दिल्ली हाई कोर्ट ने मंगलवार को रेस कोर्स मस्जिद को तोड़ने से बचाने की मांग पर केंद्र सरकार से जवाब मांगा. यह मस्जिद जयपुर पोलो ग्राउंड के परिसर में है. याचिका सैयद अहमद सऊद ने दायर की है, जो वहां नमाज पढ़ते हैं. उन्होंने मस्जिद में प्रवेश बहाल करने की भी मांग की है. जस्टिस अनीश दयाल ने नोटिस जारी कर केंद्र के वकील को गुरुवार को निर्देश के साथ आने को कहा.
सुनवाई में केंद्र के स्थायी वकील आशीष दीक्षित ने बताया कि इस परिसर में एक मस्जिद और एक मंदिर है. उनके मुताबिक अभी मस्जिद तोड़ने की कोई कार्रवाई नहीं हो रही. उन्होंने कहा कि आसपास के दूसरे ढांचे गिराते समय जनता को खतरे से बचाने के लिए पहले मस्जिद की बिजली और पानी की सप्लाई बंद की गई थी.
दीक्षित ने बताया कि मस्जिद उसी जमीन पर है, जहां प्रधानमंत्री आवास के पास तीन झुग्गी बस्तियां थीं. इनके नाम भाई राम कैंप, मस्जिद कैंप और डीआईडी कॉलोनी हैं. इन झुग्गियों को गिराने की मंजूरी हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट पहले ही दे चुके हैं. केंद्र का कहना है कि ये बस्तियां संरक्षित इलाके में थीं और चालू वायुसेना स्टेशन से सटी थीं. रक्षा ढांचे की सुरक्षा और दूसरे जरूरी सार्वजनिक और सुरक्षा कारणों से अनधिकृत निर्माण हटाने का फैसला लिया गया. केंद्र ने जून में जयपुर पोलो ग्राउंड और अगस्त में उससे सटे दिल्ली रेस क्लब को अपने कब्जे में लिया था.
दिल्ली वक्फ बोर्ड के वकील ने बताया कि बोर्ड ने लैंड एंड डेवलपमेंट ऑफिस और दूसरे अधिकारियों को अपना प्रतिनिधित्व भेजा है. दीक्षित ने कहा कि वक्फ और याचिकाकर्ता, दोनों की अर्जियों पर अधिकारी फैसला लेंगे.
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याचिकाकर्ता के वकील एम सुफियान सिद्दीकी ने मांग की कि तब तक मस्जिद में जाने की इजाजत दी जाए. कोर्ट ने पूछा कि इलाके में बड़ी तोड़फोड़ के बीच मस्जिद के लिए सुरक्षा कैसे मांगी जा सकती है. इस पर सिद्दीकी ने कहा कि मस्जिद ग्रेड 2 की संरक्षित इमारत है और उसमें किसी भी बदलाव के लिए हेरिटेज एंड कंजर्वेशन कमेटी की मंजूरी जरूरी है. उन्होंने कहा कि मस्जिद 1977 से अधिसूचित वक्फ संपत्ति है, पर वक्फ बोर्ड वहां पहुंच बनाए रखने के कदम नहीं उठा सका. उनका यह भी कहना था कि मस्जिद तीनों झुग्गियों की तोड़फोड़ वाले मुकदमे का हिस्सा नहीं थी.
याचिका के मुताबिक 21 अक्टूबर 2026 को सऊद अपने दोस्तों के साथ नमाज के लिए पहुंचे, लेकिन रेस कोर्स परिसर के प्रवेश पर हाल में लगे लोहे के गेट पर तैनात सुरक्षाकर्मियों ने उन्हें अंदर नहीं जाने दिया. उनका आरोप है कि बिना नोटिस या आदेश के नमाज से रोकना संविधान के अनुच्छेद 14 और 25 का उल्लंघन है. याचिका में यह भी माना गया कि हर रोक को धर्म स्वरूप बदलना नहीं कहा जा सकता, लेकिन राज्य मस्जिद के ऐतिहासिक धार्मिक चरित्र को नजरअंदाज नहीं कर सकता.
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