500 रुपये की घड़ी ने ले ली जान, 29 साल बाद सुप्रीम कोर्ट ने दोषी को जेल से दी राहत

सिर्फ 500 रुपये की घड़ी को लेकर शुरू हुआ पड़ोसियों का विवाद एक शख्स की मौत तक पहुंच गया और मामला करीब तीन दशक तक अदालतों में चलता रहा. अब सुप्रीम कोर्ट ने 1997 के इस मामले में फैसला सुनाते हुए एक जीवित दोषी की पांच साल की सजा को पहले ही काटी गई सजा तक सीमित कर दिया है. दो अन्य दोषियों की अपील के दौरान मौत हो चुकी है.

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सुप्रीम कोर्ट. (File Photo: ITG) सुप्रीम कोर्ट. (File Photo: ITG)

aajtak.in

  • नई दिल्ली ,
  • 26 जून 2026,
  • अपडेटेड 7:17 PM IST

सिर्फ 500 रुपये की एक घड़ी को लेकर शुरू हुआ पड़ोसियों का झगड़ा देखते ही देखते हिंसक हो गया और एक व्यक्ति की जान चली गई. यह मामला करीब 29 साल तक अदालतों में चलता रहा. अब सुप्रीम कोर्ट ने इस पुराने आपराधिक मामले का निपटारा करते हुए एक जीवित दोषी की सजा में राहत दी है. अदालत ने दोषसिद्धि को बरकरार रखा, लेकिन पांच साल के कठोर कारावास की सजा को पहले ही काटी जा चुकी सजा तक सीमित कर दिया. सुप्रीम कोर्ट की न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां और न्यायमूर्ति अरुण पल्ली की पीठ ने भारतीय दंड संहिता की धारा 304 के तहत दर्ज इस मामले में फैसला सुनाया. अदालत ने कहा कि अपील लंबित रहने के दौरान तीन दोषियों में से दो की मौत हो चुकी है, जबकि तीसरा दोषी अब 60 वर्ष से अधिक उम्र का है.

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कैसे शुरू हुआ पूरा विवाद

जानकारी के अनुसार, पदम सिंह ने अपने पड़ोसी मनुआ को 500 रुपये में एक घड़ी बेची थी. बाद में मनुआ को घड़ी पसंद नहीं आई और वह उसे वापस करना चाहता था. इसी बात को लेकर दोनों के बीच कहासुनी हुई, जो जल्द ही मारपीट में बदल गई. इसी दौरान रामू और माथू भी मनुआ के साथ आ गए. आरोप था कि तीनों ने मिलकर पदम सिंह के साथ मारपीट की. उस समय पदम सिंह एक सूखी नहर के किनारे खड़े थे. धक्का लगने से वह नहर में गिर गए. आरोप यह भी था कि जीवित बचे आरोपी माथू ने एक भारी पत्थर से उनके सिर पर वार किया. गंभीर रूप से घायल पदम सिंह को दून अस्पताल ले जाया गया, जहां इलाज के दौरान उनकी मौत हो गई.

निचली अदालत से सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा मामला

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देहरादून की ट्रायल कोर्ट ने वर्ष 2002 में तीनों आरोपियों को दोषी ठहराया. अदालत ने माना कि उन्होंने हत्या की मंशा से नहीं, बल्कि ऐसे कृत्य से मौत का कारण बनाया जो भारतीय दंड संहिता की धारा 304 के तहत दंडनीय है. तीनों को पांच साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई गई. इसके बाद वर्ष 2012 में उत्तराखंड हाई कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा. इसी फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई थी.

सुप्रीम कोर्ट ने क्यों दी राहत

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि घटना 12 फरवरी 1997 की है. उस समय माथू की उम्र 33 वर्ष थी, जबकि अब वह 60 वर्ष से अधिक का हो चुका है. अदालत ने यह भी कहा कि रिकॉर्ड से यह स्पष्ट होता है कि विवाद अचानक शुरू हुआ था और मारपीट के दौरान पदम सिंह सूखी नहर में गिर गए. पीठ ने अपने आदेश में कहा कि रिकॉर्ड में मौजूद सामग्री से यह भी सामने आता है कि मृतक के चेहरे और सिर पर जो गंभीर चोटें मिलीं, वे सूखी नहर के पथरीले तल पर गिरने के कारण भी हुई थीं.

अदालत ने यह भी ध्यान में रखा कि माथू पहले ही करीब डेढ़ साल जेल में रह चुका है. इन सभी परिस्थितियों को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि न्याय के हित में उसकी पांच साल की सजा को पहले से काटी गई अवधि तक सीमित करना उचित होगा. हालांकि अदालत ने दोषसिद्धि को बरकरार रखा और सिर्फ सजा में संशोधन किया. करीब तीन दशक तक अदालतों में चलने के बाद अब इस मामले का कानूनी अंत हो गया है.
 

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