उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले विपक्षी खेमे में सीटों को लेकर सियासी हलचल तेज हो गई है. समाजवादी पार्टी और कांग्रेस ने साथ मिलकर चुनाव लड़ने के संकेत तो दिए हैं, लेकिन दोनों दलों के बीच सीटों का बंटवारा अभी भी पहेली बना हुआ है. एक तरफ कांग्रेस सपा से 200 सीटों तक की हिस्सेदारी की बात कर रही है, तो दूसरी तरफ कांग्रेस के साथ आने की कोशिश कर रहे छोटे दल भी अपने लिए सीटों की मांग कर रहे हैं.
यूपी की 403 विधानसभा सीटों के लिहाज से देखें तो कांग्रेस की 200 सीटों की मांग लगभग आधी सीटों की हिस्सेदारी के बराबर है. कांग्रेस के उत्तर प्रदेश प्रभारी राजेंद्र पाल गौतम ने 4 अक्टूबर को सीटों के सवाल पर कहा कि 150 सीटों की बात किसने की, उन्होंने तो 200 सीटों की बात की थी. इससे पहले कांग्रेस के अलग-अलग नेताओं की ओर से 100 से 150 सीटों तक की दावेदारी की बातें सामने आती रही हैं.
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कांग्रेस को कितनी सीटें देने को तैयार सपा?
कांग्रेस की मांग और समाजवादी पार्टी की ओर से सामने आ रही संख्या में बड़ा डिफरेंस है. समाजवादी पार्टी की ओर से अभी तक सीट शेयरिंग को लेकर कोई घोषणा नहीं की गई है. हालांकि सपा खेमे से कांग्रेस के लिए 50 सीट जैसी संख्या भी सामने आई है,
एक दिन पहले ही सपा सांसद शिवपाल सिंह पटेल ने कहा था कि, '2024 के लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी ने कांग्रेस को पूरा समर्थन दिया था. गठबंधन में कांग्रेस को जहां भी सीटें मिलीं, वहां समाजवादी पार्टी का एक-एक वोट उसके उम्मीदवारों के पक्ष में गया. उन्होंने 2024 के लोकसभा चुनाव के नतीजों का जिक्र करते हुए कहा कि 'हमने 37 सीटें जीतीं. हम हर लिहाज से कांग्रेस से बहुत आगे हैं. उन्हें 50 से ज्यादा सीटें नहीं मांगनी चाहिए और इतने में खुश रहना चाहिए. कांग्रेस को सहयोग करना चाहिए, न कि तरह-तरह की बेतुकी या नकारात्मक बातें करनी चाहिए.'
यानी कांग्रेस की 200 सीटों की मांग और सपा की तरफ से सामने आ रही संभावित संख्या के बीच फिलहाल बड़ा फासला है.
उधर, कांग्रेस की ओर अब छोटे विपक्षी दलों का रुझान भी बढ़ रहा है. इनमें कई ऐसे दल भी हैं, जो पहले समाजवादी पार्टी के साथ रहे हैं. इन दलों को उम्मीद है कि अगर कांग्रेस सपा से पर्याप्त सीटें हासिल करती है तो गठबंधन में उनके लिए भी जगह बन सकती है. पिछले कुछ दिनों में अपनी जनता पार्टी के स्वामी प्रसाद मौर्य, ओबीसी चौहान समुदाय का प्रतिनिधित्व करने वाली पार्टी के प्रमुख संजय चौहान और अपना दल (कमेरावादी) के नेता पंकज निरंजन ने कांग्रेस नेता राहुल गांधी से मुलाकात की है.
ये मुलाकातें ऐसे समय हुई हैं, जब उत्तर प्रदेश कांग्रेस के प्रभारी राजेंद्र पाल गौतम ने सपा के साथ सीट बंटवारे में कांग्रेस के लिए 'बराबर सम्मान और बराबर हिस्सेदारी' की मांग की है.
छोटे दलों को साथ लाने की कोशिश
अखिलेश यादव के इन छोटे दलों से दूरी बनाए रखने के बीच कांग्रेस अलग-अलग जातीय समूहों और स्थानीय स्तर पर प्रभाव रखने वाले नेताओं को अपने साथ जोड़ने की कोशिश कर रही है.
2022 के विधानसभा चुनाव से पहले बनाए गए भागीदारी मोर्चा से जुड़े कई दल भी अब कांग्रेस के साथ आने की संभावनाएं तलाश रहे हैं. संजय चौहान और पंकज निरंजन इस मोर्चे से जुड़े थे, जबकि निरंजन इसके संस्थापकों में शामिल थे.
कांग्रेस की यह रणनीति कुछ हद तक 2017 के विधानसभा चुनाव से पहले बीजेपी की रणनीति जैसी मानी जा रही है. उस समय अमित शाह के नेतृत्व में बीजेपी ने कई छोटे दलों और अलग-अलग जातीय समूहों के नेताओं को साथ जोड़कर अपना सामाजिक आधार बढ़ाने की कोशिश की थी.
स्वामी प्रसाद मौर्य ने मांगीं करीब एक दर्जन सीटें
अखिलेश यादव ने कांग्रेस से ऐसे उम्मीदवार मैदान में उतारने को कहा है, जो चुनाव जीतने की क्षमता रखते हों. इसी को देखते हुए कांग्रेस स्थानीय स्तर पर प्रभावशाली नेताओं से संपर्क कर रही है, जिन्हें पार्टी के टिकट पर चुनाव मैदान में उतारा जा सके. स्वामी प्रसाद मौर्य ने करीब एक दर्जन सीटों की मांग की है और वह अपनी पार्टी के चुनाव चिह्न पर उम्मीदवार उतारना चाहते हैं. हालांकि, कांग्रेस की ओर से कहा गया है कि मौर्य कांग्रेस के चुनाव चिह्न पर चुनाव लड़ें.
ओवैसी का प्रस्ताव, लेकिन अभी गठबंधन से बाहर
इस पूरे समीकरण में असदुद्दीन ओवैसी की AIMIM भी लगातार चर्चा में है. ओवैसी ने समाजवादी पार्टी और INDIA गठबंधन के दलों को बीजेपी को रोकने के लिए साथ आने का प्रस्ताव दिया है. 4 अक्टूबर को श्रावस्ती में भी उन्होंने कहा कि AIMIM गठबंधन या किसी तरह की चुनावी समझ बनाने के लिए तैयार है. हालांकि फिलहाल AIMIM सपा-कांग्रेस गठबंधन का हिस्सा नहीं है. अखिलेश यादव की ओर से भी मौजूदा सपा-कांग्रेस गठबंधन को जारी रखने की बात कही गई है.
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