Ground Report: रायपुर में MLA कॉलोनी के लिए गिराए गए 80 घर, नम आंखें पूछ रहीं 'तीखे सवाल'

राजधानी रायपुर के नकटी गांव में MLA कॉलोनी परियोजना के लिए 80 से ज्यादा घर तोड़े जा चुके हैं. पुनर्वास, सरकारी जमीन और बेघर हुए परिवारों के मुद्दे पर कांग्रेस ने बीजेपी सरकार पर कई सवाल उठाए हैं.

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रायपुर के नटकी में 80 से ज्यादा घर जमींदोज, बेघर हुए कई परिवार (Photo: ITG) रायपुर के नटकी में 80 से ज्यादा घर जमींदोज, बेघर हुए कई परिवार (Photo: ITG)

सुमी राजप्पन

  • रायपुर,
  • 30 जून 2026,
  • अपडेटेड 6:25 PM IST

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के नकटी गांव में पहुंचते ही सबसे पहले जो चीज नजर आती है, वह वहां की खामोशी नहीं, बल्कि बर्तन हैं. स्टील की प्लेटें, प्रेशर कुकर, स्कूल बैग, परिवार की तस्वीरें, लकड़ी के पलंग और कपड़ों के गट्ठर खुले आसमान के नीचे जमीन पर बिखरे पड़े हैं. कुछ घंटे पहले ही, ये चीजें उन घरों के अंदर थीं, जिन्होंने कई पीढ़ियों को पनाह दी थी. आज, वे घर टूटी हुई ईंटों और मुड़े-तुड़े धातु के ढेर के अलावा और कुछ नहीं हैं.

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गांव तक पहुंचना ही एक चुनौती थी. करीब 56 एकड़ ज़मीन पर तोड़-फोड़ की कार्रवाई चल रही थी, इसलिए नकटी में घुसने के करीब हर रास्ते पर सुरक्षा बल तैनात थे. तोड़-फोड़ वाली जगह से करीब एक किलोमीटर दूर बैरिकेड्स लगा दिए गए थे, जिससे मीडियाकर्मी गांव तक नहीं पहुंच पा रहे थे.

अधिकारी इन पाबंदियों की वजह कानून-व्यवस्था से जुड़ी चिंताएं बता रहे हैं. प्रभावित परिवारों तक पहुंचने के लिए, हम आस-पास के खेतों से होते हुए एक वैकल्पिक रास्ता अपनाया और करीब 1.5 किलोमीटर पैदल चलकर आखिरकार गांव में प्रवेश किया. बैरिकेड्स के उस पार एक ऐसी सच्चाई थी, जिसे सिर्फ मौके पर जाकर ही देखा जा सकता था.

खामोश चेहरों पर सवालों का शोर!

महिलाएं अपने घरों से बचाए गए और करीने से रखे गए बर्तनों के पास चुपचाप बैठी थीं. मलबे के बीच गद्दे, कपड़े, एलपीजी सिलेंडर, स्कूल बैग और परिवार की तस्वीरें बिखरी पड़ी थीं. बच्चे अपने घरों के बचे-खुचे हिस्सों में घूम रहे थे, जबकि बुजुर्ग मलबे को खाली नजरों से देख रहे थे, उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि आने वाली रातें वे कहां बिताएंगे. रायपुर के नकटी गांव में एक प्रस्तावित MLA कॉलोनी के लिए जमीन खाली कराने के मकसद से जिला प्रशासन ने 80 से ज्यादा घर गिरा दिए. प्रशासन के लिए यह अतिक्रमण-विरोधी अभियान था, लेकिन यहां रहने वाले परिवारों के लिए, यह वो दिन था, जब उन्होंने सब कुछ खो दिया.

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भारी पुलिस बल की मौजूदगी में गांव में बुलडोजर एक्शन हुआ और एक के बाद एक घर जमींदोज कर दिए गए. रायपुर जिला प्रशासन ने 'इंडिया टुडे' से कैमरे पर बात नहीं की. हालांकि, अधिकारियों ने फोन पर बताया कि यह जमीन सरकारी चरागाह यानी पशुओं के चरने की जगह है. वहां रहने वालों को कई बार नोटिस दिए गए थे, और यह तोड़-फोड़ छत्तीसगढ़ भू-राजस्व संहिता, 1959 की धारा 248 के तहत की गई थी, जो अधिकारियों को सरकारी जमीन से अतिक्रमण हटाने का अधिकार देती है. लेकिन गांव वाले कुछ और ही कहानी बताते हैं.

