कत्ल, नकाब और खुद की तलाश... रिश्तों में 'गैसलाइटिंग' की शिकार होती एक स्त्री की कहानी है यह मर्डर मिस्ट्री

बबीता की कहानी इसलिए सिर्फ पितृसत्ता की कहानी नहीं People Pleasing की कहानी भी है. बचपन से लड़कियों को सिखाया जाता है कि अच्छी लड़की वह है जो झगड़ा न करे, अच्छी बहू वह है जो एडजस्ट कर ले और अच्छी पत्नी वह है जो पति की परेशानी समझे. धीरे-धीरे अच्छा होना दायित्व लगने लगता है और बबीता इसी जाल में फंसी हुई है.

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दोस्त के मर्डर की मिस्ट्री और खुद के अस्तित्व की जंग में उलझी बबीता. (Photo: ITG) दोस्त के मर्डर की मिस्ट्री और खुद के अस्तित्व की जंग में उलझी बबीता. (Photo: ITG)

रितु तोमर

  • नई दिल्ली,
  • 30 अगस्त 2026,
  • अपडेटेड 1:17 PM IST

बबीता सिंह रिपोर्टिंग देखते हुए पहली नजर में लगता है कि हम एक मर्डर मिस्ट्री देख रहे हैं. एक महिला पुलिस अफसर है, उसके बचपन के दोस्त का कत्ल हो जाता है, शक के घेरे में कई चेहरे हैं और बबीता उन चेहरों के पीछे छिपे सच को तलाश रही है. लेकिन फिल्म खत्म होने के बाद अगर आपके दिमाग में सिर्फ यह सवाल रह जाए कि बंसी को किसने मारा, तो शायद आपने फिल्म का सबसे दिलचस्प हिस्सा मिस कर दिया क्योंकि बबीता सिंह रिपोर्टिंग असल में किसी कातिल की तलाश से ज्यादा उस औरत की खुद की तलाश है, जो सालों से दूसरों को खुश करने के चक्कर में कहीं अपने ही भीतर खो गई है.

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बबीता पुलिस में है. उसके पास वर्दी है, पद है और पूछताछ का अधिकार है लेकिन घर पहुंचते ही जैसे उसकी हिम्मत दरवाजे की दहलीज पर ही छूट जाती है. वहां वह पुलिस अफसर नहीं एक बहू, एक पत्नी और भाभी है. वह वही औरत है जिसे साड़ी पसंद करने से पहले भी दस बार सोचना पड़ता है, जिसे परिवार की सुविधा के हिसाब से अपने फैसले बदलने की आदत पड़ चुकी है और जिसे ना कहना शायद किसी अपराध से कम नहीं लगता. 

और शायद यही वजह है कि बबीता कोई टिपिकल फिल्मी महिला पुलिसकर्मी नहीं लगती. वह दबंग नहीं है. हर वक्त अकड़कर चलने वाली लेडी सिंघम नहीं है. उसके पास वर्दी है लेकिन आत्मविश्वास की कमी है. वह गलतियां करती है, हिचकती है, दूसरों से सलाह लेती है, कई बार खुद अपने फैसले पर भरोसा नहीं कर पाती. असली जिंदगी की ज्यादातर औरतें ऐसी ही तो होती हैं. उन्हें धीरे-धीरे यह यकीन दिलाया जाता है कि वे शायद उतनी सक्षम हैं ही नहीं. 

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बबीता सिंह रिपोर्टिंग का एक सीन

बबीता की कहानी इसलिए सिर्फ पितृसत्ता की कहानी नहीं People Pleasing की कहानी भी है. बचपन से लड़कियों को सिखाया जाता है कि अच्छी लड़की वह है जो झगड़ा न करे, अच्छी बहू वह है जो एडजस्ट कर ले और अच्छी पत्नी वह है जो पति की परेशानी समझे. धीरे-धीरे अच्छा होना दायित्व लगने लगता है और बबीता इसी जाल में फंसी हुई है.

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इसलिए फिल्म का सबसे बड़ा विरोधाभास यही है कि बबीता एक पुलिस अफसर होकर भी अपनी जिंदगी में आरोपी की तरह रहती है. हर फैसला लेने से पहले उसे लगता है कि उसे सफाई देनी होगी. बबीता जितना बंसी की मौत के करीब जाती है, उतना ही वह खुद के करीब पहुंचती है. वह बाहर सबूत तो भीतर आत्मविश्वास ढूंढ रही है. यही वजह है कि फिल्म में घर के छोटे-छोटे दृश्य हत्या की जांच जितने ही महत्वपूर्ण हो जाते हैं. साड़ी को लेकर होने वाली बातचीत, परिवार की उम्मीदें, शरीर और वजन को लेकर टिप्पणियां, पति का तथाकथित केयरिंग व्यवहार, सास की तानेबाजी. ये सब किसी बड़े खलनायक की तरह सामने नहीं आते.

