कभी-कभी किसी फिल्म की नियति उसकी खूबियां तय नहीं करतीं, उसकी कमियां कर देती हैं. चीन की एनिमेशन फिल्म Niu Lai इसकी ऐसी ही अजीब और दिलचस्प मिसाल है. रिलीज के शुरुआती दिनों में हाल यह था कि एक शो में 300 दर्शकों का पहुंचना भी मुश्किल था. शो लगातार घट रहे थे, बॉक्स ऑफिस पर फिल्म की मौजूदगी सिमटती जा रही थी और उसका भविष्य उन तमाम फिल्मों जैसा दिखाई देने लगा था, जो रिलीज तो होती हैं, लेकिन दर्शकों की सामूहिक स्मृति में जगह बनाए बिना ही पर्दे से उतर जाती हैं.
फिर सोशल मीडिया पर फिल्म के अजीबोगरीब किरदारों, भद्दे एनिमेशन और उलझी हुई कहानी का मजाक उड़ाया जाने लगा. लेकिन इस मजाक का एक अनपेक्षित असर हुआ. जिस फिल्म को खारिज करने के लिए लोग उसकी कमियां गिना रहे थे, वही कमियां धीरे-धीरे उसकी सबसे बड़ी पहचान बन गईं. फिल्म पर जितनी टिप्पणियां हुईं, वह उतनी ही ज्यादा लोगों की नजर में आती गई. आलोचना ने चर्चा को जन्म दिया, चर्चा ने जिज्ञासा को और जिज्ञासा आखिरकार दर्शकों को सिनेमाघरों तक ले आई.
अब लोग फिल्म इसलिए नहीं देखना चाहते कि वह अच्छी है या बुरी. वे खुद यह तय करना चाहते थे कि जिस फिल्म को सोशल मीडिया इतना खराब बता रहा है, वह आखिर कितनी खराब है?
यहीं से Niu Lai के बॉक्स ऑफिस सफलता की कहानी दर्शक मनोविज्ञान का एक दिलचस्प दस्तावेज बन जाती है. डिजिटल दौर में किसी फिल्म को देखने की इच्छा हमेशा उसकी गुणवत्ता से पैदा नहीं होती. कभी-कभी उपहास भी प्रचार का काम करता है, असफलता भी आकर्षण पैदा कर सकती है और किसी फिल्म की सबसे बड़ी कमजोरी ही उसकी सबसे प्रभावी मार्केटिंग बन सकती है.
Niu Lai साधाराण से भी साधारण एनिमेशन फिल्म है. फिल्म की कहानी एक नवजात बछड़े के इर्द-गिर्द बुनी गई है, जो एक काल्पनिक दुनिया में बड़ा होता है और इस दौरान दोस्ती, परिवार, त्याग और संघर्ष जैसे अनुभवों से गुजरता है. उसकी इस यात्रा में एक छोटी चिड़िया Skylark की भी अहम भूमिका है. बछड़े के बचपन से बड़े होने तक की यात्रा के जरिए फिल्म जीवन, रिश्तों और संघर्ष जैसे गंभीर विषयों को छूने की कोशिश करती है.
लेकिन समस्या सिर्फ यह नहीं थी कि फिल्म क्या कहना चाहती है. समस्या यह भी थी कि वह अपनी बात कहती कैसे है? घटनाएं कई जगह इस तरह बिखरी हुई महसूस होती है कि कहानी का प्रवाह टूट जाता है. दर्शक किरदारों की यात्रा के साथ आगे बढ़ने के बजाय बार-बार यह समझने में उलझ जाता है कि आखिर कहानी किस दिशा में जा रही है? यानी फिल्म की कमजोरी केवल उसके तकनीकी स्तर में नहीं थी. फिल्म का प्लॉट भी दर्शक को भावनात्मक रूप से अंत तक बांधे रखने में संघर्ष करती दिखाई दिया.
लेकिन अगर कहानी फिल्म की कमजोरी थी, तो उसका एनिमेशन वह वजह बना जिसने उसे एक सामान्य फ्लॉप फिल्म से इंटरनेट सेंसेशन बना दिया.
Niu Lai के किरदार बेहद अस्वाभाविक लगते हैं. उनके चेहरे और 3D मॉडल साधारण हैं, वॉयस मॉड्यूलेशन कई जगह अटपटा महसूस होता है और विजुअल इफेक्ट्स उस स्तर के नहीं हैं, जिसकी आज के दर्शक किसी थिएटर रिलीज होने वाली एनिमेशन फिल्म से उम्मीद करते हैं.
