पुणे में सोमवार को पारंपरिक शोभायात्राओं के साथ गणेशोत्सव की शुरुआत हुई. शहर के प्रसिद्ध 'मानाचे पंच गणपति' समेत विभिन्न गणपति मंडलों में विधि-विधान से भगवान गणेश की प्राण प्रतिष्ठा की गई.
इस बार शोभायात्राओं में एक बड़ा बदलाव देखने को मिला. पिछले वर्षों की तरह DJ और बड़े साउंड सिस्टम नजर नहीं आए, लेकिन इसके बावजूद शहर में शोर का स्तर चर्चा का विषय बन गया. कई जगहों पर ध्वनि का स्तर 90 डेसिबल से अधिक रिकॉर्ड किया गया.
गणेशोत्सव से पहले पुणे में इस साल 'DJ फ्री' उत्सव को लेकर बड़ी बहस हुई थी. हजारों नागरिकों ने पुणे नगर निगम तक मार्च निकालकर निर्धारित सीमा से ज्यादा आवाज वाले लाउडस्पीकर और साउंड सिस्टम के खिलाफ कार्रवाई की मांग की थी, लेकिन अब सवाल यह उठ रहा है कि शोर पर पाबंदी केवल DJ और Dolby सिस्टम तक सीमित होनी चाहिए या पारंपरिक ढोल-ताशे जैसे वाद्ययंत्रों से निकलने वाली आवाज पर भी वही नियम लागू होने चाहिए?
क्या कहता है शोर को लेकर कानून?
Noise Pollution (Regulation and Control) Rules, 2000 के मुताबिक, सार्वजनिक स्थान पर लाउडस्पीकर या पब्लिक एड्रेस सिस्टम से निकलने वाली आवाज संबंधित क्षेत्र के निर्धारित एम्बिएंट नॉइज स्टैंडर्ड से 10 dB(A) से अधिक या 75 dB(A), इनमें जो भी कम हो, उससे ज्यादा नहीं हो सकती. आवासीय इलाके में दिन के समय एम्बिएंट नॉइज की सीमा 55 dB(A) है. इस हिसाब से ऐसे इलाके में लाउडस्पीकर के लिए अधिकतम सीमा 65 dB(A) बनती है.
नियमों के तहत रात 10 बजे से सुबह 6 बजे तक लाउडस्पीकर और साउंड एम्प्लीफायर के इस्तेमाल पर भी रोक है. हालांकि, राज्य सरकार चुनिंदा त्योहारों के दौरान सीमित दिनों के लिए आधी रात तक इसकी अनुमति दे सकती है. महत्वपूर्ण बात यह है कि समय में छूट का मतलब शोर की निर्धारित सीमा से छूट नहीं है.
NGT ने भी दिए थे निर्देश
पुणे में गणेशोत्सव के दौरान शोर का विवाद नया नहीं है. साल 2024 में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) की पश्चिमी जोन बेंच ने डॉ. कल्याणी मांडके बनाम महाराष्ट्र राज्य मामले की सुनवाई के दौरान गणेशोत्सव में ध्वनि प्रदूषण को लेकर कई निर्देश दिए थे.
इनमें प्रमुख गणपति मंडलों और विसर्जन मार्गों के महत्वपूर्ण स्थानों पर रियल टाइम नॉइज मॉनिटरिंग करने को कहा गया था. अधिकारियों को वास्तविक ध्वनि स्तर के साथ उस स्थान पर लागू निर्धारित सीमा भी प्रदर्शित करने का निर्देश दिया गया, ताकि आम लोग दोनों की तुलना कर सकें.
इसका अर्थ है कि कानूनी नजरिये से केवल यह मायने नहीं रखता कि कितने स्पीकर लगे हैं या किस तरह का साउंड सिस्टम इस्तेमाल किया जा रहा है. असली कसौटी उस स्थान पर पैदा हो रहा वास्तविक डेसिबल स्तर है.
'चार बेस-चार टॉप' की अनुमति, लेकिन डेसिबल का क्या?
इस साल गणेशोत्सव से पहले पुणे पुलिस ने मंडलों के लिए सीमित साउंड सिस्टम की व्यवस्था के तहत चार बेस और चार टॉप स्पीकर की अनुमति दी है. कुछ ज्यादा तीव्रता वाले साउंड उपकरणों पर पाबंदियां भी लगाई गई हैं.
हालांकि, 'चार बेस-चार टॉप' अपने आप में Noise Pollution Rules के तहत निर्धारित कोई कानूनी डेसिबल सीमा नहीं है. ऐसे में लोगों का सवाल है कि अगर सीमित संख्या में स्पीकर लगाने के बाद भी आवाज निर्धारित डेसिबल सीमा पार कर जाती है, तो क्या केवल स्पीकरों की संख्या सीमित करना पर्याप्त है?
ढोल-ताशा पर भी नियम लागू हों? बंटी लोगों की राय
ध्वनि प्रदूषण के खिलाफ अभियान से जुड़े कार्यकर्ता विद्यानंद बापट का कहना है कि विरोध गणेशोत्सव या धार्मिक उत्सव मनाने का नहीं, बल्कि अत्यधिक शोर और निर्धारित नियमों के उल्लंघन का है. नागरिक संगठनों की मांग है कि नियम समान रूप से लागू किए जाएं, फिर चाहे आवाज DJ से आ रही हो, Dolby सिस्टम से या पारंपरिक वाद्ययंत्रों से.
हालांकि, ढोल-ताशा पर पाबंदी को लेकर लोगों की राय बंटी हुई है. नागपुर से गणेशोत्सव देखने पुणे पहुंचे एक दंपति ने इंडिया टुडे से कहा कि उन्हें DJ की जरूरत महसूस नहीं होती, लेकिन ढोल-ताशा पर पाबंदी लगाना उनके हिसाब से त्योहार पर ही पाबंदी लगाने जैसा होगा. पुणे के गणेशोत्सव में पारंपरिक ढोल-ताशा को बड़ी संख्या में श्रद्धालु उत्सव का अभिन्न हिस्सा मानते हैं.
वहीं, आठ महीने की बेटी के साथ शोभायात्रा देखने पहुंचीं पुणे की सुप्रिया ने बताया कि वह हर साल गणेशोत्सव में आती हैं. तेज आवाज से बच्ची पर पड़ने वाले असर के सवाल पर उन्होंने कहा कि उन्होंने बेटी के कानों की सुरक्षा के लिए ईयर प्रोटेक्शन का इस्तेमाल किया है.
इससे पहले दही हांडी उत्सव के दौरान भी ध्वनि नियमों के पालन का मुद्दा उठा था. रिपोर्ट्स के मुताबिक, पुणे और पिंपरी-चिंचवड़ में ध्वनि नियमों के उल्लंघन को लेकर 132 FIR दर्ज की गई थीं. पिंपरी-चिंचवड़ पुलिस ने अलग से 16 मामले दर्ज करते हुए कुछ मामलों में DJ उपकरण भी जब्त किए थे.
ऐसे में गणेशोत्सव के पहले दिन का 'रियलिटी चेक' एक अहम सवाल छोड़ गया है, अगर DJ नहीं होने के बावजूद शोर 90 डेसिबल के पार पहुंच रहा है, तो क्या 'DJ फ्री' होना ही काफी है या असली लक्ष्य 'नॉइज लिमिट' का पालन होना चाहिए?
ओमकार