Ohh My Dog 2026 Film Review: कुत्ता सिर्फ घर में घूमने वाला पेट नहीं होता… वो घर का वो सदस्य होता है, जो बिना एक शब्द बोले आपकी खुशी समझ लेता है, आपके दुख में चुपचाप पास बैठ जाता है और जरूरत पड़े तो आपके लिए दुनिया से भिड़ भी जाता है. इसलिए जब घर का दरवाजा गलती से खुला रह जाए और आपका प्यारा दोस्त भाग जाए, तो उसकी तलाश सिर्फ एक जानवर को ढूंढना नहीं होती… वो बेचैनी होती है, जो इंसान को सड़क-सड़क अपने सबसे वफादार साथी का नाम पुकारने पर मजबूर कर देती है. ‘Ohh My Dog’ इसी रिश्ते की गर्माहट, डर, दर्द और वफादारी को एक मिस्ट्री-ड्रामा के अंदाज में पर्दे पर लेकर आती है.
कहानी क्या है?
फिल्म की कहानी दो अलग-अलग राज्यों- असम और बिहार- में चलती है और दोनों कहानियों को जोड़ता है एक बेहद खास रिश्ता… इंसान और कुत्ते का. असम में अप्पू का प्यारा इंडी डॉग मोमो गेंद के पीछे भागते हुए अचानक गायब हो जाता है. अप्पू अपने दोस्त को ढूंढने निकलता है और देखते ही देखते उसकी मासूम-सी तलाश एक बड़े डॉग-ट्रैफिकिंग रैकेट तक पहुंच जाती है.
दूसरी तरफ बिहार में युवा मजदूर प्रिंस रहस्यमय तरीके से गायब हो जाता है. उसका वफादार स्ट्रे डॉग ऑस्कर अपने इंसान को खोजने निकल पड़ता है. लेकिन ऑस्कर की तलाश सिर्फ अपने मालिक तक पहुंचने की कोशिश नहीं है, बल्कि धीरे-धीरे एक ऐसे किडनी रैकेट का पर्दाफाश कर देती है, जिसके तार काफी दूर तक फैले हैं.
यानी एक तरफ बच्चा अपने कुत्ते को खोज रहा है और दूसरी तरफ कुत्ता अपने इंसान को. और यही फिल्म का सबसे खूबसूरत आइडिया है.
डॉग बनेगा जासूस, बच्चा बनेगा शेरलॉक!
डायरेक्टर अमित राय ने फिल्म को बच्चों की रहस्य-कहानी जैसा ट्रीटमेंट दिया है. कहानी में सुराग हैं, संदिग्ध लोग हैं, शातिर पुलिसवाले हैं और उन्हें जोड़ने वाला एक मासूम-सा बच्चा भी है.
अप्पू रुबिक क्यूब खेलते-खेलते इतना तेज दिमाग लगाता है कि CCTV फुटेज, ऑनलाइन पेमेंट और एक ट्रीट पैकेट जैसे छोटे-छोटे सुराग जोड़कर किडनैपर्स तक पहुंच जाता है. कई जगह उसका शेरलॉक होम्स वाला दिमाग थोड़ा ज्यादा ही तेज लगता है और यह मानना मुश्किल होता है कि इतनी कम उम्र का बच्चा इतनी बड़ी गुत्थी सुलझा सकता है.
लेकिन यहां फिल्म की सबसे बड़ी ताकत काम आती है- इमोशन. क्योंकि अप्पू की लड़ाई सिर्फ किसी केस को सॉल्व करने की नहीं है. वो अपने दोस्त मोमो को वापस चाहता है. और जब फिल्म आपको इस रिश्ते से जोड़ देती है, तो आप कहानी की कुछ सुविधाजनक बातों को नजरअंदाज कर देते हैं.
ऑस्कर की कहानी ज्यादा गहरी क्यों लगती है?
मेरे लिए फिल्म का सबसे मजबूत हिस्सा ऑस्कर की कहानी है. प्रिंस एक गरीब और हाशिये से आने वाला लड़का है. जब उसका पिता सुनता है कि उसके बेटे का अपहरण शायद ऑर्गन-ट्रैफिकर्स ने किया है, तो उसका सवाल दिल तोड़ देता है- क्या एक किडनी पर इंसान जिंदा रह सकता है? जवाब हां में मिलता है और पिता राहत की सांस लेता है.
ये छोटा-सा पल फिल्म के पूरे सामाजिक दर्द को सामने रख देता है. जिस इंसान के लिए अपने बच्चे की जिंदगी से ज्यादा जरूरी यह जानना हो जाए कि उसका बच्चा एक किडनी के साथ जिंदा रह सकता है या नहीं, वहां गरीबी की भयावहता समझ आती है.
इसीलिए ऑस्कर की कहानी सिर्फ ‘डॉग अपने मालिक को ढूंढ रहा है’ वाली कहानी नहीं रह जाती. इसमें गरीबी, शोषण, अपराध और इंसान की मजबूरियों की परतें भी जुड़ जाती हैं.
फिल्म की सिनेमैटोग्राफी और डॉग की एक्टिंग कमाल!
