पाकिस्तान के कराची के अस्पताल में एक अजीब मामला आया है. यहां एक 9 महीने की गर्भवती महिला का जब डिलीवरी के लिए ऑपरेशन हुआ तो उसके पेट में बच्चा ही नहीं मिला, जबकि अल्ट्रासाउंड रिपोर्ट में भी करीब 38 हफ्ते की प्रेग्नेंसी बताई गई थी, मामले के सामने आने के बाद परिवार ने अस्पताल पर गंभीर आरोप लगाए है. हालांकि, इस घटना को समझने के लिए सबसे जरूरी सवाल यह है कि डिलीवरी के ऑपरेशन से पहले डॉक्टर किन जांचों और क्लिनिकल चेकअप के जरिए यह पुष्टि करते हैं कि महिला प्रेग्नेंट है या नहीं.
BBC की रिपोर्ट के मुताबिक, इस मामले में पुलिस की जांच के बाद जो तथ्य सामने आए हैं उसने अस्पताल में प्रेग्नेंसी के दौरान होने वाली जांच और डिलीवरी से पहले की मेडिकल तैयारी पर भी सवाल खड़े किए हैं,
डिलीवरी से पहले महिला की कौन सी जांच करना जरूरी है?
गुरुग्राम के फोर्टिस मेमोरियल रिसर्च इंस्टीट्यूट में प्रसूति एवं स्त्री रोग विभाग की डायरेक्टर डॉ. नूपुर गुप्ता बताती हैं कि जब कोई महिला डिलीवरी के लिए अस्पताल आती है तो सबसे पहले उसकी पिछली मेडिकल रिपोर्ट और अल्ट्रासाउंड देखे जाते हैं. वह कहती हैं कि अगर पुरानी रिपोर्ट उपलब्ध नहीं हैं तो महिला की स्थिति के हिसाब से जरूरी जांच कराई जाती है. डॉक्टर यह भी देखते हैं कि प्रेग्नेंसी कितने हफ्ते की है, बच्चे की पोजिशन क्या है और उसकी हार्टबीट कैसी है. कई मामलों में डिलीवरी से पहले उसी समय अल्ट्रासाउंड भी किया जा सकता है, खासकर तब जब डॉक्टर को बच्चे की स्थिति को लेकर कोई सवाल या चिंता हो.
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पाकिस्तान वाली घटना में क्या आया सामने
पाकिस्तान के अस्पताल में हुई इस घटना की पुलिस ने जांच की तो पता चला कि महिला ने अपनी प्रेग्नेंसी की एक झूठी अल्ट्रासाउंड रिपोर्ट बनवाई थी. वह प्रेग्नेंट थी ही नहीं. परिवार उसपर बच्चा कंसीव करना का प्रेशर बना रहा था. इसी घर के कारण उसने झूठी रिपोर्ट बनवा ली थी. लेकिन यहां सवाल यह है कि जब महिला प्रेग्नेंट थी ही नहीं तो केवल एक पुराने अल्ट्रासाउंड के आधार पर उसका ऑपरेशन कैसे कर दिया गया?
डॉ नुपुर कहती हैं कि प्रेग्नेंसी के आखिरी महीनों में बच्चे की स्थिति जानने के लिए सिर्फ एक अल्ट्रासाउंड काफी नहीं होता है. बच्चे की हार्टबीट की जांच जरूरी होती है, डॉक्टर जरूरत के अनुसार डॉप्लर या इलेक्ट्रॉनिक फिटल मॉनिटरिंग जैसे तरीकों का इस्तेमाल कर सकते हैं. NICE की गाइडलाइन के मुताबिक, लेबर के दौरान कुछ खास परिस्थितियों में लगातार CTG मॉनिटरिंग की जरूरत पड़ सकती है, इससे बच्चे की हार्ट रेट पर नजर रखी जाती है.
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क्या ऑपरेशन से पहले अल्ट्रासाउंड किया जाता है?
हां, कुछ परिस्थितियों में ऐसा किया जा सकता है. खासकर अगर बच्चे की पोजिशन, प्लेसेंटा या प्रेग्नेंसी की स्थिति को लेकर कोई सवाल हो. NICE की गाइडलाइन कहती है कि ब्रीच प्रेजेंटेशन यानी बच्चा उल्टी स्थिति में होने की स्थिति में सी-सेक्शन से पहले जितना संभव हो उतना देर से अल्ट्रासाउंड करके बच्चे की पोजिशन की पुष्टि की जानी चाहिए.
आजतक हेल्थ डेस्क