चंदन आनंद को आपने अब तक कई तरह के किरदारों में देखा होगा. कभी गैंगस्टर, कभी अपराधी, कभी हिंसा से घिरा किरदार तो कभी ऐसा शख्स जिसके अंदर की उथल-पुथल पर्दे पर साफ दिखाई देती है. ‘रंगबाज’, ‘फाइटर’, ‘क्लास’, ‘पार्च्ड’, ‘गुंजन सक्सेना: द कारगिल गर्ल’ और ‘होमबाउंड’ जैसी फिल्मों और सीरीज में अलग-अलग रंग दिखा चुके चंदन के लिए ‘हनुमान अंश’ सिर्फ एक और फिल्म नहीं थी.
ये फिल्म उनके लिए एक ऐसा सफर बन गई, जिसने उन्हें पर्दे पर ही नहीं, बल्कि असल जिंदगी में भी अंदर तक छुआ. इंडिया टुडे/आजतक से बातचीत में उन्होंने फिल्म से जुड़ी कई बातें कीं, साथ ही अपने करियर पर भी रोशनी डाली.
फिल्म में चंदन आनंद राम नंदन भोसले का किरदार निभा रहे हैं. भोसले हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (HSRA) से जुड़े एक क्रांतिकारी हैं, जो शुरुआत में नास्तिक हैं. लेकिन जब उनकी मुलाकात नीम करोली बाबा से होती है, तो उनकी सोच और जिंदगी धीरे-धीरे बदलने लगती है. और दिलचस्प बात ये है कि इस किरदार को निभाते-निभाते चंदन खुद भी एक बदलाव से गुजरने लगे.
‘इतने साल हिंसा देखी, अब सात्विक खाना खाने जैसा लगा’
चंदन आनंद ने अपने अब तक के करियर में ज्यादातर ऐसी कहानियां की हैं, जिनमें अपराध, हिंसा, गैंगस्टर और संघर्ष का तड़का रहा है. ऐसे में ‘हनुमान अंश’ उनके लिए एकदम अलग अनुभव था. वह इस फिल्म को ‘सात्विक भोजन’ जैसा बताते हैं.
चंदन के मुताबिक, पिछले 10-15 सालों से वह लगातार हिंसा, मर्डर मिस्ट्री और गैंगस्टर वाली कहानियों का हिस्सा रहे हैं. ऐसे में आध्यात्मिक फिल्म करना उनके लिए ऐसा था, जैसे मन और आत्मा को सुकून देने वाला खाना मिल गया हो. उनका कहना है कि सात्विक भोजन जिस तरह शरीर के साथ मन और आत्मा को भी पोषण देता है, उसी तरह ‘हनुमान अंश’ भी दर्शकों के मन को कुछ अलग देने की कोशिश करती है.
सेट पर गाली-गलौज तक पर थी पाबंदी!
अब फिल्म आध्यात्मिक हो तो उसका असर सिर्फ कैमरे के सामने ही क्यों रहे? चंदन ने बताया कि निर्देशक विशाल चतुर्वेदी ने फिल्म के सेट का माहौल भी बिल्कुल अलग रखा था. वहां चिल्लाना, लड़ना-झगड़ना और अपशब्द बोलना तक मना था.
यानी जिस फिल्म में आध्यात्मिकता, शांति और ऊंची भावनाओं की बात हो रही थी, मेकर्स ने उसकी शूटिंग के दौरान भी उसी माहौल को बनाए रखने की कोशिश की. चंदन के लिए ये अनुभव कुछ ऐसा था, जहां रील लाइफ और रियल लाइफ एक-दूसरे में घुल गईं.
शायद यही वजह है कि राम नंदन भोसले का किरदार चंदन के दिल के इतना करीब पहुंच गया. उनका कहना है कि पर्दे पर निभाए गए क्रांतिकारी की जिद, आदर्शवाद और सोच उन्हें अपनी असल जिंदगी से भी काफी मिलती-जुलती लगी.
चंदन बताते हैं कि उन्हें अक्सर आदर्शवादी, जिद्दी, अड़ियल और यहां तक कि अव्यावहारिक तक कहा गया है, क्योंकि वह मानते हैं कि काम अच्छे इरादे से और समाज की भलाई के लिए होना चाहिए.
लेकिन जिंदगी हमेशा इतनी सीधी कहां होती है?
चंदन कहते हैं कि असल दुनिया काफी कठोर और व्यावहारिक है. लोग अपने लक्ष्य के पीछे भाग रहे हैं और उसे पाने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार हैं. ऐसे में भोसले का किरदार निभाने के बाद वह खुद भी अपनी सोच को नए सिरे से देखने लगे हैं. मैं अभी भी बदलाव की प्रक्रिया में हूं. यही शायद इस फिल्म का चंदन पर सबसे बड़ा असर है.
फिल्म में चंदन सिर्फ किरदार नहीं निभा रहे, बल्कि नैरेटर की भूमिका में भी हैं. उन्होंने इस हिस्से को बहुत घरेलू और दिल छू लेने वाले अंदाज में सोचा. उनके दिमाग में एक तस्वीर थी- एक बच्चा अपने दादा से पूछ रहा है- बाबा कौन हैं? बस, यहीं से चंदन ने अपनी आवाज और नैरेशन का अंदाज पकड़ा.
वह चाहते थे कि उनकी आवाज में शांति हो, नरमी हो और कहानी सुनाने का वो उत्साह हो, जैसा घर में नानी-दादी या दादा-दादी बच्चों को कहानी सुनाते वक्त रखते थे. उनके मुताबिक फिल्म की कहानी और उसका ट्रीटमेंट उन्हें आर.के. नारायण के ‘मालगुडी डेज’ और घर में सुनाई जाने वाली पुरानी कहानियों की याद दिलाता है.
