बॉलीवुड के 'सीरियल किसर' रहे इमरान हाशमी में कुछ तो ऐसी बात है. वो सिर्फ एक स्टार नहीं, बल्कि अपने आप में एक पूरा जॉनर हैं. उनकी नई फिल्म आवारापन 2 इस बात को पूरी तरह साबित भी कर रही है. इसे देखने के लिए जो दीवानगी लोगों में दिख रही है, उसकी उम्मीद नहीं थी. लेकिन अब सवाल ये है कि आखिर इमरान को इतना खास क्या बनाता है?
वो क्या चीज है, जिसने उन्हें एक ऐसा स्टार बनाया जिसके नाम पर एक अलग सिनेमा जॉनर बन चुका है? क्योंकि इस वक्त थिएटर्स में आवारापन 2 के साथ जो हो रहा है, उसे सिर्फ बॉक्स ऑफिस के आंकड़ों से समझना मुश्किल है. इसके लिए बॉक्स ऑफिस से आगे जाकर कहानी समझनी होगी.
बॉक्स ऑफिस पर आवारापन 2 का तूफान
इमरान की फिल्म आवारापन 2 बॉक्स ऑफिस पर इतनी शानदार कमाई कर रही है कि इसे सिर्फ एक और बॉलीवुड फिल्म मानना मुश्किल है, जिसने अपनी सफलता की कहानी लिखी है. फिल्म का कोई बड़ा प्रमोशन नहीं हुआ. ऊपर से प्रोड्यूसर विशेष भट्ट ने हाल ही में बताया कि शुरुआत में फिल्म को रिलीज करने के लिए कोई तैयार खरीदार तक नहीं मिल रहा था.
इसके बावजूद आवारापन 2 ने सिर्फ चार दिनों में दुनियाभर में 130 करोड़ रुपये और इंडिया में 109 करोड़ रुपये का ग्रॉस कलेक्शन किया. फिल्म ने पहले सोमवार को भी ठीक-ठाक कमाई की, जिससे साफ हो गया कि इसकी सफलता सिर्फ ओपनिंग वीकेंड तक सीमित नहीं है. ऑडियंस अब भी थिएटर्स पहुंच रही है.
आवारापन 2 में ऑडियंस को क्या पसंद आया?
इंडिया एक ऐसी फिल्म के लिए पागल क्यों हो रहा है, जिसकी कहानी ईमानदारी से कहें तो बहुत शानदार नहीं है? इमरान हाशमी को छोड़ दें तो फिल्म में ऐसी कोई परफॉर्मेंस नहीं है, जिसे देखकर आप दंग रह जाएं. ना कोई असाधारण केमिस्ट्री है, और ना कोई बहुत नया आइडिया. अच्छा म्यूजिक जरूर है, लेकिन उसमें भी काफी कुछ पुराना ही है. 'तेरा मेरा रिश्ता' और 'तो फिर आओ' ही वो गाने हैं, जो फिल्म के इमोशनल हिस्से को सबसे ज्यादा संभालते हैं.
तो फिर लोग थिएटर क्यों जा रहे हैं? वीकडेज में टिकट क्यों बुक कर रहे हैं? फिल्म देखने के बाद उसके एक्सपीरियंस के बारे में बात क्यों कर रहे हैं? सोशल मीडिया पर इसकी चर्चा क्यों हो रही है? इसका जवाब पाने के लिए आपको बहुत ज्यादा सोचने की जरूरत नहीं है. जवाब बेहद सीधा है—इमरान हाशमी.
इमरान हाशमी उस टूटे हुए, उदास और अधूरे प्रेमी की पहचान हैं, जिसके साथ मिलेनियल्स बड़े हुए. वो ऐसा हीरो है, जिसने अपनी इमोशनल कमजोरी को प्यार के लिए एक खास तरह के जुनून में बदल दिया. जिस लड़की से उसे प्यार था, वो जिंदा हो या मर चुकी हो, इससे फर्क नहीं पड़ता था. मायने रखता था उसका जुनून, उसका दर्द, उसकी इमोशन्स और उस प्यार को जिंदा रखने के लिए वो कितनी दूर तक जाने को तैयार है. सच कहें तो आवारापन इस पूरी विरासत का शायद सबसे ऊंचा मुकाम है.
