मॉर्डना और मर्क कंपनी ने दो कॉम्बिनेशन मिलाकर एक कैंसर वैक्सीन थेरेपी बनाई है. इसको फेज-3 क्लिनिकल ट्रायल में बड़ी सफलता मिली है. यह स्किन कैंसर के हाई रिस्क मरीज जिनकी सर्जरी हो चुकी है उनमें कैंसर को दोबारा होने से रोकती है. लेकिन चर्चा यह है कि ये एक कैंसर वैक्सीन है. हालांकि एक्सपर्ट्स का कहना है कि इसको सिर्फ एक वैक्सीन कहना सही नहीं है. ऐसा इसलिए क्योकि ये ऐसा कोई टीका नहीं है जो स्वस्थ इंसान को कैंसर से बचाने के लिए पहले से लगा दिया जाए.
यह एक पर्सनलाइज्ड कैंसर वैक्सीन थेरेपी है, जिसे मरीज के कैंसर म्यूटेशन की पहचान के आधार पर तैयार किया जाता है. इसका फायदा यह है कि सर्जरी करा चुके हाई रिस्क मेलेनोमा ( एक प्रकार का स्किन कैंसर) वाले मरीजों में उनकी बीमारी के हिसाब से ही इलाज होगा.इसको ही पर्सनलाइज्ड ट्रीटमेंट कहते हैं. डॉक्टर से बात करने पर इसकी पूरी प्रक्रिया को काफी आसानी से समझा जा सकता है. इस बारे में Aajtak.in ने मैक्स हॉस्पिटल में ऑन्कोलॉजी विभाग में डॉ. रोहित कपूर से बातचीत की है.
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पर्सनलाइज्ड कैंसर थेरेपी कैसे करती है काम
डॉ.रोहित बताते हैं कि यह थेरेपी स्किन कैंसर के उन मरीजों के लिए है जिनकी सर्जरी हो चुकी है और कैंसर के दोबारा आने की आशंका है. इसमें शुरुआत मरीज के ट्यूमर से होती है, सर्जरी के बाद निकाले गए कैंसर के टिश्यू की जेनेटिक सीक्वेंसिंग की जाती है. इससे वैज्ञानिक यह पता लगाते हैं कि कैंसर सेल्स में कौन से म्यूटेशन है.
डॉ रोहित कहते हैं कि फेज- 3 के ट्रायल में मरीजों को कीट्रूडा नाम की इम्यूनोथेरेपी दवा और कैंसर वैक्सीन इंटिस्मेरन
कॉम्बिनेशन में दी गई है. ट्रायल में पता चला कि इससे कैंसर के दोबारा लौटने के के रिस्क को कम करने में मदद मिली है
आसान भाषा में कहें तो ये कैंसर की पहचान का तरीका है कि मरीज में कैंसर का कैसा म्यूटेशन है और उसपर किस तरह का इलाज काम करेगा. फिर इलाज के लिए थेरेपी भी उसके कैंसर के हिसाब से ही तैयार की जाएगी. यह कैंसर सेल्स की पहचान करके उसको खत्म कर देगी, इसी वजह से मॉर्डना और मर्क कंपनी की इस थेरेपी ने स्किन कैंसर के इलाज को पहले की तुलना में आसान बना दिया है, हालांकि इसको केवल कैंसर वैक्सीन नहीं, बल्कि पर्सनलाइज्ड कैंसर वैक्सीन थेरेपी कहना ठीक होगा. जो एमआरएनए तकनीक पर काम करेगी.
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शरीर की टी- सेल्स को कैंसर पहचानना सिखाया जाता है
डॉ. रोहित ने बताया कि इस mRNA थेरेपी का मकसद शरीर के इम्यून सिस्टम को कैंसर की पहचान कराना है. इसके बाद टी सेल्स और उनसे जुड़ी कैंसर सेल्स पर हमला करने के लिए सक्रिय हो सकती हैं. इससे कैंसर सेल्स को खत्म करने में मदद मिलती है. इस थेरेपी के आने से सबसे बड़ा बदलाव यह है कि अब हर मरीज के कैंसर की पहचान से उसका अलग इलाज होगा, लेकिन ऐसा तब मुमकिन होगा जब यह थेरेपी आम लोगों के लिए उपलब्ध हो जाएगी.
क्यों इसे कैंसर की वैक्सीन कहना गलत है?
डॉ. रोहित कहते हैं कि यह स्वस्थ लोगों को कैंसर से बचाने वाली पारंपरिक वैक्सीन नहीं, बल्कि मरीज के ट्यूमर की जेनटिक जानकारी के आधार पर बनाई जाने वाली पर्सनलाइज्ड थेरेपी एमआरएनए कैंसर वैक्सीन है.जिसका उद्देश्य सर्जरीके बाद बची कैंसर के खिलाफ टी-सेल्स के रिस्पांस को मजबूत करके फिर से कैंसर होने से रोकना है.
अभिषेक पांचाल