अंधविश्वास ने उजाड़ दिया परिवार, तांत्रिक के चक्कर में 15 और 10 साल के दो भाइयों की बुखार से मौत

झारखंड के रामगढ़ में अंधविश्वास के चलते एक परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा. तेज बुखार से पीड़ित दो भाइयों और उनकी मां को अस्पताल ले जाने के बजाय तीन दिन तक झाड़-फूंक कराई जाती रही. हालत बिगड़ने पर दोनों बच्चों को अस्पताल ले जाया गया, लेकिन रास्ते में उनकी मौत हो गई. मां को गंभीर हालत में RIMS भेजा गया है.

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अस्पताल पहुंचने से पहले हुई मौत.(Photo: ITG) अस्पताल पहुंचने से पहले हुई मौत.(Photo: ITG)

राजेश वर्मा

  • रामगढ़,
  • 03 सितंबर 2026,
  • अपडेटेड 10:12 PM IST

झारखंड के रामगढ़ जिले में अंधविश्वास से जुड़ा एक बेहद दर्दनाक मामला सामने आया है. भदानी नगर ओपी क्षेत्र के पारगड़ा गांव में तेज बुखार से पीड़ित दो मासूम भाइयों की मौत हो गई, जबकि उनकी मां की हालत गंभीर बनी हुई है. परिवार ने बीमारी का इलाज अस्पताल में कराने के बजाय तीन दिनों तक तांत्रिक से झाड़-फूंक कराई. हालत बिगड़ने के बाद जब दोनों बच्चों को अस्पताल ले जाया गया, तब तक काफी देर हो चुकी थी.

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बताया जा रहा है कि पारगड़ा गांव निवासी शंकर बेदिया के घर में तीन-चार दिन पहले उनके 15 वर्षीय बेटे रामकिसुन, 10 वर्षीय साहिल और पत्नी संगीता देवी को एक साथ तेज बुखार आया. तीनों को एक साथ बीमार देखकर परिजनों ने इसे किसी ऊपरी हवा का असर मान लिया. इसके बाद डॉक्टर के पास जाने के बजाय घर में एक तांत्रिक को बुलाया गया और झाड़-फूंक शुरू करा दी गई.

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घर में अगरबत्ती जलाई जाती रही और तांत्रिक मंत्र पढ़कर तीनों को ठीक करने का दावा करता रहा. इस दौरान रामकिसुन, साहिल और उनकी मां की तबीयत सुधरने के बजाय लगातार बिगड़ती गई. इसके बावजूद परिवार की ओर से उन्हें तत्काल अस्पताल ले जाने की कोशिश नहीं की गई. तीन दिनों तक इसी तरह इलाज चलता रहा और बच्चों की हालत बेहद गंभीर हो गई.

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बेहोश हुए दोनों भाई, अस्पताल पहुंचने से पहले मौत

जब दोनों भाइयों की हालत बेकाबू हो गई और वे बेहोश हो गए, तब परिजन आनन-फानन में उन्हें रामगढ़ सदर अस्पताल लेकर निकले. लेकिन रास्ते में ही दोनों बच्चों ने दम तोड़ दिया. अस्पताल पहुंचने पर डॉक्टरों ने दोनों को मृत घोषित कर दिया. इस घटना के बाद परिवार में कोहराम मच गया और पूरे गांव में मातम पसरा हुआ है.

इधर, बच्चों की मां संगीता देवी की हालत भी लगातार बिगड़ रही थी. उनकी धड़कन कमजोर पड़ने पर डॉक्टरों ने उन्हें गंभीर स्थिति में बेहतर इलाज के लिए रांची स्थित RIMS रेफर कर दिया. फिलहाल वह अस्पताल में जिंदगी और मौत के बीच जूझ रही हैं.

घटना का सबसे मार्मिक पहलू यह है कि परिवार का मुखिया शंकर बेदिया रोजी-रोटी के लिए ओडिशा में प्राइवेट नौकरी करता है. घटना के वक्त वह गांव में मौजूद नहीं था. परिवार के लिए अपने दोनों बेटों को पढ़ा-लिखाकर बड़ा आदमी बनाने का सपना था, लेकिन अब रामकिसुन और साहिल इस दुनिया में नहीं हैं.

पानी दूषित होने की भी जांच

मामले की जानकारी मिलने के बाद पतरातू प्रखंड के प्रखंड विकास पदाधिकारी मनोज गुप्ता गांव पहुंचे. उन्होंने पीड़ित परिवार से मुलाकात कर उन्हें ढांढस बंधाया. BDO ने सरकारी नियमों के तहत परिवार को मुआवजा दिलाने की बात भी कही है.

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एक ही परिवार के तीन सदस्यों के एक साथ तेज बुखार से पीड़ित होने को देखते हुए स्वास्थ्य संबंधी संभावित कारणों की भी पड़ताल शुरू की गई है. पीएचई विभाग की टीम ने गांव का दौरा कर आसपास लगे चापानलों के पानी के नमूने लिए हैं. इनकी जांच के जरिए यह पता लगाने की कोशिश की जा रही है कि कहीं पानी दूषित तो नहीं है और संक्रमण फैलने के पीछे इसकी कोई भूमिका तो नहीं.

तेज बुखार कई तरह के संक्रमण या बीमारियों का संकेत हो सकता है. वायरल फीवर, मलेरिया, टायफाइड अथवा दूषित पानी से होने वाली बीमारी जैसी संभावनाओं की चिकित्सकीय जांच जरूरी होती है. हालांकि इस मामले में मौत की वास्तविक वजह जांच और मेडिकल रिपोर्ट के बाद ही स्पष्ट हो सकेगी.

गांव में मातम, अंधविश्वास पर उठे सवाल

दोनों बच्चों की मौत के बाद पारगड़ा गांव में मातम पसरा हुआ है. ग्रामीणों के बीच यह चर्चा है कि अगर बच्चों को समय रहते चिकित्सकीय मदद मिलती तो शायद स्थिति अलग हो सकती थी. वहीं, यह घटना ग्रामीण इलाकों में अंधविश्वास के साथ-साथ स्वास्थ्य सेवाओं और बीमारी के प्रति जागरूकता की कमी को भी सामने लाती है.

अंधविश्वास के चलते बीमारी का इलाज तंत्र-मंत्र या झाड़-फूंक से कराने का चलन कई परिवारों के लिए गंभीर खतरा बन सकता है. बीमारी के शुरुआती लक्षणों को नजरअंदाज करने के बजाय समय पर चिकित्सकीय सलाह लेना बेहद जरूरी है. रामगढ़ की यह घटना बताती है कि जागरूकता अभियान और स्वास्थ्य सुविधाओं की पहुंच गांवों के अंतिम छोर तक प्रभावी ढंग से पहुंचाना कितना जरूरी है, ताकि किसी और परिवार को ऐसी त्रासदी से न गुजरना पड़े.

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