इमरान ने शिवम पंडित के किरदार में ऐसा हीरो बनाया, जिससे आम जनता जुड़ गई क्योंकि वो अपने दर्द को छिपाने की कोशिश नहीं करता. प्यार उसे इस कदर तोड़ चुका है कि उसके सामने बस दो रास्ते हैं—टूटे हुए रहो या खुद को फिर से जोड़कर जिंदगी के अगले सफर पर निकल पड़ो. एक नया मिशन ढूंढो. जागने की एक नई वजह तलाशो. फिर खुद को तोड़ो और उसी टूटने में किसी तरह सुकून खोज लो.
शिवम पंडित के दर्द से हुआ जुड़ाव
आवारापन का शिवम पंडित उस इंसान की तस्वीर है, जो हमेशा प्यार में जलता रहता है और किसी के इंतजार में जीता है. उसके दर्द का कोई अंत नहीं है. बस एक और दिन आता है, जो उसके दर्द में कुछ और जोड़ देता है. और फिर भी वो हीरो है. क्योंकि वो अपने दर्द से भागता नहीं. वो उसके बीच से गुजरता है, जैसे जलते हुए कोयलों पर चल रहा हो या कीलों से भरे फर्श पर कदम रख रहा हो. दर्द आज भी उसे तकलीफ देता है, लेकिन फर्क सिर्फ इतना है कि उसने इस सच को स्वीकार कर लिया है कि ये दर्द अब उसकी पहचान का हिस्सा है.
यही गहराई और जुनून इमरान हाशमी को सिनेमा का एक अनोखा ब्रांड बनाता है. करीब 19 साल बाद आवारापन 2 ने बस ऑडियंस को उसी ब्रांड की याद दिला दी. फिल्म ने उसे दोबारा पैकेज करने या नया रूप देने की कोशिश नहीं की. उसने लगभग कुछ नया करने की कोशिश ही नहीं की. मेकर्स ने इमरान हाशमी को वापस ला दिया और बाकी चीजें अपने आप अपनी जगह बैठती चली गईं.
क्योंकि बाकी एक्टर्स ने क्या किया? शबाना आजमी हैं, लेकिन उन्हें ऐसा करने के लिए बहुत कम मौके मिलते हैं, जिसमें वो पूरी तरह अपना दम दिखा सकें. नए-नए आए पूरन गब्बी हैं, लेकिन विलेन उतना खतरनाक नहीं बन पाता, जितनी कहानी को जरूरत थी. दिशा पाटनी भी हैं, लेकिन फिल्म में उनका किरदार आखिर कर क्या रहा है? बात बार-बार घूमकर एक ही इंसान पर आ जाती है.
सिर्फ इमरान हाशमी.
इमरान हाशमी आज भी शिवम पंडित का दर्द ऐसे महसूस करा सकते हैं, जैसे उन्होंने ये किरदार करीब दो दशक पहले निभाया ही नहीं था, बल्कि इन सालों में उसे अपनी सफेद शर्ट की ऊपरी जेब में संभालकर रखा हो. इमरान और उनके फैंस के रिश्ते की सबसे अजीब और खूबसूरत बात यही है. दर्शक सिर्फ उनके किरदारों को याद नहीं रखते. वो उस एहसास को याद रखते हैं, जो इमरान उनके पीछे छोड़ गए.
आवारापन 2 ऐसी पहली बॉलीवुड सीक्वल बन गई है, जिसने रिलीज के पहले ही दिन अपने पिछले पार्ट की पूरी लाइफटाइम कलेक्शन को पीछे छोड़ दिया. 2007 में आई आवारापन ने अपनी पूरी थिएट्रिकल रन में करीब 7 करोड़ रुपये नेट कमाए थे. वहीं आवारापन 2 ने 22 करोड़ रुपये नेट की ओपनिंग की.
लेकिन अगर आपको लगता है कि यहां हम सिर्फ दो फिल्मों के बॉक्स ऑफिस आंकड़ों की तुलना कर रहे हैं, तो आप बिल्कुल गलत हैं. असली कहानी नंबरों की नहीं, उस पीढ़ी के प्यार की है जो इंडिया में गिने-चुने सितारों को ही नसीब होता है. इमरान यकीनन उन सितारों में से एक हैं.