सोशल मीडिया पर फिल्म के दृश्यों के मीम का सैलाब नजर आता है. अजीबोगरीब किरदारों और एनिमेशन के स्क्रीनशॉट शेयर हो रहे हैं और उन पर जमकर कॉमेंट किए जा रहे हैं. यह सब उस समय हो रहा था, जब चीन की Ne Zha 2 जैसी एनिमेशन फिल्में अत्याधुनिक तकनीक, भव्य विजुअल्स और शानदार एनिमेशन के जरिए दुनियाभर के दर्शकों को प्रभावित कर रही थीं. ऐसे दौर में Niu Lai का स्क्रीन पर दिखाई देना लगभग उसके उलट अनुभव है.
लेकिन विडंबना यही थी कि जिस चीज ने Niu Lai को उपहास का विषय बनाया, वही धीरे-धीरे उसकी सबसे बड़ी प्रचार मशीन बन गई.
रिलीज से पहले फिल्म के पास न कोई बड़ा स्टार था, न किसी बड़े स्टूडियो का सहारा और न ही ऐसा महंगा प्रचार अभियान, जो लाखों दर्शकों तक उसका नाम पहुंचा सके. फिल्म लगभग खामोशी से सिनेमाघरों में आई थी. लेकिन सोशल मीडिया ने कुछ ही समय में वह कर दिया, जिसके लिए किसी फिल्म को करोड़ों रुपये खर्च करने पड़ सकते हैं. यहीं से एक दिलचस्प सवाल सामने आता है कि आखिर लोग ऐसी किसी चीज की तरफ क्यों खिंचते चले हैं, जिसे वे खुद खराब बता रहे होते हैं?
दिमाग को असाधारण चीजें क्यों खिंचती है?
इंसानी दिमाग सिर्फ अच्छी और खूबसूरत चीजों की ओर आकर्षित नहीं होता. वह असामान्य चीजों को भी नोटिस करता है. अगर किसी फिल्म के बारे में कहा जाए कि वह बहुत अच्छी है, तो आप उसे देखने का फैसला बाद के लिए टाल सकते हैं. लेकिन अगर हजारों लोग एक ही फिल्म के बारे में यह कहने लगें कि इतनी खराब फिल्म आपने कभी नहीं देखी होगी, तो दिमाग के सामने एक अलग तरह का सवाल खड़ा होता है कि आखिर यह कितनी खराब है? यहीं Curiosity Gap काम करता है.
इसमें जानकारी का एक हिस्सा आपके सामने होता है, लेकिन उसका सबसे दिलचस्प हिस्सा गायब रहता है. आपको बताया जाता है कि कोई चीज असाधारण है, लेकिन उसकी असलियत खुद देखने को नहीं मिलती. यह अधूरी जानकारी दिमाग में एक खाली जगह बनाती है और उसे भरने के लिए व्यक्ति खुद उस अनुभव तक पहुंचना चाहता है.
Niu Lai के साथ कुछ ऐसा ही हुआ. लोगों ने फिल्म के बारे में सुन लिया था, उसके दृश्य देख लिए थे, उसके मीम देख लिए थे, लेकिन अब वे खुदकर देखकर ये जानना चाहते थे कि इसमें कितनी सच्चाई है. फिल्म एक तरह के चैलेंज में तब्दील होने लगी. यहां एक दूसरा मनोवैज्ञानिक प्रभाव भी काम करता है, Bandwagon Effect.
जब लोग देखते हैं कि बड़ी संख्या में दूसरे लोग किसी चीज के बारे में बात कर रहे हैं, तो उस चीज की सामाजिक अहमियत अपने आप बढ़ने लगती है. शुरुआत में Niu Lai ऐसी फिल्म थी, जिसके बारे में लगभग कोई बात नहीं कर रहा था. फिर कुछ लोगों ने उसका मजाक उड़ाया. उनके पोस्ट दूसरे लोगों तक पहुंचे. उन पर रिएक्शन आने लगे. मीम बनने लगे. मीम्स ने और लोगों का ध्यान खींचा और देखते ही देखते फिल्म के आसपास एक ऐसा डिजिटल शोर पैदा हो गया, जिसमें फिल्म की गुणवत्ता से ज्यादा महत्वपूर्ण यह हो गया कि लोग उसके बारे में बात कर रहे हैं.
