मौसम में बदलाव के साथ ही लोगों को छींकें आना, नाक से पानी बहना, आंखों में जलन और गले में खराश की समस्या हो जाती है. डॉक्टर बताते हैं कि ऐसा एलर्जी की वजह से होता है. जब हमारा इम्यून सिस्टम बाहर के कणों को दुश्मन समझकर रिएक्शन देता है तो एलर्जी होती है. लेकिन अब हार्वर्ड से जुड़े मैसाचुसेट्स जनरल ब्रिघम के वैज्ञानिकों ने एक नया खुलासा किया है. इसमें उन्होंने बताया है कि एलर्जी सिर्फ इम्यून सिस्टम के रिएक्शन के कारण नहीं, बल्कि इसके पीछे हमारी सेंसरी नर्व्स हैं, जो एलर्जी को हमेशा के लिए याद रख लेती हैं.
आखिर हमारी सेंसरी नर्व्स याददाश्त कैसे बना लेती हैं? क्यों एक छोटी सी एलर्जी आगे चलकर कई बीमारियों का जाल बुन देती है? और क्या वैज्ञानिक अब इस एलर्जी को जड़ से मिटाने का फॉर्मूला खोज चुके हैं?
पुरानी थ्योरी क्या है
पुरानी थ्योरी के मुताबिक एलर्जी इम्यून सिस्टम के रिएक्शन का हिस्सा है. अब तक यही माना जाता था कि एलर्जी का मतलब है एंटीबॉडीज (IgE) और मास्ट सेल्स का भड़कना है. हार्वर्ड की प्रमुख शोधकर्ता डॉ. कैरोलिन सोकोल के अनुसार, हमारी नाक, सांस की नली और त्वचा की ऊपरी परत में सेंसरी न्यूरॉन्स का एक विशाल जाल बिछा होता है. जब हवा में तैरता हुआ कोई परागकण या एलर्जी का कण आपकी नाक में घुसता है, तो वह सबसे पहले इम्यून सेल से नहीं, बल्कि इन्हीं नर्व सेल्स से टकराता है.
वाशिंगटन पोस्ट और साइंस जर्नल इम्यूनिटी में प्रकाशित डेटा के मुताबिक, नसों के अंदर यह खेल चलता कैसे हैं ये भी बताया गया है: दरअसल, जब कोई एलर्जेन पहली बार नाक की नसों से टकराता है, तो भले ही आपको तुरंत छींक न आए, लेकिन वह नस के अंदर एक खास बायोलॉजिकल सिग्नलिंग पाथवे को एक्टिवेट कर देता है. नस उस खतरे के सिग्नल को अपनी याददाश्त में दर्ज कर लेती है.
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क्या नसों की इस याददाश्त को 'रीसेट' किया जा सकता है?
लोग जो एंटीहिस्टामाइन गोलियां या नेज़ल स्प्रे लेते हैं, वे एलर्जी को कंट्रोल करते हैं. यानी वे सिर्फ लक्षणों को कुछ घंटों के लिए दबाते हैं. जैसे ही दवा का असर खत्म होता है, एलर्जी फिर लौट आती है. ऐसे में रिसर्च में चूहों के मॉडल पर देखा गया कि नसों की यह एलर्जिक मेमोरी हमेशा के लिए पत्थर की लकीर नहीं होती; समय बीतने के साथ यह धीरे-धीरे कमजोर और धुंधली पड़ने लगती है. यानी वैज्ञानिक अब ऐसी दवाओं और मॉलिक्यूल्स पर काम कर रहे हैं जो नर्व सेल्स के इस मेमोरी पाथवे को जानबूझकर 'रीसेट' कर सकें.अगर नसों की याददाश्त मिटा दी गई, तो शरीर परागकणों को बिल्कुल सामान्य हवा की तरह लेना शुरू कर देगा और इंसान हमेशा के लिए एलर्जी से मुक्त हो सकेगा.
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आगे के लिए खुला रास्ता
द वाशिंगटन पोस्ट' की यह ताज़ा रिपोर्ट साबित करती है कि विज्ञान अब बीमारियों को केवल ऊपरी लक्षणों से नहीं, बल्कि नसों और दिमाग के गहरे कनेक्शन से समझने लगा है. यह खोज भविष्य में करोड़ों एलर्जी और अस्थमा के मरीजों को हमेशा के लिए राहत दिलाने का रास्ता खोलेगी.
आजतक हेल्थ डेस्क