2007 में आवारापन देखने वाला लड़का अब बड़ा हो चुका है. उसके पास नौकरी है, जिम्मेदारियां हैं, शायद परिवार भी है. उसने अपनी जिंदगी में खुद भी दिल टूटने का दर्द झेला होगा. वो बड़ा हो गया है. लेकिन उसके अंदर कहीं आज भी वो लड़का मौजूद है, जिसे 'तो फिर आओ' के बोल याद थे. जो इमरान हाशमी के क्लोज-अप में छिपे दर्द को समझता था. जिसे पता था कि एक खास तरह का प्यार आपको बर्बाद भी कर सकता है और फिर भी जिंदा होने का एहसास करा सकता है.
आवारापन 2 उस पुराने इंसान से दोबारा मिलने का बहाना
शायद इसीलिए इस कहानी में बॉक्स ऑफिस सिर्फ एक हिस्सा है. असली कहानी उस नॉस्टैल्जिया की है, जिसे दोबारा जिंदा किया जा रहा है. इमरान हाशमी पिछले कई सालों से खुद को लगातार बदलते रहे हैं. पिछले साल वो ग्राउंड जीरो फिल्म में नजर आए, जहां उन्होंने कश्मीर में आतंकवाद विरोधी ऑपरेशन की अगुवाई करने वाले BSF अधिकारी का किरदार निभाया.
इस साल की शुरुआत में वो यामी गौतम के साथ हक में दिखे, जहां उन्होंने 1980 के दशक के एक ऐसे शख्स का किरदार निभाया, जो अपनी पत्नी के कानूनी और नैतिक अधिकारों के खिलाफ खड़ा होता है. ये बदलाव मायने रखता है क्योंकि जिस एक्टर की एक खास पहचान बन चुकी हो, उसके लिए उसी पहचान में कैद हो जाना सबसे आसान चीज होती है.
इमरान हाशमी ने सालों तक उस बॉक्स से बाहर निकलने की कोशिश की, जो दर्शकों ने उनके लिए बनाया था. लेकिन करीब 20 साल बाद जब वो उसी बॉक्स में लौटे, तो ऑडियंस उनका इंतजार कर रहे थे. पिछले साल नेटफ्लिक्स पर आई आर्यन खान की डेब्यू डायरेक्टोरियल सीरीज द बैड्स ऑफ बॉलीवुड ने भी इमरान की इसी छवि के साथ खेला. उन्होंने खुद का एक वर्जन निभाया—बेफिक्र, खुद को लेकर जागरूक और स्टार जैसा. ऑडियंस को शायद एक ऐसी बात फिर याद आई, जिसे वो कभी शब्दों में कह नहीं पाए थे— आखा बॉलीवुड एक तरफ, इमरान हाशमी एक तरफ.
इमरान का करियर
वो मिलेनियल्स जो इंटरनेट, केबल टीवी और 2000 के दशक की शुरुआत में हिंदी फिल्म म्यूजिक के विस्फोट के साथ बड़े हुए, इमरान उनके लिए सिर्फ एक एक्टर नहीं थे. वो दर्द, रोमांस, चाहत और बगावत के एक खास कॉम्बिनेशन की पहचान थे जिन्होंने ये सब बिना किसी पारंपरिक बॉलीवुड हीरो की तरह दिखे किया.
एक्टर का चार्म कभी सिक्स पैक एब्स पर निर्भर नहीं रहा. उनके गाने यादगार थे. उनकी फिल्मों की एक्ट्रेसेस भी उनकी फिल्मों की कहानी का हिस्सा बन गईं. लेकिन सबसे ज्यादा खास था उनका चेहरा, जो किसी आम से दिल टूटने को भी सिनेमाई बना सकता था. इमरान हाशमी किसी औसत कहानी को भी छू लें तो वो एक इवेंट जैसी लगने लगती थी.
आज हम आवारापन 2 की बात इसी वजह से कर रहे हैं. इमरान हाशमी को लेकर लोगों की सामूहिक याददाश्त आज भी हैरान करने वाली है. उनका उस दौर का कोई भी गाना बजा दीजिए और कोई ना कोई आपको बता देगा कि वो किस फिल्म का था, इमरान के किरदार का नाम क्या था, वो किससे प्यार करता था और अक्सर ये भी कि उन्हें उस फिल्म का कौन सा सीन सबसे ज्यादा याद है.
