दिवाली पर देशभर के घर मिट्टी के दीयों से रोशन होते हैं, लेकिन छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले के सिरसा खुर्द गांव में इन दीयों के साथ सैकड़ों परिवारों की जिंदगी में भी खुशियों का उजाला फैल रहा है. यहां करीब 200 कुम्हार परिवार पुश्तैनी हुनर के दम पर लाखों दीये तैयार कर रहे हैं. इनकी मांग दुर्ग, भिलाई और रायपुर से लेकर अयोध्या तक है. स्थानीय कारीगरों की मेहनत ने इस गांव को 'वोकल फॉर लोकल' और आत्मनिर्भरता की मिसाल बना दिया है.
छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले का सिरसा खुर्द गांव इन दिनों मिट्टी के दीयों के निर्माण में जुटा हुआ है. दीपावली का त्योहार नजदीक आते ही गांव के कुम्हार परिवारों का काम बढ़ गया है. घरों में चाक चल रहे हैं और परिवार के सदस्य दीये बनाने, सुखाने और पकाने में लगे हैं.
गांव के करीब 200 कुम्हार परिवार इस काम से जुड़े हैं. खास बात यह है कि यहां तैयार होने वाले दीये आसपास के बाजारों के अलावा उत्तर प्रदेश के अयोध्या तक भेजे जाते हैं. स्थानीय कारीगरों का पारंपरिक हुनर अब उनकी आजीविका का बड़ा आधार बन रहा है.
अयोध्या के दीपोत्सव तक पहुंच रहे सिरसा के दीये
सिरसा गांव में तैयार मिट्टी के दीयों की मांग दुर्ग, भिलाई और रायपुर जैसे शहरों में है. दीपावली के मौके पर अयोध्या में होने वाले दीपोत्सव के लिए भी यहां से दीये भेजे जाते हैं.
बाहरी व्यापारी सीधे गांव पहुंचकर कुम्हारों से दीये खरीदते हैं और फिर अलग-अलग शहरों में उनकी आपूर्ति करते हैं. इससे स्थानीय कारीगरों को बाजार तक पहुंचने का अवसर मिल रहा है और उनके उत्पादों की बिक्री बढ़ रही है.
गांव के कुम्हारों का कहना है कि दिवाली से करीब 15 दिन पहले ही दीये बनाने का काम तेज हो जाता है. इस दौरान परिवार के सभी सदस्य उत्पादन में जुट जाते हैं.
पंचराम बोले- लकड़ी महंगी होने से बढ़ जाती है लागत
गांव के कुम्हार पंचराम ने बताया कि वे लोग दिवाली के लिए करीब 15 दिन पहले से दीये तैयार कर रहे हैं. यहां बने दीये भिलाई, दुर्ग, रायपुर और अयोध्या भेजे जाते हैं.
उन्होंने बताया कि इस काम से ढाई से तीन सौ परिवारों की आजीविका जुड़ी हुई है. उनके मुताबिक, एक स्तर पर सात से आठ लाख दीयों का निर्माण किया जाता है. दीयों को पकाने में लकड़ी का इस्तेमाल होता है. लकड़ी महंगी होने के कारण लागत बढ़ जाती है और कई बार मुनाफा कम हो जाता है.
पुश्तैनी हुनर से मजबूत हो रही ग्रामीण अर्थव्यवस्था
सिरसा खुर्द के कुम्हारों के लिए मिट्टी के दीये बनाना केवल पारंपरिक काम नहीं, बल्कि रोजगार और आत्मनिर्भरता का जरिया भी है. स्थानीय स्तर पर उत्पादन और सीधे खरीदारी से ग्रामीण कारीगरों को बाजार मिल रहा है.
'वोकल फॉर लोकल' और 'आत्मनिर्भर भारत' जैसे अभियानों की भावना भी इसी में है कि स्थानीय उत्पादों को बढ़ावा मिले और कारीगरों को अपने हुनर से रोजगार के अवसर मिलें.
सिरसा गांव की यह कहानी बताती है कि पुश्तैनी कला और स्थानीय बाजार को प्रोत्साहन मिले तो गांव की अर्थव्यवस्था को मजबूती मिल सकती है. इस दिवाली मिट्टी के दीयों से रोशन होने वाले घरों के साथ उन कुम्हार परिवारों के घरों में भी उम्मीद और खुशियों का उजाला फैल रहा है, जिनकी मेहनत से ये दीये तैयार हो रहे हैं.
रघुनंदन पंडा