पूरी दुनिया महात्मा गांधी को बापू कहती है. लेकिन उनके बड़े बेटे हरिलाल गांधी के लिए यह रिश्ता उतना सहज नहीं था. एक तरफ महात्मा गांधी ऐसे महापुरुष थे, जिनके सामने देश झुकता था और जिनके सिद्धांतों ने करोड़ों लोगों को प्रभावित किया. दूसरी तरफ उनके बेटे हरिलाल थे, जो अपने पिता की छाया में अलग पहचान बनाने के लिए लगातार संघर्ष करते रहे. 2007 में आई अक्षय खन्ना की फिल्म Gandhi, My Father पिता और बेटे के इस वास्तविक और जटिल संबंधों को केंद्र में रखती है.
हरिलाल गांधी पर बनी इस फिल्म का आधार लेखक और शोधकर्ता चंदूलाल भागुभाई दलाल की किताब को माना गया है, जिसे चिट्ठियों, गांधी परिवार के दस्तावेजों और साबरमती आश्रम के अभिलेखों के आधार पर लिखा गया था. महात्मा गांधी और कस्तूरबा के चार बेटे हरिलाल, मणिलाल, रामदास और देवदास थे. इनमें से हरिलाल के साथ गांधी का रिश्ता सबसे ज्यादा तनावपूर्ण माना गया. महात्मा गांधी का अपने बेटों से रिश्ता काफी हद तक उनके कठोर आदर्शों और जीवन पद्धति से प्रभावित था. हरिलाल उनके बड़े बेटे थे. वह बैरिस्टर बनना चाहते थे, लेकिन गांधी चाहते थे कि उनके बेटे पश्चिमी ढंग की उच्च शिक्षा और व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा के बजाय देशसेवा और उनके आदर्शों को अपनाएं. इसी मुद्दे पर दोनों के बीच गहरा टकराव हुआ. बाद में हरिलाल ने पिता से दूरी बना ली और उनका जीवन शराब, आर्थिक परेशानियों और पारिवारिक टूटन से घिरता गया.
गांधी का मानना था कि पश्चिमी ढंग की शिक्षा और व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा से ज्यादा जरूरी देश की सेवा और उस संघर्ष का हिस्सा बनना है, जिसमें वह खुद उतर चुके थे. जब दक्षिण अफ्रीका में गांधी के परिचित ने उनके किसी बेटे को इंग्लैंड भेजने के लिए स्कॉलरशिप की संभावना जताई, तो गांधी ने यह सुनिश्चित करना चाहा कि वह स्कॉलरशिप गांधी के किसी बेटे को नहीं बल्कि सबसे योग्य भारतीय युवक को मिले.
इस घटना को समझे बिना गांधी और हरिलाल के रिश्ते को समझना मुश्किल है. गांधी अपने बेटों से प्रेम करते थे, लेकिन वह अपने परिवार के लिए वही जीवन नहीं चाहते थे जो एक सामान्य पिता अपने बच्चों के लिए चाहता है. उनके लिए परिवार भी उनके प्रयोगों, संयम और सार्वजनिक जीवन का हिस्सा था. दूसरी ओर हरिलाल अपने पिता को केवल राष्ट्रपिता के रूप में नहीं, अपने पिता के रूप में देखना चाहते थे. उनमें अपनी जिंदगी के फैसले खुद लेने की इच्छा थी. यही वह बिंदु था जहां गांधी के लिए उनके सिद्धांत और हरिलाल के लिए व्यक्तिगत अधिकार आमने-सामने खड़े हो गए.