सीरियल किसर की छवि
यहां तक कि जब इमरान ने अपनी 'सीरियल किसर' वाली छवि से दूर जाने की कोशिश की, जैसा कि उन्होंने आवारापन में किया था, तब भी वो अपनी पुरानी पहचान से पूरी तरह बाहर नहीं निकले थे. उन्होंने बस उस घर में एक और कमरा जोड़ दिया था, जिसे दर्शक पहले ही उनके लिए बना चुके थे. सच तो ये है कि ऐसा कोई दौर आया ही नहीं, जब इमरान हाशमी लोगों के बेहद पसंदीदा स्टार से अचानक भुला दिए गए हों.
बॉक्स ऑफिस ने भले ही कई बार उनके साथ क्या करना है, ये समझने में वक्त लगाया हो, लेकिन वो आइकन बने रहे. अब जब वो उसी उदास, गंभीर और टूटे हुए अवतार में वापस आए हैं, तो वो लड़के जो उन्हें देखकर बड़े हुए थे, अपने घरों में बैठकर 'रीइन्वेंशन' की बातें कर सकते हैं. यंग एक्टर्स देख सकते हैं कि ऐसी स्क्रीन पहचान कैसे बनाई जाती है, जिसके पास दर्शक करीब दो दशक बाद भी लौटकर आते हैं.
यही चीज आवारापन 2 को दिलचस्प बनाती है. ये जरूरी नहीं कि एक शानदार फिल्म हो. सच कहें तो बिल्कुल नहीं. ये भी जरूरी नहीं कि इसे सीक्वल की जरूरत थी. ये तो पक्का है. लेकिन ये एक लव लेटर है. इमरान हाशमी की तरफ से उस ऑडियंस के नाम, जिसने उन्हें कभी याद करना बंद नहीं किया. उस ऑडियंस की तरफ से उस एक्टर के नाम, जिसके गाने, खामोशियां, टूटे हुए दिल और दर्द भरी आंखें उनके अपने बड़े होने के सफर का हिस्सा बन गईं.
फैंस के लिए बनाई आवारापन 2
जब इमरान हाशमी हाल ही में अचानक एक थिएटर में पहुंचे थे, तो उन्होंने कहा था कि उन्होंने आवारापन 2 अपने फैंस की वजह से बनाई है. शायद बॉक्स ऑफिस उन्हीं फैंस का जवाब है. वो इसलिए थिएटर नहीं आए क्योंकि कहानी उन्हें खींच लाई. ना इसलिए कि फिल्म का जबरदस्त प्रमोशन हुआ. ना इसलिए कि कोई नया फ्रेंचाइजी लॉन्च किया जा रहा था. वो थिएटर आए और आ रहे हैं क्योंकि इमरान हाशमी वापस आ गए हैं.
उस शख्स के रूप में, जो दिल टूटने को भी हीरोइक बना सकता था. उस प्रेमी के रूप में, जो दर्द को कविता में बदल सकता था. और उस स्टार के रूप में, जिसकी सबसे बड़ी ताकत कभी उसकी मसल्स, एक्शन या स्वैग नहीं रही—बल्कि ये थी कि वो पूरी की पूरी एक पीढ़ी को कुछ महसूस करा सकता था. नॉस्टैल्जिया हमेशा इसलिए नहीं बिकता क्योंकि अतीत परफेक्ट था. कई बार वो इसलिए बिकता है क्योंकि उस दौर को जी चुके लोग अपने उस पुराने वर्जन को आज भी मिस करते हैं, जो कभी वो हुआ करते थे.
इमरान हाशमी ने बस उन्हें उस पुराने दौर में लौटने का टिकट दे दिया. कुछ दिनों के लिए 2026, 2007 का रास्ता बन गया है. और अगर आप ध्यान से सुनें, तो शायद आज भी कहीं दूर से इमरान हाशमी की आवाज सुनाई दे रही है— 'तो फिर आओ...'
आजतक एंटरटेनमेंट डेस्क