'गांव वालों के नाम खसरा नंबर...'

कई गांव के लोगों का दावा है कि वे यहां दशकों से रह रहे हैं. वे 'भुइयां' ऐप में राज्य के जमीन के रिकॉर्ड की ओर इशारा करते हैं, जिसमें खसरा नंबर 460 में गांव वालों के नाम दर्ज हैं. वे एक ऐसा सवाल पूछते हैं, जो इस विवाद का मुख्य मुद्दा बन गया है- "अगर वे अवैध कब्जेदार थे, तो सरकारी एजेंसियों ने उन्हें बिजली कनेक्शन, पानी की सप्लाई और यहां तक कि प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत घर क्यों दिए?" 

अपने घरों के मलबे के पास बैठे इन लोगों के लिए ये सवाल अब भी बिना जवाब के हैं. जिला प्रशासन का कहना है कि बेघर हुए परिवारों को नवा रायपुर के सेक्टर-30 में EWS फ्टैट्स में बसाया जा रहा है. लेकिन पुनर्वास का मुद्दा भी विवाद की एक और वजह बन गया है. गांव वालों का आरोप है कि उन्हें दिए गए फ्लैट्स उनके बड़े संयुक्त परिवारों के हिसाब से बहुत छोटे हैं और उनमें बिजली और कांच की खिड़कियों जैसी बुनियादी सुविधाओं की कमी है. उनका कहना है कि नए घरों को रहने लायक बनाने से पहले ही उनके पुराने घर तोड़ दिए गए थे.

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कांग्रेस ने उठाए सवाल

यह मामला अब एक राजनीतिक टकराव का रूप ले चुका है. कांग्रेस नेता विकास उपाध्याय ने बीजेपी सरकार पर आरोप लगाया कि उसने MLA कॉलोनी बनाने के लिए 95 से ज्यादा परिवारों को बेघर कर दिया. उन्होंने आरोप लगाया कि 95 से ज्यादा घर तोड़े गए, लेकिन प्रभावित परिवारों में से सिर्फ 75 के लिए ही पुनर्वास का इंतजाम किया गया और ये इंतजाम पूरी तरह से लागू होने से पहले ही लोगों को बेदखल कर दिया गया.

बीजेपी ने इन आरोपों को खारिज कर दिया है. कैबिनेट मंत्री केदार कश्यप ने प्रभावित परिवारों के साथ अन्याय होने के आरोपों को नकारते हुए कहा कि किसी के साथ अन्याय नहीं हो रहा है और सरकार पुनर्वास पक्का करेगी. वे कहते हैं, "किसी का घर नहीं तोड़ा जा रहा है. किसी के साथ अन्याय नहीं होगा. यह भारतीय जनता पार्टी की सरकार है." 

प्रशासन का कहना है कि उसने पूरी तरह से कानून के मुताबिक काम किया और सरकारी जमीन से कब्जा हटाने के लिए तोड़-फोड़ ज़रूरी थी. फिर भी, कानूनी दलीलों और राजनीतिक बयानों से परे एक मानवीय संकट भी है.

बारिश में कहां मिलेगी पनाह?

यह तोड़-फोड़ ठीक मॉनसून की शुरुआत में हुई है, जो परिवार कल तक पक्की छतों के नीचे सोते थे, वे अब अपने घरों के मलबे के पास बैठे हैं और सोच रहे हैं कि बारिश आने पर उन्हें कहां पनाह मिलेगी. विकास परियोजनाओं में अक्सर मुश्किल फैसले लेने पड़ते हैं. सरकारों के पास सार्वजनिक जमीन से अतिक्रमण हटाने का कानूनी अधिकार है, लेकिन नकटी की घटनाओं ने इस बड़ी बहस को फिर से छेड़ दिया है कि क्या तोड़-फोड़ से पहले पुनर्वास होना चाहिए, खासकर तब जब परिवारों के सामने बेघर होने का खतरा हो. 

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बैरिकेड्स के उस पार, सरकारी बयानों और राजनीतिक बयानों से दूर, नकटी के लोग बस यह गिन रहे हैं कि उन्होंने क्या-क्या खोया है. उनके घर जा चुके हैं. उनकी यादें मलबे के नीचे दबी हुई हैं. और जैसे-जैसे मॉनसून की पहली बारिश करीब आ रही है, वे किसी आश्वासन का नहीं, बल्कि एक ऐसी जगह का इंतजार कर रहे हैं, जिसे वे फिर से अपना घर कह सकें.

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