उत्तर प्रदेश की सियासत में सपा प्रमुख अखिलेश यादव के विनिंग फार्मूले 'पीडीए' (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) को ध्वस्त करने का चक्रव्यूह रचना बीजेपी ने शुरू कर दिया है. सीएम योगी ने अपने तरकश से तीर चलाने शुरू कर दिए हैं रविदास जयंती पर योगी आदित्यनाथ ने भदोही जिले का नाम बदलकर संत रविदास नगर कर दिया है.
भदोही का नाम बदलने से सिर्फ जिले की सियासत गर्माने के साथ-साथ सूबे का सियासी तापमान बढ़ गया है. बीजेपी इस बहाने सपा को दलित विरोधी कठघरे में खड़े करने के साथ ही अखिलेश के पीडीए समीकरण में सेंधमारी करना चाहती है.
संत रविदास महाराज की 650वीं जयंती पर बीजेपी ने समरसता संकल्प अभियान यात्रा का आगाज किया, जो सात महीने तक चलेगी. बीजेपी इस अभियान के जरिए विशेष रूप से दलित समाज तक अपनी पहुंच मजबूत करने की है. इसीलिए संकल्प यात्रा को सूबे की सभी दलित बहुल सभी सीटों पर लेकर बीजेपी के बिगड़े कास्ट समीकरण को नए तरीके से मजबूत करने का प्लान बनाया है.
उत्तर प्रदेश में दलित वोटर कितना अहम
उत्तर प्रदेश में दलित समाज की आबादी 22 फीसदी के करीब है और 403 विधानसभा सीटों में से 84 सीटें उनके के लिए आरक्षित हैं. यूपी की करीब 100 से ज्यादा विधानसभा सीटों पर दलित वोटर अहम रोल अदा करते हैं.2022 में विधानसभा चुनाव में बीजेपी और उसकी सहयोगी अपना दल (सोनेलाल) ने मिलकर एससी सुरक्षित 84 सीटों में से 63 सीटों पर जीत दर्ज की थी जबकि सपा सिर्फ 20 सीटें सीटें जीती थी. इसके अलावा एक सीट आरएलडी ने जीती थी. आरएलडी अब बीजेपी के साथ है. बसपा और कांग्रेस एक भी सुरक्षित सीट नहीं जीत सकी थी.
2024 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी का दलित समीकरण बिगड़ गया है. संविधान और आरक्षण के नैरेटिव सेट करके सपा और कांग्रेस ने दलित वोटों को साधने में कामयाब रही थी. इसके चलते बीजेपी का यूपी में पूरा सियासी गेम खराब हो गया था, लेकिन अब दोबारा से दलित वोटों को साधने की कवायद में बीजेपी जुट गई है. इसी मद्देनजर भदोही जिले का नाम बदलकर संत रविदास नगर रखा गया है.
रविदास के बहाने सपा को मात देने का प्लान
उत्तर प्रदेश के भदोही जिले का गठन 1995 में हुआ था. भदोही का नाम बदलने को लेकर बहुजन समाज पार्टी की ओर से जबर्दस्त दबाव बना. हालांकि, बात नहीं बनी. जैसे ही बसपा सत्ता में आई और मायावती मुख्यमंत्री बनीं, उन्होंने इस जिले का नाम बदल दिया. भदोही को संत रविदास नगर कर दिया. 2012 में सपा की सरकार बनते ही जिले का नाम बदलकर भदोही कर दिया था.
संत रविदास जी महाराज की 650वीं जयंती पर बुधवार को सीएम योगी ने एक बार फिर से भदोही जिले का नाम बदलकर संत रविदास कर दिया. सीएम योगी ने कहा कि सपा की सरकार ने संत रविदास नगर का नाम बदलने का पाप किया था, हमारी सरकार इस नाम को फिर से बहाल करेगी. सीएम योगी आदित्यनाथ ने संत रविदास नगर जिले की घोषणा से यूपी से लेकर पंजाब तक की राजनीति को साधने की दिशा में बड़ा कदम उठाया है.