जब किसी औरत की जिंदगी में हर फैसला इस आधार पर लिया जाए कि दूसरों को क्या अच्छा लगेगा तो धीरे-धीरे उसका अपना व्यक्तित्व ही गायब होने लगता है. बबीता इसी गायब होते व्यक्तित्व को वापस हासिल करने की कहानी है. यहां बबीता के किरदार में मलयालम एक्ट्रेस निमिषा सजयन का अभिनय ही है, जो फिल्म को बचाने का काम करता है. फिल्म में वह अपने भीतर पल रहे गुस्से को दबाकर रखती हैं. चेहरे पर हमेशा एक हल्की हिचक है, बॉडी लैंग्वेज में संकोच है, आवाज में ठहराव है लेकिन जैसे-जैसे जांच आगे बढ़ती है, उसी चेहरे पर आत्मविश्वास भी दिखाई देने लगता है. 

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फिल्म का एक और सबसे दिलचस्प और मारक पहलू यह है कि बबीता को यह नौकरी अनुकंपा के आधार पर मिली है. इसी एक बात को हथियार बनाकर उसे बार-बार यह अहसास कराया जाता है कि वह इस वर्दी के काबिल नहीं है. असल जिंदगी में यही गैसलाइटिंग का सबसे खतरनाक रूप है, जब किसी की मेहनत को नजरअंदाज करके उसे लगातार यह यकीन दिलाया जाए कि वह जहां है, सिर्फ दया या अहसान की वजह से है. महकमे के सहकर्मियों से लेकर घर के सदस्यों तक हर कोई उसके आत्मविश्वास को तोड़ने के लिए इसी बात का इस्तेमाल करता है. फिल्म इन सवालों को किसी भारी-भरकम भाषण में नहीं बदलती. वह इन्हें बबीता की रोजमर्रा की जिंदगी में छोड़ देती है.

फिल्म का क्राइम इन्वेस्टिगेशन वाला हिस्सा उतना मजबूत नहीं है और आखिरी हिस्से में रहस्य की पकड़ ढीली पड़ती है लेकिन शायद यही कमजोरी अनजाने में फिल्म की दूसरी ताकत को और सामने ला देती है क्योंकि जैसे-जैसे हम कातिल को खोजने की बेचैनी छोड़ते हैं, वैसे-वैसे बबीता को समझने में ज्यादा दिलचस्पी लेने लगते हैं.

और यही इस फिल्म को देखने का मेरा तरीका बदल देता है. बबीता जिस केस को सुलझाने निकली है, उसका सबसे बड़ा सुराग कोई फोन कॉल, सबूत या कोई संदिग्ध नहीं है. सबसे बड़ा सुराग खुद बबीता है. उसका चुप रहना. हर बात पर समझौता करना. दूसरों की सुविधा को अपनी जरूरत से ऊपर रखना. हर बार खुद को पीछे कर लेना. जब किसी इंसान को साल दर साल यह यकीन दिलाया जाए कि उसकी अपनी इच्छाएं, उसका वजूद और उसकी राय कोई मायने नहीं रखती, तो एक दिन वह अपनी ही असली आवाज को पहचानना भूल जाता है. बबीता की यह जांच असल में किसी मुजरिम को पकड़ने की नहीं, बल्कि उसी दबी हुई, खोई हुई आवाज की तलाश का सफर है.

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इसीलिए बबीता सिंह रिपोर्टिंग को महज मर्डर मिस्ट्री सुलझाती एक महिला पुलिसकर्मी की कहानी कहना इसके साथ नाइंसाफी होगी. यह उन लाखों महिलाओं की अनकही कहानी है जिनके पास डिग्रियां हैं, नौकरी है, वेतन है और अपनी राय भी है लेकिन इसके बावजूद उन्हें अपने जीवन का कोई भी छोटा या बड़ा फैसला लेने से पहले एक अजीब सा अपराधबोध महसूस होता है. यह उन दफ्तरों की कहानी है, जहां वे अपनी बात आत्मविश्वास से रख सकती हैं, लेकिन घर की चाहरदीवारी के भीतर वही बात जुबान पर लाने से पहले उन्हें सौ बार यह सोचना पड़ता है.

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