Dorothy Movie Review: 'मर्दानगी' के नाम पर पहचान की हत्या, सोचने पर मजबूर करेगी 'डोरोथी'

कुछ फिल्में ऐसी होती हैं, जो सिनेमाहॉल में ना सही लेकिन जब ओटीटी पर आती हैं, तो अपनी ऑडियंस खोज ही लेती है. इस साल तमिल सिनेमा से एक ऐसी ही मास्टरपीस फिल्म डोरोथी रिलीज हुई, जो नेटफ्लिक्स पर मौजूद है. तमिल से लेकर इसे हर भाषा में देखा जा सकता है. मैंने भी देख ली है, और मुझे कार्तिक सुब्बाराज की ये फिल्म कैसी लगी? ये जानने के लिए पढ़िए पूरा रिव्यू...

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कार्तिक सुब्बाराज का सिनेमा रहा शानदार! (Photo: ITGD) कार्तिक सुब्बाराज का सिनेमा रहा शानदार! (Photo: ITGD)

पर्व जैन

  • नई दिल्ली,
  • 27 अक्टूबर 2026,
  • अपडेटेड 9:25 AM IST
फिल्म:डोरोथी
4/5
  • कलाकार : कीर्ति सुरेश, ऋषिकांत, सनंथ
  • निर्देशक :कार्तिक सुब्बाराज

'तुम लड़के हो, और वो कभी रोते नहीं हैं', 'लड़के कभी किचन के कामों में हाथ नहीं बंटाते'- ये वो बातें हैं जो अक्सर हम लड़कों को कही जाती हैं. बचपन से ही मर्दानगी का एक पाठ पढ़ाया जाता है कि कैसे आपको औरतों के सामने बर्ताव करना है. टॉक्सिक मैस्कुलिनिटी, ये वो शब्द है जो बरसों से चला आ रहा है. हालांकि आज के समय में इसकी चर्चा ज्यादा है और अब मायने भी बदल गए हैं. लेकिन एक समय था जब ये बेहद आम बात होती थी. मर्द अपनी जिंदगी में कुछ भी करे, उससे औरतों का कोई लेना-देना नहीं होता था.

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मर्दानगी का मतलब ताकत और अपनी धौंस जमाना होता था. लेकिन कैसा हो कि अगर उसी मर्दानगी भरी दुनिया में एक ऐसी लड़की की एंट्री हो, जो उस सोच को ही हिलाकर रख दे? ऐसी ही एक कहानी तमिल फिल्ममेकर कार्तिक सुब्बाराज लेकर आए हैं. उनकी फिल्म डोरोथी कुछ ही दिनों पहले नेटफ्लिक्स पर आई है. ये फिल्म जब थिएटर में रिलीज हुई थी, तब तमिल सिनेमा में इसकी काफी चर्चा हुई थी. अब ओटीटी पर आने के बाद इसके बारे में और भी जोरो-शोरों से बातें हो रही हैं. कहा जा रहा है कि ये इस साल की सबसे बेहतरीन तमिल फिल्म है. आखिर डोरोथी में ऐसा क्या है? आइए बात करते हैं.

क्या है डोरोथी?

कहानी है दो जिगरी दोस्तों कार्ति (ऋषिकांत) और सुब्बू (सनंथ) की, जो बचपन से एक साथ हैं. कार्ति अपने छोटेपन में कमजोर और डरा हुआ बच्चा है, लेकिन सुब्बू सबसे निडर है. उसने बचपन में ही अपनी मां और बहन को खो दिया था. उसका बाप विसिल (मुथुकुमार) एक ऐसा आदमी है, जो अपनी मर्दानगी दिखाने से पीछे नहीं हटता. उसके बड़े भाई भी उसी सोच को कायम रखते हैं. कार्ति और सुब्बू वक्त के साथ बड़े होते हैं, लेकिन उनमें बड़े बदलाव आ जाते हैं. जहां कार्ति एक डरपोक बच्चे के बदले निडर और बेखौफ आदमी बना. वहीं, सुब्बू निडर से कमजोर और संवेदनशील बन चुका है. 

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एक दिन सुब्बू और कार्ति की जिंदगी में डोरोथी (कीर्ति सुरेश) की एंट्री होती है, जिसके आने से सुब्बू काफी खुश है. मगर एक दिन डोरोथी अपने घर के मर्दों के कारण मर जाती है. इस घटना से सुब्बू के ऊपर बेहद बुरा असर पड़ता है, मानो किसी ने उसके अंदर से उसकी आत्मा ही छीन ली हो. बचपन में मां और बहन के गुजर जाने के बाद, वो अब डोरोथी की मौत का सदमा बर्दाश्त नहीं कर पाता. ऐसे में वो एक दिन कुछ ऐसा कर बैठता है, जिससे उसके खानदान की प्रतिष्ठा पर बहुत गहरी चोट पहुंच जाती है. अब सुब्बू की पूरी जिंदगी पलट जाती है. अब वो ऐसा कौनसा कदम उठाता है? ये तो आप जब फिल्म देखेंगे, तब खुद समझ जाएंगे.

