पाकिस्तान के खिलाफ सबूत थे... तब भी कनाडा में बलोच नेता करीमा की मौत पर चुप रहे थे ट्रूडो!

बलूचिस्तान की आजादी की लड़ाई लड़ रहीं करीमा बलोच की दिसंबर 2020 में संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो गई थी. उनका शव कनाडा के टोरंटो की ओंटारियो झील में मिला था. पुलिस ने दो दिन में ही इसे दुर्घटना बता दिया और केस बंद कर दिया. जबकि, इसके पीछे पाकिस्तान और आईएसआई का नाम सामने आ रहा था. उसके बावजूद कनाडा के पीएम जस्टिन ट्रूडो ने कुछ नहीं कहा था.

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दिसंबर 2020 में करीमा बलोच की मौत हो गई थी. (फाइल फोटो) दिसंबर 2020 में करीमा बलोच की मौत हो गई थी. (फाइल फोटो)

Priyank Dwivedi

  • नई दिल्ली,
  • 20 सितंबर 2023,
  • अपडेटेड 7:36 PM IST

करीमा बलोच. बलूचिस्तान आंदोलन का बड़ा चेहरा. बलूचिस्तान यानी पाकिस्तान का वो प्रांत जहां आजादी की जंग छिड़ी हुई है. करीमा बलोच भी यही लड़ाई लड़ रही थीं. लेकिन पाकिस्तान को ये पसंद नहीं था. उन्हें धमकाया गया. डराया गया. आखिरकार करीमा बलोच को पाकिस्तान छोड़कर कनाडा आना पड़ा. यहां भी उन्हें धमकियां मिलती रहीं. और एक दिन वो अपने घर से निकलीं तो लौटकर ही नहीं आईं. नदी किनारे उनका शव मिला. उनका शव टोरंटो की ओंटारियो नदी के पास मिला था. पुलिस ने सुसाइड बताया. परिवार वाले पाकिस्तान पर आरोप लगाते रहे. कुछ दिन में केस बंद कर दिया गया. इतनी बड़ी नेता की मौत पर कनाडा सरकार की ओर से कोई बयान तक नहीं आया.

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करीमा बलोच की जिस 'कथित' मौत पर कनाडा चुप रहा. वो आज खालिस्तानी आतंकी हरदीप सिंह निज्जर की हत्या पर भारत को बदनाम कर रहा है. 

हरदीप सिंह निज्जर की हत्या 18 जून को कनाडा के सर्रे में सरेबाजार हो गई थी. उसे गोली मारी गई थी. निज्जर वॉन्टेड आतंकी था. उस पर एक लाख रुपये का इनाम भी था. ऐसे आतंकी की मौत पर कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो ने बगैर सबूत के भारत पर इल्जाम लगाया है. 

ट्रूडो ने सोमवार को संसद में कहा, 'बीते कुछ हफ्तों से कनाडा की सुरक्षा एजेंसियां कनाडाई नागरिक हरदीप सिंह निज्जर और भारत सरकार के संभावित कनेक्शन के विश्वनीय आरोपों की सक्रिय तौर पर जांच कर रही है.' हालांकि, जब भारत ने इस पर प्रतिक्रिया दी तो ट्रूडो ने कहा कि उनका मकसद भारत को 'उकसाना' नहीं था.

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बहरहाल, जिस खालिस्तानी आतंकी निज्जर की हत्या को लेकर ट्रूडो आज इतना बड़बोलापन कर रहे है, उन्होंने कभी करीमा बलोच की हत्या पर मुंह तक नहीं खोला था. सामाजिक कार्यकर्ताओं से लेकर कनाडा के सांसदों तक ने ट्रूडो से करीमा बलोच की मौत की जांच कराने की मांग की थी. बलोच एक्टिविस्ट दावा कर रहे थे कि करीमा बलोच की हत्या में पाकिस्तान और उसकी खुफिया एजेंसी आईएसआई का हाथ है. लेकिन उन्होंने जांच कराना तो दूर, कुछ कहना भी ठीक नहीं समझा था. 

क्या हुआ था करीमा बलोच के साथ?

करीमा बलोच बलूचिस्तान की आजादी के लिए लड़ रही थीं. इसके लिए उन्हें लगातार धमकियां भी मिलती थीं. उन पर पाकिस्तानी सरकार ने आतंकवाद का केस लगा दिया था. आखिरकार साल 2015 में करीमा अपनी छोटी बहन महगंज के साथ कनाडा आ गईं.

