मिर्गी की समस्या से पीड़ित कई बच्चों पर अब इस बीमारी की दवाओं का असर नहीं हो रहा है. आलम ये है कि सही दवा देने के बाद भी बार-बार दौरे पड़ रहे हैं. परिवार महीनों या सालों तक अलग-अलग डॉक्टरों से इलाज कराने के बाद बड़े डॉक्टरों के पास जा रहे हैं. उनके पास ईईजी, एमआरआई हो रहे हैं और दवाएं बदलके दी जा रही हैं. परिवार की उम्मीद हो रहती है कि अब बीमारी का सही कारण पता चलेगा और बच्चे के इलाज का बेहतर रास्ता मिल सकेगा.लेकिन इसमें भी कई मामलों में दवाएं असर नहीं कर रही हैं. मेडिकल की भाषा में डॉक्टर इसको ड्रग-रेजिस्टेंट एपिलेप्सी कह रहे हैं.
एपिलेप्सी को ड्रग-रेजिस्टेंट तब कहा जाता है, जब दो सही दवाएं देने के बाद भी बच्चे को दौरे पड़ते रहें. इसका मतलब सिर्फ यह नहीं है कि दवाएं काम नहीं कर रही हैं. ऐसी स्थिति में बच्चे की आगे की जांच जरूरी हो जाती है, ताकि बीमारी का कारण समझा जा सके और इलाज के दूसरे विकल्पों पर भी विचार किया जा सके.
इलाज हो रहा है मुश्किल
कंसल्टेंट पीडियाट्रिक न्यूरोलॉजिस्ट डॉ. इंद्राशीष रे चौधरी ने इस बारे में Aajtak.in को बताया है. वह कहते हैं कि बच्चों पर दवाओं का असर न होने से इलाज मुश्किल हो रहा है. लगातार दौरे पड़ने से बच्चे की सोचने-समझने की क्षमता, बोलने और भाषा सीखने, व्यवहार, पढ़ाई और सामान्य जीवन पर असर पड़ता है. इसका असर पूरे परिवार पर भी पड़ता है. बच्चे को बार-बार अस्पताल ले जाना, उसकी सुरक्षा को लेकर चिंता, पढ़ाई में रुकावट और मानसिक तनाव जैसी परेशानियां परिवार की रोजमर्रा की जिंदगी को प्रभावित कर सकती हैं.
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समय पर विशेषज्ञ के पास पहुंचना जरूरी
डॉ. चौधरी ने बताया कि ड्रग-रेजिस्टेंट एपिलेप्सी में समय पर विशेषज्ञ से सलाह लेना बहुत जरूरी है, जब दो सही दवाओं के बावजूद दौरे जारी रहते हैं, तो केवल दवाएं बदलते या बढ़ाते रहना हर बच्चे के लिए पर्याप्त नहीं हो सकता. ऐसे समय में बच्चे की जांच किसी विशेषज्ञ एपिलेप्सी सेंटर में कराई जानी चाहिए, जहां बीमारी की सही जांच और इलाज के लिए जरूरी सुविधाएं उपलब्ध हों. बच्चे की स्थिति के अनुसार इलाज में एपिलेप्सी सर्जरी की संभावना की जांच, कीटोजेनिक डाइट, न्यूरोस्टिमुलेशन और जेनेटिक टेस्ट जैसी सुविधाएं शामिल हो सकती हैं। कई बच्चों में बीमारी के सही कारण का पता चलने के बाद इलाज का नया रास्ता भी खुल सकता है.
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इलाज सिर्फ दवाओं तक सीमित नहीं
दिल्ली के जीबी पंत अस्पताल में न्यूरोलॉजी विभाग के पूर्व प्रोफेसर डॉ. विकास प्रीत सिंह ने बताया कि मिर्गी में ड्रग रजिस्टेंस देखा जा रहा है. बीते कुछ सालों में ऐसे मामले लगातार बढ़ रहे हैं. इसका एक कारण दवाओं का सही इस्तेमाल न करना है. डॉ सिंह कहते हैं कि हर बच्चे में एपिलेप्सी का इलाज अलग हो सकता है, यह इस बात पर निर्भर करता है कि बच्चे को किस तरह के दौरे पड़ रहे हैं, बीमारी का कारण क्या है, बच्चे का विकास कैसा है और दवाओं का कितना असर हो रहा है. दौरे की पूरी जानकारी, ईईजी, एमआरआई जैसी जांच और जरूरत पड़ने पर जेनेटिक टेस्ट से बच्चे के लिए सही इलाज तय करने में मदद मिलती है, जिन बच्चों में दवाओं के बावजूद दौरे जारी रहते हैं, उनमें डॉक्टर जरूरत के अनुसार सर्जरी, न्यूरोस्टिमुलेशन या कीटोजेनिक डाइट जैसे दूसरे विकल्पों पर भी विचार कर सकते हैं.
आजतक हेल्थ डेस्क