गहरी चोट पहुंचाती है कहानी, होगी असहजता

फिल्म के ट्रेलर में डायरेक्टर कार्तिक सुब्बाराज ने ज्यादा कुछ रिवील नहीं किया. अंदेशा लग जाता है कि कार्ति और सुब्बू की जिंदगी में बहुत बड़ा बदलाव आने वाला है, लेकिन जिस बदलाव को उन्होंने फिल्म में दिखाया, वो आपके दिमाग पर गहरा असर करता है. फिल्म डोरोथी में सुब्बू की जिंदगी के जरिए आप एक इंसान को अपनी पहचान और समाज में स्वीकृति की अहमियत समझ सकते हैं. हमें दिखाया जाता है कि कैसे एक इंसान को सामाजिक दबाव के चलते अपनी असली पहचान छिपाकर एक मुखौटा पहनकर घूमना पड़ता है. 

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जिस टॉपिक को डायरेक्टर कार्तिक सुब्बाराज ने यहां छुआ है, वो ट्रांसजेंडर से जुड़ा है. उन्होंने उनके स्ट्रगल को पूरी सच्चाई और निडरता से दिखाने की कोशिश की है. ये फिल्म हर किसी के लिए नहीं बनी है. इसे एक मैच्योर ऑडियंस के लिए बनाया गया है, जो एक खुला दिमाग रखकर ऐसे टॉपिक पर फिल्म देखना सही समझते हैं. इस बात के लिए डायरेक्टर की तारीफ बनती है कि उन्होंने इतनी हिम्मत दिखाते हुए इस कहानी को बड़े पर्दे पर उतारा. डोरोथी मूवी जिन इमोशन्स को छूती है, वो आपको असहज करती हैं. आपको सोचने पर मजबूर करती हैं कि एक औरत की अहमियत इस दुनिया में कितनी है. 

ऐसा नहीं है कि फिल्म में कोई दिक्कत नहीं है. ये अपनी कहानी को बिल्डअप करने में काफी वक्त निकाल देती है. डोरोथी के किरदार में कीर्ति सुरेश की कहानी थोड़ी और दिखाई जा सकती थी. उनसे थोड़ा इमोशनल जुड़ाव और बढ़ सकता था, लेकिन डायरेक्टर ने अपनी कहानी को जल्द ही सुब्बू और कार्ति पर शिफ्ट कर दिया. यहां तक कि फिल्म में कार्ति की मां भी है, जिसे सुब्बू भी अपनी मां मानता है. लेकिन वहां भी इमोशन्स की कमी महसूस हुई है. फिल्म में आप अगर किन्हीं दो किरदारों में मजबूत कनेक्शन पाते हैं, तो वो सिर्फ कार्ति और सुब्बू हैं. फिल्म में बैकग्राउंड स्कोर भी अच्छा है, आपको सही मोमेंट पर इमोशन फील कराए ऐसा संगीत इसमें डाला गया है. 

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यहां देखें फिल्म का ट्रेलर: 

कैसी है कलाकारों की एक्टिंग?

फिल्म के मेन किरदारों की बात की जाए, तो कार्ति बने ऋषिकांत का काम काफी अच्छा रहा है. आप उनसे इमोशनली जुड़ाव महसूस भी करते हैं. उनके किरदार की अपनी एक जर्नी है, जैसी हर कार्तिक सुब्बाराज फिल्म में होती है. ऋषिकांत ने अपने किरदार को पूरी शिद्दत से निभाया, और छाए भी. लेकिन अगर किसी कलाकार की सबसे ज्यादा चर्चा बनती है, तो वो सनंथ हैं. सुब्बू के किरदार में जो उनका ट्रांसफॉर्मेशन रहा है वो सचमुच तारीफ के काबिल बात है. 

सनंथ ने हर सीन में जान फूंकी हैं. फिल्म डोरोथी मानिए, उन्हीं के कंधों पर टिकी हुई थी. उनका किरदार इस फिल्म की असली जान था, जिसे उन्होंने बढ़िया तरीके से निभाया. सुब्बू के किरदार में सनंथ आपको हर इमोशन फील कराते हैं, जो जरूरी भी लगता है. वहीं, फिल्म में कीर्ति सुरेश भी हैं जो थोड़े समय के लिए ही सही लेकिन डोरोथी बनकर स्क्रीन पर आती हैं और छा जाती हैं. उनकी मासूमियत और मुस्कान आपके दिल में उतर जाएगी. उनका किरदार आपके चेहरे पर हंसी और दिल में चोट भी पहुंचाता है, और यही उनकी एक्टिंग का कमाल है. बाकी, फिल्म में सभी सपोर्टिंग एक्टर्स का काम भी जबरदस्त है. 

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कुल मिलाकर कहा जाए, तो डोरोथी आपकी सोच को बदलने का पूरा दम रखती है. फर्क सिर्फ इतना है कि क्या आप इसे कुछ सीखने-समझने के लिए देखेंगे, या सिर्फ एंटरटेनमेंट के लिए.

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