लालू प्रसाद यादव के बड़े बेटे तेज प्रताप यादव को कभी कृष्ण की वेशभूषा, कभी शिव के रूप, कभी अपने ही अंदाज में राजनीति करते सबने खूब देखा है. एक ऐसा आदमी जिसकी सार्वजनिक पहचान हमेशा उसके आसपास की चीजों से तय होती रही. एक बड़ा राजनीतिक परिवार, कद्दावर पिता और उससे भी बड़ी राजनीतिक विरासत लेकिन कैमरा जब राजनीति से बाहर तेज प्रताप पर ठहरता है, तो तस्वीर कुछ और निकलती है. वहां लालू का बेटा कहीं पीछे छूट जाता है और सामने आता है एक ऐसा आदमी जो बांसुरी बजाता है, बेवजह हंसता है, लोगों को छेड़ता है, मजाक करता है, फ्लर्ट करता है और कई बार ऐसी मासूमियत से पेश आता है जैसे उसे पता ही न हो कि कैमरे के उस पार लाखों लोग उसे देख रहे हैं.
यही तेज प्रताप इन दिनों राइज एंड फॉल 2 में नजर आ रहे हैं और शायद यही वजह है कि शो में उनकी मौजूदगी सिर्फ इसलिए दिलचस्प नहीं है कि वह लालू के बेटे हैं. दिलचस्प इसलिए है क्योंकि लोग जानना चाहते हैं कि राजनीति के बाहर वह कैसे हैं? रियलिटी शो ने उन्हें वह जगह दी है जहां उन्हें भाषण नहीं देना, पार्टी लाइन नहीं बचानी, किसी राजनीतिक सवाल का जवाब नहीं देना. यहां उन्हें बस वैसा रहना है, जैसे वह हैं. कैमरे के सामने उनकी यही सहजता धीरे-धीरे उनकी नई पहचान बनाती दिख रही है. ऐसे में कैमरे की सहजता ने उन्हें लोगों की पसंद बना दिया. आज वह शो के लिए टीआरपी बटोर रहे हैं और दर्शकों की पसंद बने हुए हैं.
तेज प्रताप का यह रूप पूरी तरह नया भी नहीं है. उनके व्यक्तित्व में हमेशा से एक अजीब सी बेफिक्री रही है. राजनीति के बेहद गंभीर माहौल में भी वह कई बार अपने पहनावे या अंदाज से बाकी नेताओं से अलग नजर आए. फर्क सिर्फ इतना है कि राजनीति में उनके इस स्वभाव को अक्सर हल्के में लिया गया. लेकिन मनोरंजन की दुनिया में यही चीजें उनके व्यक्तित्व का अहम हिस्सा बनती नजर आ रही हैं. उनका बांसुरी बजाना किसी पॉलिटिकल स्ट्रैटेजी का हिस्सा नहीं है. उनकी हंसी किसी भाषण का पार्ट नहीं है और ना ही उनकी शरारतें किसी बयान का हिस्सा भर हैं. वह कैमरे के सामने और पीछे बस तेजू भैय्या हैं.
भोजपुरी बवाल से मनोरंजन की दुनिया में कदम रखने के बाद राइज एंड फॉल 2 तक पहुंचना इसलिए भी दिलचस्प है कि तेज प्रताप अब कैमरे के सामने नए नहीं रहे. शुरुआत में जिस नेता को रियलिटी शो के फॉर्मेट में देखकर सवाल उठता था कि वह यहां कितना सहज होंगे? अब वही आदमी कैमरे के साथ घुलता-मिलता नजर आता है. वह सिर्फ कैमरे के सामने मौजूद नहीं है, कैमरे के साथ खेल रहा है. कभी किसी को छेड़ना, कभी हंसाना, कभी अपनी धुन में बांसुरी बजाना और कभी बिल्कुल अनगढ़ अंदाज में अपनी बात कह देना. इन छोटे-छोटे पलों में वह उस तेज प्रताप से अलग दिखाई देते हैं जिसे राजनीति ने सालों से हमारे सामने पेश किया है.