पहले सवाल ये खड़ा था कि Niu Lai चीन की सबसे खराब फिल्म है? लेकिन इस पूरे शोर-शराबे के बाद अहम ये हो गया कि जिस फिल्म को चीन की सबसे खराब फिल्म बताया जा रहा है, क्या आपने वह देखी? यहां FOMO यानी Fear of Missing Out का कॉन्सेप्ट भी काम करता है.
सिनेमा के इतिहास में ऐसी कई फिल्में रही हैं, जिनकी लोकप्रियता उनकी सिनेमाई गुणवत्ता से नहीं, बल्कि उनकी अजीबोगरीब कमियों से पैदा हुई. कुछ फिल्मों को लोग इसलिए याद रखते हैं क्योंकि वे इतनी असामान्य होती हैं कि उन्हें दोस्तों के साथ बैठकर देखना, उनके संवाद दोहराना और उनके दृश्यों पर हंसना अपने आप में एक अनुभव बन जाता है.
Niu Lai के साथ भी कुछ ऐसा ही होने लगा. उसकी खराबी अब सिर्फ उसकी कमजोरी नहीं थी. वह उसकी पहचान बन चुकी थी. दर्शक यह देखने लगे कि अगला अजीब सीन कौन सा आने वाला है. कौन सा किरदार और कितना बेढ़ंगा लगेगा और फिल्म अगली बार उन्हें किस वजह से चौंकाएगी. एक तरह से फिल्म ने अपनी आलोचना को ही अपनी यूएसपी में तब्दील कर दिया.
अब इस सोशल मीडिया पर इस पूरी चर्चा का सीधा असर बॉक्स ऑफिस पर भी दिखाई देने लगा. शुरुआत में जहां फिल्म के शो बेहद कम थे, वहीं मांग बढ़ने के बाद उसकी स्क्रीनिंग तेजी से बढ़ाई गई. रोजाना के हिसाब से शो 21 से बढ़कर 359 तक पहुंच गए. इसके बाद कमाई में उछाल आया. शुरुआती दस दिनों में करीब 7,700 युआन कमाने वाली फिल्म ने वायरल होने के बाद एक ही दिन में करीब 8.2 मिलियन युआन का बिजनेस किया. उसका कुल बॉक्स ऑफिस करीब 17.1 मिलियन युआन तक पहुंच गया. यानी जिस फिल्म के लिए शुरुआत में दर्शक जुटाना मुश्किल था, वही कुछ ही समय बाद ऐसी फिल्म बन गई जिसके बारे में दर्शक खुद बात कर रहे थे और जिसे देखने के लिए सिनेमाघरों में जा रहे थे.
लेकिन ये फिल्म किसी बड़े स्टूडियो के करोड़ों युआन वाला प्रोजेक्ट नहीं था. इसे शिन युमेंग और उनकी मां सुन लिफांग ने लगभग पांच साल की मेहनत के बाद तैयार किया. सीमित संसाधनों में बनी इस फिल्म के पीछे उनकी वर्षों की मेहनत थी और यहीं कहानी में Sympathy Factor की भी एंट्री होती है.
शुरुआत में दर्शक स्क्रीन पर दिखाई दे रहे दृश्यों पर हंस रहे थे. लेकिन जब उन्हें पता चला कि जिस फिल्म के एनिमेशन का मजाक बनाया जा रहा है, उसके पीछे एक मां और बेटे की वर्षों की मेहनत है, तो फिल्म के प्रति नजरिया भी थोड़ा बहुत बदला.
इसका मतलब यह नहीं कि दर्शकों ने अचानक फिल्म की तकनीकी कमियों को नजरअंदाज कर दिया. लेकिन अब उन कमियों के पीछे उन्हें सिर्फ एक असफल फिल्म नहीं, दो लोगों की मेहनत दिखाई देने लगी. पर एक सिंपैथी फैक्टर यकीनन सामने आया.
Niu Lai की कहानी आखिर में एक असहज सवाल छोड़ जाती है. डिजिटल दौर में क्या किसी फिल्म के लिए सिर्फ अच्छा होना पर्याप्त है? या उसे इतना अलग, इतना असामान्य और इतना चर्चा योग्य भी होना पड़ेगा कि लोग उसके बारे में बात करने लगें?
अगर किसी फिल्म की तकनीकी कमियां उसे वायरल बना सकती हैं, अगर ट्रोलिंग उसे दर्शकों तक पहुंचा सकती है और अगर उसकी खराबी ही उसकी पहचान बन सकती है, तो क्या भविष्य में फिल्में जानबूझकर ऐसी खामियां पैदा करने की कोशिश करेंगी, जिन पर सोशल मीडिया पर चर्चा हो?
रितु तोमर