हरिलाल ने स्वतंत्रता आंदोलन में हिस्सा भी लिया और दक्षिण अफ्रीका में सत्याग्रह के दौरान जेल भी गए. कुछ समय तक वह अपने पिता के साथ उसी संघर्ष का हिस्सा थे, इसलिए यह कहना गलत होगा कि उनकी पूरी जिंदगी गांधी के विरोध में ही बीती लेकिन धीरे-धीरे दोनों की राहें अलग होती गईं. हरिलाल ने कारोबार में हाथ आजमाया, कई प्रयास किए लेकिन आर्थिक स्थिरता हासिल नहीं कर पाए. पत्नी गुलाब की 1918 की महामारी में मृत्यु के बाद उनकी जिंदगी और ज्यादा बिखरती गई. उनके निजी जीवन में शराब की समस्या भी बढ़ी और पिता के साथ वैचारिक तथा व्यक्तिगत दूरी लगातार गहरी होती गई.
गांधी के लिए हरिलाल की हालत सिर्फ एक बेटे की निजी समस्या नहीं रह गई थी. 1930 के दशक तक उनके पत्रों में हरिलाल के शराब पीने, आर्थिक परेशानियों और निजी जीवन को लेकर गहरी चिंता दिखाई देती है. 1934 के एक पत्र में गांधी ने उनसे शराब, धूम्रपान और दूसरी आदतों के बारे में सीधे सवाल किए और आर्थिक मदद देने से पहले उनके व्यवहार में बदलाव का प्रमाण मांगा.
महात्मा गांधी ने 1935 में लिखे एक पत्र में हरिलाल की समस्या को बेहद गंभीर बताया था. इन पत्रों से यह भी पता चलता है कि पिता और बेटे के बीच रिश्ता पूरी तरह खत्म नहीं हुआ था. उसमें नाराजगी, निराशा, कठोरता और साथ ही चिंता और प्रेम सब एक साथ मौजूद थे.
यही इस रिश्ते की सबसे त्रासद बात थी. गांधी हरिलाल के व्यवहार से बेहद निराश थे, लेकिन वह उनसे पूरी तरह भावनात्मक रूप से अलग भी नहीं हो पाए. गांधी के अपने शब्दों में, हरिलाल की कमियों के बावजूद वह उससे प्रेम करते थे यानी समस्या यह नहीं थी कि पिता को बेटे की परवाह नहीं थी. समस्या यह थी कि दोनों एक-दूसरे से जिस तरह का रिश्ता चाहते थे, वह रिश्ता बन ही नहीं पाया. हरिलाल को लगता रहा कि उनके पिता ने राष्ट्र और अपने सिद्धांतों को परिवार से ऊपर रखा. वहीं, महात्मा गांधी को लगता रहा कि बेटे को अपनी जिंदगी की जिम्मेदारी खुद उठानी चाहिए और वह उसके गलत फैसलों को केवल पिता होने के नाम पर स्वीकार नहीं कर सकते.
फिर आया 1936, जब हरिलाल ने इस रिश्ते में सबसे बड़ा और सबसे सार्वजनिक मोड़ ला दिया. 29 मई 1936 को मुंबई की जुम्मा मस्जिद में उन्होंने इस्लाम स्वीकार करने की घोषणा की और अपना नाम अब्दुल्ला गांधी रख लिया. इस घटना ने पूरे देश का ध्यान खींचा. लेकिन इसे सिर्फ गांधी के खिलाफ हरिलाल की बगावत कहना इतिहास को बहुत सरल बना देना होगा. धर्म परिवर्तन के समय गांधी ने खुद सार्वजनिक रूप से कहा था कि अगर यह फैसला हरिलाल ने दिल से और किसी सांसारिक लाभ की इच्छा के बिना लिया है, तो उन्हें उसके धर्म बदलने पर आपत्ति नहीं होगी. गांधी इस्लाम को सम्मान देने की बात भी स्पष्ट रूप से कहते थे. उनकी आपत्ति धर्म से ज्यादा इस बात को लेकर थी कि उन्हें हरिलाल का परिवर्तन आध्यात्मिक बदलाव के बजाय परिस्थितियों और निजी हितों से प्रेरित लगता था.