रियलिटी शो की दुनिया की यही खासियत है. यहां किसी आदमी का बनाया हुआ सार्वजनिक व्यक्तित्व ज्यादा देर तक अकेला नहीं टिकता. असली परीक्षा उन छोटे पलों में होती है जब आदमी को पता होता है कि कैमरा चल रहा है, लेकिन फिर भी वह अपनी आदतों से बाज नहीं आ पाता. तेज प्रताप के मामले में यह विरोधाभास दिलचस्प है. वह एक ऐसे परिवार से आते हैं जहां सार्वजनिक जीवन बचपन से निजी जीवन का हिस्सा रहा है. लालू यादव की राजनीति को उन्होंने बाहर से नहीं देखा, वह उसी माहौल में बड़े हुए लेकिन अब वह जिस दुनिया में हैं, वहां उनके पिता का राजनीतिक कद उन्हें ज्यादा देर तक नहीं बचा सकता. यहां लोगों को तेज प्रताप खुद पसंद आने चाहिए.
और शायद यही हो रहा है. उनके चुलबुलेपन में एक तरह की ईमानदारी है. वह बहुत ज्यादा परफेक्ट बनने की कोशिश नहीं करते. उनकी बॉडी लैंग्वेज में वह राजनीतिक सावधानी कम दिखती है, जो आमतौर पर सार्वजनिक जीवन में लंबे समय तक रहने वाले लोगों में आ जाती है. वह कभी कुछ ज्यादा बोल जाते हैं, कभी ज्यादा हंसते हैं, कभी किसी बात को बच्चे की तरह पकड़ लेते हैं लेकिन यही चीज उन्हें रियलिटी शो के बाकी चेहरों से अलग करती है. वह लगातार यह साबित करने की कोशिश करते हुए नहीं दिखते कि वह कितने बड़े परिवार से आते हैं.
यहां एक दिलचस्प उलटफेर भी है. राजनीति ने तेज प्रताप को लालू यादव के बेटे की पहचान दी लेकिन मनोरंजन उन्हें एक दूसरी पहचान दे रहा है, तेजू भैया की. पहली पहचान उन्हें विरासत से मिली है, दूसरी उनके व्यवहार से बन रही है. लालू के बेटे के तौर पर लोग उनसे राजनीति करने की उम्मीद करते हैं, लेकिन यहां लोगों को उनसे मनोरंजन की उम्मीद भी है. शायद इसलिए यहां उनका व्यक्तित्व ज्यादा खुला हुआ नजर आता है.
तेज प्रताप की लोकप्रियता को सिर्फ इस आधार पर पढ़ना भी ठीक नहीं होगा कि वह लालू यादव के बेटे हैं. रियलिटी शो में किसी बड़े नाम को शुरुआत में फायदा जरूर मिल सकता है लेकिन लंबे समय तक टिके रहने के लिए सिर्फ नाम काफी नहीं होता. वहां आदमी को रोज कुछ ऐसा देना पड़ता है जिसे लोग देखना चाहें. तेज प्रताप के मामले में वह चीज उनका स्वभाव बन रहा है. उनकी बांसुरी, उनकी हंसी, उनका मजाक, उनकी शरारत और लोगों के साथ घुलने-मिलने का तरीका. यही वह कंटेंट है, जो लोगों से कनेक्ट कर रहा है.
शायद इसीलिए तेज प्रताप का यह नया अवतार राजनीति से ज्यादा दिलचस्प है क्योंकि राजनीति में उन्हें हमेशा किसी खांचे में रखा गया लेकिन कैमरे के सामने वह खांचा टूटता है. वहां वह कभी बिल्कुल बच्चे जैसे लगते हैं, कभी शरारती दोस्त जैसे, कभी संगीत में खोए आदमी जैसे और कभी ऐसे व्यक्ति जैसे जिसे बस अपनी धुन में रहना पसंद है.
यह भी संभव है कि रियलिटी शो की दुनिया तेज प्रताप की छवि को स्थाई रूप से बदल दे लेकिन इतना जरूर है कि कैमरे ने उनके व्यक्तित्व का वह हिस्सा लोगों तक पहुंचाया है जो राजनीतिक मंच पर ज्यादा दिखाई नहीं देता. शायद इसी सहजता ने उनके लिए वह स्पेस खोल दिया है, जो राजनीति कभी नहीं खोल पाई. जहां लोग उन्हें सिर्फ लालू यादव के बेटे की तरह नहीं, तेज प्रताप की तरह देख रहे हैं. जहां वह सिर्फ यादव नहीं हैं, सबके तेजू भैय्या हैं.
रितु तोमर