महगंज ने एक इंटरव्यू में कहा, 'वो विदेश इसलिए नहीं आईं, क्योंकि वो यहां आना चाहती थीं. बल्कि इसलिए आईं क्योंकि पाकिस्तान में रहना दूभर हो गया था.'

2016 में कनाडा ने उन्हें शरण दे दी. 20 दिसंबर 2020 को उन्हें आखिरी बार देखा गया था. अगले ही दिन ओंटारियो लेक के पास उनका शव मिला. 

टोरंटो पुलिस ने उनकी मौत को 'आत्महत्या' माना. टोरंटो पुलिस ने बयान जारी कर कहा, 'जांच के आधार पर तय किया गया है कि ये एक गैर-आपराधिक मौत है और इसमें कुछ भी संदिग्ध नजर नहीं आता.'

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हैरान करने वाली बात ये है कि टोरंटो पुलिस ने ये बयान करीमा बलोच का शव मिलने के 48 घंटे के भीतर ही जारी कर दिया था. और जांच बंद कर दी.

जांच की मांग उठी, लेकिन हुआ कुछ नहीं

पुलिस की थ्योरी पर सवाल उठे. बलोच एक्टिविस्ट ही नहीं, बल्कि नेताओं-कार्यकर्ताओं तक ने करीमा बलोच की संदिग्ध मौत पर सवाल उठाए. जांच की मांग हुई, लेकिन इन्हें नजरअंदाज कर दिया गया.

कनाडा के पूर्व मंत्री क्रिस अलेक्जेंडर ने सोशल मीडिया पर लिखा था, 'करीमा को जानने वाले हम सभी उनकी मौत को संदिग्ध मानते हैं. हमें इसकी सच्चाई को सामने लाने के लिए कोई कसर नहीं छोड़नी चाहिए.'

वैनकुवर स्थित वर्ल्ड बलोच वुमन फोरम की अध्यक्ष नीला कादरी बलोच का मानना था कि पुलिस ने जल्दबाजी में करीमा की मौत को दुर्घटना और आत्महत्या बता दिया. कादरी ने कहा था, दुनियाभर के मानवाधिकार संगठनों ने कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो को ईमेल भेज और सोशल मीडिया पर अपील कर करीमा की मौत की गहरी जांच की मांग की, लेकिन कुछ नहीं किया गया.

मानवाधिकारों पर काम करने वाली संस्था एमनेस्टी इंटरनेशनल ने कहा था, 'कनाडा के टोरंटो में एक्टिविस्ट करीमा बलोच की मौत बेहद चौंकाने वाली है. इसकी तुरंत और प्रभावी ढंग से जांच की जानी चाहिए. दोषियों को इसकी सजा मिलनी चाहिए.'

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ह्यूमन राइट्स काउंसिल ऑफ बलूचिस्तान ने भी जस्टिन ट्रूडो की सरकार से इस मामले को देखने की अपील की थी.

हत्या में पाकिस्तान का नाम आया था सामने

करीमा बलोच की हत्या में पाकिस्तान और उसकी खुफिया एजेंसी आईएसआई का नाम सामने आया था. करीमा के परिवार और दोस्तों ने मीडिया को बताया था कि कनाडा आने के बाद भी पाकिस्तान से उन्हें धमकियां मिल रही थीं.

मौत से कुछ दिन पहले भी करीमा को एक धमकी भरा मैसेज मिला था. इसमें लिखा था, 'अगर उन्होंने अपना एक्टिविज्म नहीं छोड़ा तो उन्हें क्रिसमस पर ऐसा तोहफा मिलेगा, जिसे वो कभी नहीं भूलेंगी.'

इतना ही नहीं, करीमा और उनके पति को ऐसा भी लगता था कि कोई उनका पीछा कर रहा है. कुछ दिन पहले ही एक फोन भी आया था. इसमें कॉलर ने उन्हें धमकाते हुए पाकिस्तान लौट आने को कहा था. जब करीमा ने मना कर दिया तो कॉलर ने कहा कि 'आप एक दिन पहले टोरंटो पार्क गई थीं'. इसके जरिए कॉलर बताना चाहता था कि वो जहां कहीं भी हों, छिप नहीं सकती हैं.

लगातार मिल रही थीं धमकियां!

उनकी हत्या में पाकिस्तानी साजिश के कई सबूत हैं. सीबीसी रेडियो ने 'द किल लिस्ट' ने एक पॉडकास्ट में बताया था कि पाकिस्तानी अधिकारी करीमा के परिवार को धमका रहे थे और उन्हें कनाडा से वापस बुलाने को कह रहे थे. लेकिन उनके परिवार ने मना कर दिया था, क्योंकि उन्हें डर था कि करीमा को टॉर्चर रूम में मार दिया जाएगा.