फिल्म को सैंकड़ों असली कुत्तों और रियल लोकेशन्स पर शूट किया गया है, जिसकी वजह से इसमें एक रॉ और रियल फील आती है. Máté Herbai की सिनेमैटोग्राफी कई जगह बेहद खूबसूरत है. खासकर पूर्णिमा की रात में ऑस्कर का चांद की तरफ देखकर हुआं-हुआं करना किसी ग्राफिक नॉवेल के फ्रेम जैसा लगता है. ऐसा लगता है जैसे वो अपने भीतर छिपे किसी पुराने शिकारी पूर्वज की ताकत को बुला रहा हो.
एक और खूबसूरत विजुअल में ऑस्कर एक गोल, वीरान मैदान में बैठा नजर आता है और कैमरा धीरे-धीरे उस सर्कुलर फ्रेम को चांद की सफेद गोलाई में बदल देता है. एडिटर सुविर नाथ की एडिटिंग भी फिल्म को संभालती है. हालांकि थोड़ी और शार्प हो सकती थी. असम में अप्पू और बिहार में ऑस्कर की कहानियों के बीच कट करना काफी स्मार्ट तरीके से किया गया है.
और सबसे बड़ी बात- Oscar की परफॉर्मेंस- उसकी आंखों की मासूमियत, मदद के लिए उसकी बेचैनी, गुर्राना, दांत दिखाना और अपने इंसान को खोजने की जिद… फिल्म में वह सिर्फ कुत्ता नहीं है, बल्कि बकायदा एक लीड कैरेक्टर है.
पंकज त्रिपाठी और पवन मल्होत्रा का तड़का
फिल्म भले ही एक बच्चे और कुत्ते के कंधों पर चलती हो, लेकिन पंकज त्रिपाठी और पवन मल्होत्रा, राजेश शर्मा जैसे कलाकार इसे सपोर्ट करते हैं. पवन का पंजाबी आरटीओ वाला किरदार अपनी चिड़चिड़ी लेकिन मजेदार अदाओं से कुछ हल्कापन लाता है.
पंकज एक ऐसे टीचर के किरदार में हैं, जो प्रिंस के दोस्तों की उसे खोजने में मदद करता है. हालांकि उनका रोल काफी सीमित है और उनके पुराने हल्के-फुल्के कॉमिक किरदारों की याद दिलाता है. वहीं बाल कलाकार माही राय ने भी पूरे आत्मविश्वास के साथ काम किया है.
कहां मात खाती है ‘ओह माय डॉग’?
फिल्म का सबसे बड़ा कमजोर पक्ष इसका पेस और लॉजिक है. कहानी कई जगह इतनी लंबी खिंच जाती है कि इंटेंस ड्रामा होने के बावजूद एंटरटेनमेंट वाला मजा थोड़ा कम हो जाता है. फिल्म अगर कुछ जगहों पर ज्यादा टाइट होती तो असर और जबरदस्त हो सकता था.
जैसे एक कुत्ते के मदद के लिए हुआं-हुआं करने से अचानक ढेर सारे आवारा कुत्तों की सेना जुट जाना थोड़ा फिल्मी लगता है. उसी तरह अप्पू की असाधारण डिटेक्टिव स्किल्स भी कई जगह विश्वास की परीक्षा लेती हैं.
क्लाइमैक्स से उम्मीद होती है कि यह आपको अंदर तक झकझोर देगा, लेकिन फिल्म वहां पहुंचकर उतना जोरदार पंच नहीं मार पाती. लंबे ड्रामे के कारण जिस इमोशनल धमाके की उम्मीद बनती है, उसका असर थोड़ा कम हो जाता है. हालांकि डायलॉग्स अच्छे हैं और अमित राय का डायरेक्शन कहानी के भावनात्मक हिस्से को लगातार संभालकर रखता है.
दिल लुभाने वाली फिल्म है 'ओह माय डॉग'
‘Ohh My Dog’ एक परफेक्ट फिल्म नहीं है. इसकी कहानी कई जगह सुविधाजनक लगती है, पेस धीमा पड़ता है और क्लाइमैक्स उस स्तर का इमोशनल झटका नहीं दे पाता जिसकी तैयारी पूरी फिल्म करती है. लेकिन फिल्म की सबसे बड़ी जीत है- इसका दिल.
अप्पू और मोमो का रिश्ता हो या ऑस्कर और प्रिंस की वफादारी, फिल्म आपको इन किरदारों के साथ खड़ा कर देती है. आप चाहते हैं कि अप्पू को उसका मोमो मिल जाए. आप चाहते हैं कि ऑस्कर अपने प्रिंस तक पहुंच जाए. और जब कोई फिल्म आपको अपने किरदारों की खुशियों और दर्द से इस तरह जोड़ दे, तो उसकी कुछ कमियां माफ की जा सकती हैं.
कुत्तों को सिर्फ पेट समझने वालों के लिए ये फिल्म शायद एक मिस्ट्री है, लेकिन जिन्हें डॉग अपना परिवार लगता है, उनके लिए ‘Ohh My Dog’ एक इमोशनल सफर है.
आरती गुप्ता