिंग पूरी करने के बाद 6 दिसंबर 1997 को IMA से ही स्नातक किया. फिर उन्हें 13वीं बटालियन, जम्मू एंड कश्मीर राइफल्स में लेफ्टिनेंट के रूप में कमीशन दिया गया था. (फोटोः ऑनरप्वाइंट)
कमांडो ट्रेनिंग भी की थी शेरशाह ने
बतौर लेफ्टिनेंट कमीशन होने के बाद उन्हें आगे की ट्रेनिंग के लिए मध्यप्रदेश के जबलपुर भेजा गया. इसके बाद उन्हें बारामूला जिले के सोपोर में तैनाती मिली. मार्च 1998 में विक्रम को युवा अधिकारी का कोर्स पूरा करने के लिए इंफैंट्री स्कूल में पांच महीने की ट्रेनिंग के लिए महू भेजा गया. यहां अल्फा ग्रेडिंग से सम्मानित किया गया. फिर वो अपनी बटालियन में शामिल हो गए. जनवरी 1999 में उन्होंने कर्नाटक के बेलगाम में दो महीने की कमांडो ट्रेनिंग पूरी की. उसमें उन्हें सर्वोच्च ग्रेडिंग से सम्मानित किया गया. (फोटोः ऑनरप्वाइंट)
कैप्टन विक्रम बत्रा का पारिवारिक जीवन
कैप्टन विक्रम बत्रा का का जन्म 9 सितंबर 1974 को हिमाचल प्रदेश के पालमपुर में हुआ. पिता का नाम गिरधारी लाल बत्रा और माता का नाम कमल कांता बत्रा था. कैप्टन विक्रम बत्रा ने पालमपुर के डीएवी पब्लिक स्कूल से अपनी पढ़ाई पूरी की. वहीं कराटे सीखा और ग्रीन बेल्ट हासिल की. एनसीसी में वह एयर विंग कैडेट चुने गए. एनसीसी में कैप्टन विक्रम बत्रा को 'सी' सर्टिफिकेट मिला. इसके बाद उन्होंने पंजाब विश्वविद्यालय, चंडीगढ़ से अंग्रेजी में एमए किया. (फोटोः इंडिया टुडे आर्काइव)