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एक रिपोर्ट के मुताबिक, जिस दिन करीमा का शव मिला, उसी दिन एक पाकिस्तानी कारोबारी ने सोशल मीडिया पर लिखा 'करीमा डन', लेकिन कुछ ही देर में इसे हटा लिया गया. ये कारोबारी कथित तौर पर पाकिस्तानी सरकार और सेना के साथ काम करता था.

करीमा के पति हम्माल हैदर ने ब्रिटिश अखबार द गार्डियन को बताया था, 'मैं मान ही नहीं सकता कि उसने सुसाइड की होगी. वो एक स्ट्रॉन्ग लेडी थी. और अच्छे मूड से घर से निकली थीं. उन्हें लगातार धमकियां मिल रही थीं. उन्होंने पाकिस्तान छोड़ा क्योंकि उनके घर पर दो बार रेड डाली गई थी. उन्हें एक्टिविज्म छोड़ने के लिए धमकाया जा रहा था, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया और कनाडा आ गईं.'

उनकी बहन महगंज बलोच ने एक इंटरव्यू में बताया था, 'हम तीन बजे उनका शव लेकर कराची एयरपोर्ट पहुंचे थे. तब वहां हमारा मजाक उड़ाया जा रहा था. दो पुलिसवालों ने हाई-फाइव करते हुए कहा था कि अब इन्होंने हमारी ताकत देखी.'

उन्होंने बताया कि जब हम उन्हें अपने होमटाउन में दफना रहे थे, तब भी कुछ पुलिसवाले वहां आए और हमें धमकाते हुए कहा कि अगर उनकी बात नहीं मानी तो वो शव को खुद दफना देंगे और उन्हें उनकी कब्र का कभी पता नहीं चलेगा.

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पर चुप रहे ट्रूडो

करीमा बलोच उस समय 37 साल की थीं. उनकी तैरती हुई लाश झील से मिली थी. लेकिन पुलिस ने कहा कि उनकी मौत में कुछ भी 'संदिग्ध' नहीं है.

करीमा बलोच की मौत को लगभग तीन साल होने वाले हैं. लेकिन उनकी मौत पर आज भी रहस्य बना हुआ है. 

कई बलूच संगठनों ने मिलकर एक बयान जारी किया था और उनकी मौत की जांच की मांग की थी. एमनेस्टी इंटरनेशनल जैसी अंतरराष्ट्रीय संस्था ने भी उनकी मौत को 'संदिग्ध' माना था. उसकी बावजूद न ही कनाडा सरकार ने कुछ बोला और न ही प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो ने.

कौन थीं करीमा बलोच?

करीमा बलोच का असली नाम करीमा महराब था. वो बलूचिस्तान की आजादी की लड़ाई लड़ रही थीं. साल 2006 में करीमा बलूच स्टूडेंट्स ऑर्गनाइजेशन में शामिल हो गईं और बाद में उसकी अगुवाई करने लगीं.

साल 2013 में बीएसओ पर बैन लगा दिया गया. आरोप लगा कि बीएसओ पाकिस्तान को अस्थिर करने के लिए विदेश से फंडिंग ले रहा है. बैन के दो साल बाद 2015 में करीमा को इसका नेता चुन लिया गया. 

2014 में करीमा ने एक इंटरव्यू में कहा था, 'हमारा शांतिपूर्ण संघर्ष अब एक जहर में बदल गया है. बीते तीन साल में हमारे कई सदस्यों की बेरहमी से हत्या कर दी गई है और हजारों का अपहरण हो गया है. दो महीने पहले ही हमारे संगठन के प्रमुख को मेरी आंखों के सामने किडनैप कर लिया गया. उनसे पहले 2009 में संगठन के वाइस चेयरमैन जाकिर मजीद का भी अपहरण हो गया था. वो अब भी लापता हैं. हमारी गर्दन के चारों तरफ फांसी का फंदा कस दिया गया है.'

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2015 में जब करीमा बीएसओ की अध्यक्ष बनीं तो कुछ ही महीनों बाद आतंकवाद का मामला दर्ज किया गया. इसके कुछ दिन बाद करीमा ने पाकिस्तान छोड़ दिया और कनाडा चली आईं. कनाडा में करीमा शरणार्थी की तरह जी रही थीं.

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