बायोपिक, बायोपिक और बायोपिक... ऐसी फिल्मों पर बरस रहे नेशनल अवॉर्ड, 10 साल के आंकड़े गवाह

सवाल यह नहीं है कि बायोपिक करने से ही नेशनल अवॉर्ड मिलता है. सवाल यह है कि पिछले कुछ वर्षों में वास्तविक किरदारों वाली भूमिकाओं का अवॉर्ड सर्किट में आकर्षण इतना क्यों बढ़ा है?

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पिछले कई सालों में बायोपिक पर बनी फिल्में जीतती रही हैं अवॉर्ड. (Photo: ITG) पिछले कई सालों में बायोपिक पर बनी फिल्में जीतती रही हैं अवॉर्ड. (Photo: ITG)

आजतक एंटरटेनमेंट डेस्क

  • नई दिल्ली,
  • 24 सितंबर 2026,
  • अपडेटेड 5:54 PM IST

भारतीय सिनेमा में नेशनल फिल्म अवॉर्ड सिर्फ एक मेडल भर नहीं है बल्कि इसे किसी भी कलाकार के लिए उसकी कला की सबसे बड़ी सार्वजनिक मान्यताओं में से एक माना जाता है. लेकिन पिछले एक दशक के आंकड़ों पर नजर डालें तो हिंदी सिनेमा में एक दिलचस्प पैटर्न दिखाई देता है. ऐसा लगता है कि अगर कोई अभिनेता नेशनल अवॉर्ड की दौड़ में मजबूती से उतरना चाहता है, तो सिर्फ एक बेहतरीन काल्पनिक किरदार निभा देना शायद अब उतना पर्याप्त नहीं रह गया है. बायोपिक और ऐतिहासिक घटनाएं अब नेशनल अवॉर्ड जीतने का आसान रास्ता बनती नजर आ रही हैं.

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2016 के बाद हिंदी सिनेमा के आठ बेस्ट एक्टर विजेताओं में पांच ऐसे हैं, जिन्हें राष्ट्रीय पुरस्कार किसी शख्स की बायोपिक या किसी ऐतिहासिक घटना से प्रेरित फिल्मों की वजह से मिला. अक्षय कुमार की रुस्तम, अजय देवगन की तानाजी, विक्रांत मैस की 12th फेल, कार्तिक आर्यन की चंदू चैंपियन या आलिया भट्ट की गंगूबाई काठियावाड़ी इसका उदाहरण हैं. हिंदी सिनेमा में नेशनल अवॉर्ड की बड़ी दौड़ में ‘रियल’ किरदारों की मौजूदगी लगातार मजबूत हुई है.

यह बदलाव अचानक नहीं आया. हिंदी सिनेमा में पहले भी बायोपिक पर बनी फिल्मों ने कलाकारों को राष्ट्रीय पहचान दिलाई है. अजय देवगन ने द लीजेंड ऑफ भगत सिंह का किरदार निभाकर पुरस्कार जीता. इरफान खान को पान सिंह तोमर के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार मिला और राजकुमार राव को शाहिद के लिए सम्मानित किया गया.

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लेकिन उस दौर की पूरी तस्वीर देखें तो विजेता सिर्फ बायोपिक या वास्तविक किरदारों तक सीमित नहीं थे. अमिताभ बच्चन ने अग्निपथ, ब्लैक, पा और पीकू जैसी फिल्मों के लिए पुरस्कार जीता. 

विक्रांत मैसी की फिल्म 12th फेल का एक सीन.

यानी सवाल यह नहीं है कि बायोपिक करने से ही नेशनल अवॉर्ड मिलता है. सवाल यह है कि पिछले कुछ वर्षों में वास्तविक किरदारों की भूमिकाओं का अवॉर्ड सर्किट में आकर्षण इतना क्यों बढ़ा है?

अक्षय कुमार की रुस्तम इसका एक दिलचस्प उदाहरण है. फिल्म की कहानी 1959 के चर्चित केएम. नानावटी केस से प्रेरित थी और अक्षय का किरदार रुस्‍तम पावरी वास्तविक नौसेना अधिकारी कवस मानेकशॉ नानावटी से प्रेरित था. अभिनेता ने किरदार के लिए अपना वजन घटाया और पारसी लहजे पर भी काम किया.

विक्की कौशल की उरी: द सर्जिकल स्ट्राइक भारत की वास्तविक सैन्य कार्रवाई से प्रेरित थी. हालांकि फिल्म का मेजर विहान सिंह शेरगिल एक काल्पनिक किरदार है, लेकिन उसकी पृष्ठभूमि वास्तविक सैन्य घटनाओं और अधिकारियों से प्रेरित है.

अजय देवगन की तानाजी में भी इतिहास सामने था. तानाजी मालुसरे छत्रपति शिवाजी महाराज की सेना के वास्तविक योद्धा थे और किरदार के लिए अभिनेता को तलवारबाजी और ढाल के इस्तेमाल जैसी युद्ध तकनीकों पर काम करना पड़ा. फिर आती है 12th फेल, जहां विक्रांत मैसी ने आईपीएस अधिकारी मनोज कुमार शर्मा का किरदार निभाया.

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अक्षय कुमार की फिल्म रुस्तम का एक सीन.

और चंदू चैंपियन में कार्तिक आर्यन ने पैरालंपिक स्वर्ण पदक विजेता मुरलीकांत पेटकर का किरदार निभाया. इस भूमिका के लिए अभिनेता ने अपने शरीर में बड़ा बदलाव किया. रिपोर्ट्स के मुताबिक उन्होंने करीब 14 महीनों में अपना वजन 90 किलो से घटाकर 72 किलो किया और बॉडी फैट भी काफी कम किया.

यहां एक दिलचस्प बात सामने आती है. जब अभिनेता किसी काल्पनिक किरदार को निभाता है तो दर्शक उसके अभिनय को फिल्म के भीतर मौजूद दुनिया के संदर्भ में देखते हैं लेकिन जब वही अभिनेता किसी वास्तविक व्यक्ति का किरदार निभाता है, तो उसकी परफॉर्मेंस के लिए एक अतिरिक्त पैमाना मौजूद होता है, जिस वजह से उसे किरदार को अधिक स्क्रूटनी के साथ ऑब्जर्व किया जाता है. बहरहाल, बीते कई सालों के आंकड़ें गवाही देते दिखाई दे रहे हैं कि नेशनल अवॉर्ड जीतने के लिए बायोपिक पहली पसंद के तौर पर सामने आए हैं.

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