संत शिरोमणि रविदास जी महाराज का पंजाब के दलित सिख समुदाय में एक अहम स्थान है. अब उनके नाम पर फिर से जिले की घोषणा के जरिए सीएम योगी आदित्यनाथ यूपी के 22 फीसदी के दलित वोटों के साथ-साथ पंजाब की करीब 32 फीसदी दलित समुदाय के विश्वास को जीतने का तानाबाना बुना है तो सपा को दलित विरोधी कठघरे में खड़े करने का प्लान है.
संत रविदास के अनुयायियों को रविदासिया समाज के नाम से जाना जाता है और ये दलित समुदाय का एक प्रमुख वर्ग हैं, इस समाज की सबसे बड़ी आबादी पंजाब के दोआबा क्षेत्र में रहती है. ऐसे हीरविदासिया समुदाय की संत रविदास के प्रति गहरी आस्था का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि 2022 के पंजाब विधानसभा चुनाव की मतदान की तारीख भी बदलनी पड़ी थी. यूपी में बड़ी संख्या में रविदास समाज के लोग हैं, जो कभी बसपा के वोटबैंक हुआ करते थे.
सीएम योगी के तरकश में कई तीर
सपा पिछड़ा दलित अल्पसंख्यक यानी पीडीए पॉलिटिक्स के जरिए बीजेपी को घेरने की तैयारी कर रही है. संत रविदास के जरिए सीएम योगी आदित्यनाथ ने अखिलेश यादव के फैसले पर सवाल उठाते हुए दलित वोट बैंक को बड़ा संदेश दिया है. दलित वोटों के साधने के बीजेपी प्लान में सीएम योगी के तरकश का पहला तीर भदोही जिले का नाम बदलकर संत रविदास किया.संत रविदास के जरिए लोकसभा चुनाव में छिटके दलित वोटरों को साधने का दांव है. योगी के तरकश में कई दलित महापुरुष हैं, जिनके जरिए सपा को दलित विरोधी कठघरे में खड़े करने का है.
बीजेपी ने दलित वोटों को साधने के लिए दलित महापुरुषों की विरासत और समाज के लोगों से लगातार संवाद करने का है. इस संवाद के जरिए समाज के निचले हिस्से तक पार्टी अपने संदेश और कार्यों को पहुंचाने की तैयारी में है. बीजेपी ने संत रविदास के साथ-साथ कांशीराम, संत गाडगे, डॉ. भीमराव अंबेडकर, ज्योतिबा फुले, सावित्रीबाई फुले, उदा देवी, झलकारी बाई, वीरा पासी, लखन पासी और रमाबाई अंबेडकर जैसी करीब 15 दलित और वंचित समाज के महापुरुषों का एक वार्षिक कैलेंडर है. बीजेपी सिर्फ सपा को ही नहीं बल्कि बसपा के वोटबैंक को भी अपने साथ जोड़ने की कवायद कर रही है.
सपा के संग बसपा के वोटों पर नजर
सपा प्रमुख अखिलेश यादव पीडीए समीकरण के जरिए खुद को यूपी की राजनीति कर रही है और सत्ता में वापसी की कवायद में है. बीजेपी ने दलित वोटों को साधकर सपा के पीडीए फार्मूल को काउंटर करने के साथ-साथ बसपा के जाटव वोटों को अपने साथ जोड़ना चाहती है. मायावती का सियासी आधार यानि दलित वोटबैंक लगातार खिसकता जा रहा है.ऐसे में बीजेपी ने दलित वोटों को अपने साथ जोड़ने के मिशन पर काम शुरू कर दिया है.
सीएम योगी ने दलित दलित अस्मिता और सामाजिक न्याय से जुड़े महापुरुषों के बहाने अपनी सियासी पैठ मजबूत करना चाहती है. बीजेपी लगातार दलित समुदाय के बीच अपनी पहुंच बढ़ाने की कोशिशों में जुटी है. आरएसएस सामाजिक समरसता के जरिए दलित समुदाय के विश्वास को जीतने की कोशिश में है तो योगी सरकार की कोशिश दलित महापुरुषों के नाम पर बदले गए जिलों के नाम को बहाल करना शुरू कर दिया है.
कुबूल अहमद