पहले मिला था पुलिस इंस्पेक्टर का रोल, फिर बदल गई पूरी कहानी
चंदन आनंद के लिए ‘हनुमान अंश’ की एक और दिलचस्प कहानी है. उन्हें शुरुआत में फिल्म में पुलिस इंस्पेक्टर का किरदार ऑफर हुआ था. लेकिन चंदन ने निर्देशक से पूछा कि क्या वह नैरेटर का रोल कर सकते हैं. और फिर सेट पर पहुंचते-पहुंचते उनका किरदार ही बदल गया. आखिरकार वह फिल्म के एक बेहद अहम किरदार में नजर आए, एक ऐसा किरदार जो बाबा के बाद कहानी में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है.
चंदन ने अपने इस अनुभव को महज इत्तेफाक नहीं माना. उन्होंने बताया कि शूटिंग शुरू होने से करीब छह महीने पहले ही उन्होंने पहली बार नीम करोली बाबा के बारे में करीब से जाना और बाबा के मंदिर गए. वहां उन्होंने प्रार्थना की कि उन्हें हनुमान जी से जुड़ी किसी फिल्म में काम करने का मौका मिले. और इसके करीब छह महीने बाद उन्हें ‘हनुमान अंश’ के लिए फोन आ गया.
चंदन इसे कहते हैं- हनुमान जी का आशीर्वाद. उनके लिए ये फिल्म सिर्फ एक प्रोजेक्ट नहीं, बल्कि जिंदगी बदल देने वाला मौका बन गई. उन्होंने निर्देशक विशाल चतुर्वेदी का शुक्रिया अदा करते हुए कहा कि इस किरदार ने उनकी जिंदगी को बेहतर और खुशहाल बनाया है.
Gen Z को भी क्यों पसंद आई ‘हनुमान अंश’?
आध्यात्मिक फिल्म का मतलब अक्सर लोगों के दिमाग में एक खास उम्र के दर्शक आते हैं. लेकिन ‘हनुमान अंश’ को युवा दर्शकों से भी प्यार मिला. चंदन के मुताबिक इसकी वजह उम्र नहीं, भावनाएं हैं.
उनका मानना है कि Gen Z हो या आने वाली पीढ़ियां- हर इंसान के अंदर भावनाएं एक जैसी होती हैं. फर्क सिर्फ इतना है कि आज की जिंदगी में डर, गुस्सा, जलन और बेचैनी जैसी निचली भावनाएं हावी हो गई हैं. ‘हनुमान अंश’ इसके उलट प्यार, खुशी, शांति और हिम्मत जैसी ऊंची भावनाओं को छूती है. और शायद यही वजह है कि युवा दर्शक भी इससे कनेक्ट कर पाए.
‘मैं अपने करियर के बेस्ट फॉर्म में हूं’
क्राइम और हिंसा से भरे किरदारों के लंबे सफर के बाद चंदन अब अपने करियर के उस दौर में हैं, जहां वह अलग-अलग तरह के किरदारों के साथ एक्सपेरिमेंट कर रहे हैं. हाल ही में वह ‘हस्तिनापुर के वीर’ में शकुनि जैसे किरदार में भी नजर आए हैं.
चंदन का मानना है कि ये उनकी जिंदगी का सबसे अच्छा दौर है, क्योंकि उनका शरीर, दिमाग और आत्मा एक लय में हैं और उन्हें अलग-अलग तरह के किरदार निभाने का मौका मिल रहा है. वह खुद कहते हैं कि- मैं एक एक्टर और परफॉर्मर के तौर पर अपने बेस्ट फॉर्म में हूं.
अब सपना है पर्दे पर ‘हनुमान जी’ बनना!
जब चंदन से पूछा गया कि अगर उन्हें किसी पौराणिक किरदार को निभाने का मौका मिले तो वह किसे चुनेंगे, तो जवाब में ज्यादा सोचने की जरूरत नहीं पड़ी. उनका सपना है- हनुमान जी को सुपरहीरो के अंदाज में निभाना. और लगता है कि ‘हनुमान अंश’ के बाद उनके लिए ये सिर्फ एक सपना नहीं, बल्कि एक ऐसी भूमिका है जिससे वह वाकई जुड़ाव महसूस करते हैं.
अगर आपको ‘हनुमान अंश’ पसंद आई है तो अच्छी खबर ये है कि कहानी अभी खत्म नहीं हुई है. निर्देशक विशाल चतुर्वेदी ने आगरा में दर्शकों के साथ बातचीत के दौरान ‘हनुमान अंश 2’ का ऐलान किया. सीक्वल में नीम करोली बाबा के जन्मस्थान और उनकी आगे की आध्यात्मिक यात्रा पर फोकस किया जाएगा.
7 अगस्त 2026 को सिनेमाघरों में रिलीज हुई ‘हनुमान अंश’ ने चंदन आनंद को सिर्फ एक नया किरदार नहीं दिया, बल्कि उन्हें खुद की जिंदगी और सोच को नए नजरिए से देखने का मौका भी दिया. हिंसा और अपराध वाली कहानियों के बीच लंबे वक्त तक रहने के बाद अब अगर उन्हें ‘सात्विक भोजन’ जैसा सुकून मिल रहा है, तो शायद ये उनके करियर का वो मोड़ है जहां एक्टर सिर्फ किरदार नहीं निभा रहा- बल्कि उन्हें जी भी रहा है.
आजतक एंटरटेनमेंट डेस्क