पंजाब विधानसभा चुनाव के लिए बिछाई जा रही सियासी बिसात के बीच शिरोमणि अकाली दल के प्रमुख सुखबीर सिंह बादल ने शुक्रवार को दिल्ली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात की.सुखबीर बादल शुक्रवार सुबह ही दिल्ली पहुंचे थे और संसद भवन में पीएम मोदी से मिले. इस मुलाकात के बाद सवाल उठ रहे हैं कि क्या पंजाब में बीजेपी और अकाली दल फिर से हाथ मिलाने जा रहे हैं.
सुखबीर सिंह बादल ने पीएम से मुलाकात के बाद कहा कि पंजाब की कानून व्यवस्था को लेकर बातचीत हुई है. इसके साथ साथ राज्य की सरकारी योजनाओं में भ्रष्टाचार को लेकर भी बात रखी है. बीजेपी, अकाली दल और कांग्रेस लगातार पंजाब की भगवंत मान के अगुवाई वाली आम आदमी पार्टी सरकार को घेरती नजर आ रही.
हालांकि, सुखबीर बादल ने पीएम के साथ हुए बैठक का आधिकारिक एजेंडा सार्वजनिक नहीं किया गया है, लेकिन इसे पंजाब की राजनीति के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है. इसे बीजेपी और अकाली दल के साथ दोबारा दोस्ती के कयास लगाए जाने लगे हैं.
2027 के चुनावों से पहले पंजाब में सियासी हलचल
पंजाब की सियासत में लंबे समय तक बीजेपी और अकाली दल मिलकर चुनाव लड़ते रहे हैं. इसका सियासी फायदा दोनों ही दलों को मिलता रहा. किसानों के मुद्दे पर 2020 में दोनों की 25 साल पुरानी दोस्ती टूट गई, जिसके बाद अकाली दल और बीजेपी दोनों अकेले-अकेले चुनाव लड़कर अपनी-अपनी सियासी हैसियत का अंदाजा 2022 के विधानसभा और 2024 के लोकसभा चुनाव में लगा चुकी हैं.
2027 के विधानसभा चुनाव की सियासी सरगर्मी के बीच सुखबीर बादल की पीएम मोदी से मुलाकात को बीजेपी-अकाली के गठबंधन से जोड़कर देखा जा रहा है. पंजाब में पांच महीने के बाद विधानसभा चुनाव होने हैं, जिसके लेकर सियासी हलचल तेज है. पंजाब में आम आदमी पार्टी की सरकार और विपक्षी दलों के बीच चल रही रस्साकशी के बीच अकाली दल और बीजेपी के रिश्तों को लेकर नए समीकरण तलाशे जा रहे हैं.
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बीजेपी का रुख अब तक यह रहा है कि वह पंजाब में अकेले अपने दम पर विधानसभा चुनाव लड़ने की तैयारी कर रही है और पार्टी लगातार संगठन को मजबूत करने में जुटी है, वहीं, दूसरी तरफ सुखबीर बादल और पीएम मोदी की इस मुलाकात ने इस बात के संकेत दे दिए हैं कि राजनीति में संभावनाओं के दरवाजे हमेशा खुले रहते हैं, जिसके चलते ही दोनों के हाथ मिलाने की चर्चा तेज है.
अकाली-बीजेपी की 25 साल पुरानी दोस्ती कैसे टूटी
2020 में केंद्र सरकार द्वारा लाए गए तीन कृषि कानूनों के विरोध में किसान संगठन सड़क पर उतर गए थे. पंजाब में बढ़ते किसान आंदोलन के चलते शिरोमणि अकाली दल ने एनडीए का साथ छोड़ दिया था. अकाली दल के लिए ग्रामीण और किसान वोटबैंक सबसे अहम रहा है, जिसके चलते ही बीजेपी के साथ 25 साल पुरानी दोस्ती खत्म करने का राजनीतिक कदम उठाना पड़ा था.
हालांकि, बाद में मोदी सरकार ने उन कृषि कानूनों को वापस ले लिया था, लेकिन दोनों दलों के बीच की दूरियां पूरी तरह खत्म नहीं हो पाई थीं. पिछले कुछ चुनाव 2022 का विधानसभा चुनाव और 2024 का लोकसभा चुनाव में दोनों ने अलग-अलग ही किस्मत आजमाई थी, जिसका नुकसान दोनों दलों को राजनीतिक रूप से उठाना पड़ा था. अब 2027 की बढती सियासी हलचल के साथ दोनों के बीच रिश्ते फिर से सुधरते नजर आ रहे हैं. ऐसे में पीएम मोदी से सुखबीर बादल की मुलाकात को अब गठबंधन से जोड़कर देखा जा रहा है.
