सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस उज्जल भुइयां ने कॉलेजियम सिस्टम में पारदर्शिता की कमी को लेकर गंभीर सवाल उठाए हैं. उन्होंने शनिवार (1 अगस्त 2026) को नई दिल्ली में कानूनी थिंक टैंक 'विधि' की 'ज्यूडिशियल ट्रांसपेरेंसी इंडेक्स' रिपोर्ट के लॉन्च कार्यक्रम के दौरान ये टिप्पणियां कीं. जस्टिस उज्जल भुइयां ने कॉलेजियम सिस्टम पर सवाल उठाते हुए कहा कि किसी उम्मीदवार को जज के रूप में नियुक्त करने या न करने का कारण नहीं बताना अन्याय है. जस्टिस भुइयां ने कहा कि कॉलेजियम जब जजों की नियुक्ति, पदोन्नति या ट्रांसफर की सिफारिश करता है, तो उसके पीछे के ठोस कारणों का खुलासा नहीं करता. उन्होंने कहा कि कारण न बताकर आप वास्तव में उन जजों के साथ गलत कर रहे हैं, जिन्होंने अच्छा काम किया है.
जस्टिस भुइयां ने चिंता जताई कि सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम के पिछले तीन प्रस्तावों में जजों की सिफारिश के पीछे कोई कारण नहीं बताया गया था. उन्होंने सवाल किया कि क्या कॉलेजियम पारदर्शिता के सिद्धांत से पीछे हट रहा है? उन्होंने कहा कि इससे अयोग्य लोगों को न्यायपालिका में जगह मिलने का खतरा है.
जस्टिस भुइयां का मानना है कि जब नियुक्ति की प्रक्रिया को गुप्त रखा जाता है, तो ऐसे अयोग्य उम्मीदवारों को भी न्यायपालिका में आने का मौका मिल सकता है, जो बाद में असंवैधानिक बातें करते हैं. जस्टिस भुइयां ने कहा कि हम ऐसे व्यक्तियों के लिए भी न्यायपालिका में प्रवेश की गुंजाइश बनाते हैं, जो बाद में लोगों के समूहों को 'चींटियां' कह सकते हैं और ऐसी टिप्पणियां कर सकते हैं, जो पूरी तरह से असंवैधानिक हैं. बाद में उन्होंने स्पष्ट किया कि यह टिप्पणी इलाहाबाद हाई कोर्ट के एक जज के संदर्भ में थी.
पब्लिक डिबेट की जरूरत
पब्लिक डिबेट की जरूरत बताते हुए जस्टिस भुइयां ने सवाल किया कि यदि इन फैसलों पर सार्वजनिक रूप से चर्चा हो, तो इसमें क्या नुकसान है? कारणों का खुलासा होने से जनता को जानकारी मिलती है और न्यायपालिका पर भरोसा मजबूत होता है. उन्होंने कहा कि भारतीय न्यायपालिका अपने न्यायिक कार्यों यानी फैसले देने में तो पूरी पारदर्शिता अपनाती है, लेकिन जब बात अपने ही जजों की नियुक्ति की आती है, तो वह अत्यधिक गोपनीयता बरतती है.
क्यों विवादों में रहा है कॉलेजियम सिस्टम?
सुप्रीम कोर्ट का कॉलेजियम सिस्टम भारतीय न्यायपालिका के सबसे ज्यादा चर्चा में रहने वाले मुद्दों में से एक रहा है. इसकी एक बड़ी वजह जजों की नियुक्ति और ट्रांसफर की प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी को लेकर उठने वाले सवाल हैं. कॉलेजियम सिस्टम के तहत भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) और सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ जजों का एक समूह उच्च न्यायपालिका में जजों की नियुक्ति और ट्रांसफर की सिफारिश करता है. सरकार किसी सिफारिश पर दोबारा विचार करने के लिए कह सकती है, लेकिन इस प्रक्रिया में उसकी भूमिका सीमित होती है.
आलोचक लंबे समय से यह तर्क देते रहे हैं कि कॉलेजियम सिस्टम में पारदर्शिता की कमी है. किसी विशेष उम्मीदवार को क्यों चुना गया, क्यों खारिज किया गया या उसकी नियुक्ति को क्यों टाल दिया गया, इसे लेकर सार्वजनिक रूप से बहुत कम जानकारी उपलब्ध होती है. नियुक्तियों के लिए स्पष्ट रूप से निर्धारित और सार्वजनिक रूप से उपलब्ध मानदंड नहीं होने को लेकर भी सवाल उठते रहे हैं.
हालांकि, न्यायपालिका लगातार इस सिस्टम का बचाव करती रही है. न्यायपालिका का कहना है कि न्यायिक स्वतंत्रता की रक्षा और जजों की नियुक्ति की प्रक्रिया को कार्यपालिका के हस्तक्षेप से दूर रखने के लिए कॉलेजियम सिस्टम जरूरी है.
सरकार और न्यायपालिका के बीच भी रहा टकराव
कॉलेजियम सिस्टम का मुद्दा कई बार सरकार और न्यायपालिका के बीच टकराव की वजह भी बना है. संसद ने कॉलेजियम सिस्टम की जगह राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (NJAC) लाने की कोशिश की थी. हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने 2015 में इससे जुड़े कानून को रद्द कर दिया था. कोर्ट का मानना था कि इससे न्यायपालिका की स्वतंत्रता प्रभावित होती है. भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ ने भी 2024 में कॉलेजियम सिस्टम का बचाव किया था. उन्होंने कहा था कि जजों की नियुक्ति की प्रक्रिया में पारदर्शिता बढ़ाने के प्रयास किए जा रहे हैं. इंडिया टुडे की रिपोर्ट के अनुसार, एक इंटरव्यू में पूर्व सीजेआई चंद्रचूड़ ने कहा था कि इस सिस्टम की आलोचना करना आसान है, लेकिन कॉलेजियम यह सुनिश्चित करने का हर संभव प्रयास करता है कि किसी जज की नियुक्ति से पहले परामर्श की आवश्यक प्रक्रिया का पालन किया जाए.
संजय शर्मा