हरिलाल के धर्म परिवर्तन से कस्तूरबा गांधी भी बेहद आहत हुई थीं. उन्होंने सितंबर 1936 में बेटे को पत्र लिखा. उस पत्र में एक मां की चिंता, गुस्सा और बेबसी साफ दिखाई देती है. कस्तूरबा को यह भी डर था कि हरिलाल की व्यक्तिगत परेशानियों का फायदा उठाकर कुछ लोग उसे धार्मिक प्रचार के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं. उन्होंने उन मुस्लिम मित्रों को भी पत्र लिखा, जो हरिलाल के धर्म परिवर्तन के बाद उसे सार्वजनिक रूप से मौलवी कहते थे. कस्तूरबा का मानना था कि इससे उनके बेटे की स्थिति सुधरने के बजाय और खराब हो रही है. गांधी संग्रहालय, मणि भवन में संरक्षित उनके पत्र इस पूरे प्रसंग का महत्वपूर्ण प्राथमिक दस्तावेज हैं.
दिलचस्प बात यह है कि हरिलाल का यह धर्म परिवर्तन स्थायी नहीं रहा. उसी साल उन्होंने आर्य समाज की प्रक्रिया के जरिए दोबारा हिंदू धर्म अपनाया. गांधी के पत्राचार के अभिलेखों में नवंबर 1936 में उनके दोबारा धर्म परिवर्तन के कारणों से जुड़ा दस्तावेज भी दर्ज है यानी हरिलाल का धर्म परिवर्तन किसी एक सीधी राजनीतिक या पारिवारिक रेखा में समझना मुश्किल है. उनके जीवन में धार्मिक पहचान, निजी संघर्ष, पिता से दूरी, आत्मसम्मान और अपनी जिंदगी को फिर से संभालने की कोशिशें एक-दूसरे में उलझी हुई थीं.
हरिलाल और गांधी का रिश्ता जीवन के आखिरी वर्षों तक पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ. दोनों के बीच दूरी रही, शिकायतें रहीं, लेकिन संपर्क भी बना रहा. हरिलाल की जिंदगी धीरे-धीरे शराब, आर्थिक संकट और अकेलेपन में उलझती चली गई. 1948 में गांधी की हत्या के कुछ महीने बाद हरिलाल की भी मृत्यु हो गई. जिस व्यक्ति के पिता को पूरी दुनिया बापू कहती थी, वह खुद अपनी जिंदगी के आखिरी दौर में बेहद अकेला और टूट चुका था. यही वह विडंबना है, जो हरिलाल की कहानी को सिर्फ गांधी के बेटे की कहानी नहीं रहने देती.
गांधी, माई फादर की असली ताकत इसी त्रासदी में है. यह कहानी किसी एक व्यक्ति को खलनायक या किसी दूसरे को निर्दोष साबित करने की कहानी नहीं है. गांधी अपने सिद्धांतों के प्रति असाधारण रूप से प्रतिबद्ध पिता थे, लेकिन उन्हीं सिद्धांतों की कठोरता का असर उनके सबसे बड़े बेटे पर पड़ा. हरिलाल भी सिर्फ एक विद्रोही या असफल बेटा नहीं था. वह ऐसा व्यक्ति था जो अपने पिता की विशाल सार्वजनिक पहचान के बीच अपनी स्वतंत्र पहचान तलाशते रहेा और कई बार गलत रास्तों पर चले गए. दोनों के बीच प्रेम था, लेकिन उस प्रेम को जीने का तरीका अलग था.
महात्मा गांधी के अन्य बेटों में मणिलाल अपने पिता के विचारों के करीब रहे. वह दक्षिण अफ्रीका में रहे और गांधी के विचारों और आंदोलन से जुड़े रहे. उन्होंने इंडियन ओपिनियन अखबार के काम को संभाला और लंबे समय तक दक्षिण अफ्रीका में गांधीवादी काम करते रहे. रामदास, महात्मा गांधी के तीसरे बेटे थे.वह भी स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े और बाद में सामाजिक कार्यों में सक्रिय रहे. देवदास गांधी सबसे छोटे बेटे थे. वह पत्रकारिता से जुड़े. गांधी के अंतिम वर्षों में भी उनका परिवार से करीबी संपर्क था.
आजतक एंटरटेनमेंट डेस्क