क्या अकाली दल और बीजेपी फिर मिलाएंगे हाथ
पंजाब में सियासत में अकाली दल अपने खिसके हुए पारंपरिक जनाधार को वापस पाने के लिए संघर्ष कर रहा है. बीजेपी से अलग होने के बाद से अकाली दल के तमाम बड़े नेता सुखबीर बादल का साथ छोड़कर चले गए हैं. ऐसे में पंजाब में अकाली दल अपने दम पर आम आदमी पार्टी का सियासी विकल्प नहीं बन पा रही है.
वहीं, बीजेपी भी राज्य में अपने पैर जमाने के लिए मजबूत क्षेत्रीय साथियों की तलाश में है. बीजेपी ने दूसरे दलों के तमाम बड़े नेताओं को अपने साथ जोड़ने के बाद भी इस मुकाम पर नहीं पहुंच पाई, जहां पर वो अकेले दम पंजाब में चुनाव लड़कर सत्ता में आ सके.
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राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पंजाब में आप (और कांग्रेस के मजबूत विकल्प के सामने यदि हिंदू-सिख वोटों के पुराने समीकरण, जो कभी अकाली दल, भाजपा गठबंधन की ताकत हुआ करते थे, उसे को दोबारा जिंदा करना है, तो दोनों दलों को जमीनी स्तर पर एक-दूसरे की जरूरत पड़ेगी.
हालांकि, बीजेपी और अकाली दल दोनों ही दलों की तरफ से गठबंधन को लेकर कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है, लेकिन सुखबीर बादल का लगातार यही कहना रहा है कि अभी पार्टी को मजबूत करना उनकी पहली प्राथमिकता है. दिल्ली के पावर गलियारों में हुई यह मुलाकात इस बात का संकेत जरूर है कि 'मिशन 2027' आते-आते पंजाब की राजनीति में कई बड़े उलटफेर देखने को मिल सकते हैं.
समझें अकाली और बीजेपी की सियासी मजबूरी
बता दें कि बीजेपी पंजाब की सियासत में शिरोमणि अकाली दल के सहारे करीब ढाई दशक से अपनी राजनीति करती रही है. पंजाब की कुल 117 विधानसभा सीटों में से बीजेपी महज 23 सीटों पर चुनाव लड़ती रही है. 2017में बीजेपी ने अकाली दल के साथ गठबंधन में चुनाव लड़ी थी और सिर्फ तीन सीट ही जीत पाई थी. किसान आंदोलन के चलते बीजेपी और अकाली दल की दोस्ती टूटी और पंजाब के 2022 विधानसभा चुनाव में सफाया हो गया.
पंजाब की सियासत में शिरोमणि अकाली दल और बीजेपी ढाई दशक से साथ चुनाव लड़ती रही है और दोनों के बीच बेहतर तालमेल रहे हैं. पंजाब के शहरी सीट पर बीजेपी के चलते अकाली दल को वोट मिलते रहे हैं तो ग्रामीण क्षेत्र में बीजेपी को अकाली के दम पर. इतना ही नहीं हिंदू वोटर भी अकाली को बीजेपी के वजह वोट करता रहा है.
पंजाब में हिंदू मतदाता जिस पार्टी के साथ जाते हैं तो सरकार उसी पार्टी की बनती है. आंकड़ों के हिसाब से राज्य में 38.49 फीसद हिंदू और 31.94 फीसदी अनुसूचित जाति ( इनमें हिंदू और सिख दोनों ही हैं) शामिल हैं. अकाली दल भी हिंदू वोटों को साधने में जुटी है, लेकिन बीजेपी के साथ न होने के चलते बहुत ज्यादा असर नहीं दिखा पा रही है. बीजेपी पंजाब में शुरू से ही हिंदुओं पर निर्भर रही है. बीजेपी अपनी नजर अभी तक 45 सीटों पर लगा रखी है, जहां पर 60 फीसद से अधिक हिंदू आबादी है.
कुबूल अहमद