बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के भीतर चल रही अंदरूनी खींचतान के बीच पूर्व राज्यसभा सांसद और पार्टी के नेशनल कोऑर्डिनेटर रहे डॉ. अशोक सिद्धार्थ ने राजनीति से संन्यास ले लिया है. अशोक सिद्धार्थ मायावती के भतीजे आकाश आनंद के ससुर भी हैं.
बसपा प्रमुख मायावती की रखी गई एक शर्त के तुरंत बाद अशोक सिद्धार्थ ने ये ऐलान किया है. उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक लंबा पत्र शेयर किया है. वहीं, मायावती ने उनके सन्यास को 'सही कदम' करार दिया.
अपने पत्र में उन्होंने बताया उनके लिए 'आदरणीय बहनजी' का आदेश और बहुजन मिशन दुनिया के किसी भी रिश्ते, पद या परिवार से कहीं ज्यादा बढ़कर है.
अशोक सिद्धार्थ ने अपने खत में लिखा कि वो पिछले 35 सालों से बहुजन समाज पार्टी, कांशीराम और बाबा साहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर के विचारों और मिशन के लिए पूरी ईमानदारी से समर्पित रहे हैं.
'आप मेरी राजनीतिक गुरु हैं'
मायावती के लिए उन्होंने लिखा, 'आप मेरी राजनीतिक गुरु हैं, मेरी बड़ी बहन हैं. आपने मुझ जैसे अदने से व्यक्ति को क्या कुछ नहीं दिया. आपकी वजह से ही मैं विधान परिषद और राज्यसभा का सदस्य रहा. आपने मुझे अपने परिवार का सदस्य बनाया, ये आपका ऐसा कर्ज है जिसे मैं इस जन्म में नहीं चुका सकता.'
उन्होंने आगे लिखा कि अगर बहनजी को लगता है कि उनके राजनीति में रहने से संतों, गुरुओं और महापुरुषों के बहुजन मिशन को कोई नुकसान पहुंच रहा है, तो वो इसी पल राजनीतिक और सामाजिक जीवन से संन्यास ले रहे हैं. उन्होंने कहा, 'राजनीति छोड़ना तो बहुत छोटी चीज है. अगर आपके लिए कभी मुझे अपनी जान भी देनी पड़े, तो वो भी मेरे लिए फक्र की बात होगी.'
'आकाश आनंद आपके भतीजे हैं, मैं उन्हें कैसे गुमराह कर सकता हूं?'
अशोक सिद्धार्थ पर आरोप लग रहे थे कि वो पार्टी पर कब्जा करने की कोशिश कर रहे हैं और आकाश आनंद को गुमराह कर रहे हैं. इन आरोपों का जवाब देते हुए उन्होंने भगवान गौतम बुद्ध और कांशीराम की कसम खाई और कहा कि उन्होंने कभी पार्टी के हित के खिलाफ कोई काम नहीं किया.
उन्होंने लिखा कि उनके संन्यास लेने के फैसले को आकाश आनंद की पार्टी में वापसी से जोड़कर न देखा जाए. मायावती को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा, 'आकाश आनंद मेरे दामाद होने से पहले आपके भतीजे हैं और आनंद भाई के बेटे हैं. उनके अंदर आपका खून है. उन्होंने जिंदगी के दो दशक आपकी छत्रछाया में बिताए हैं. मुझ जैसा मामूली कार्यकर्ता भला उनको क्या गुमराह कर पाएगा?'
अशोक सिद्धार्थ ने कहा कि आकाश आनंद को वापस जिम्मेदारी देना या न देना मायावती का फैसला है. इसे उनके संन्यास से जोड़कर मायावती उनके जैसे मामूली कार्यकर्ता को उसकी हैसियत से ज्यादा अहमियत दे रही हैं.
अशोक सिद्धार्थ ने ये भी बताया कि बीते कई महीनों में उनकी आकाश आनंद से मुलाकात सिर्फ एक-दो मौकों पर ही हुई थी, वो भी तब जब वो पार्टी की दी गई राज्यों की जिम्मेदारियों के सिलसिले में मिले थे.
विरोधी रच रहे साजिश, पार्टी के साथी ही लगा रहे आरोप
अशोक सिद्धार्थ ने अपने पत्र में पार्टी के ही कुछ नेताओं पर निशाना साधा. उन्होंने कहा कि बसपा में उन्हें मिले सम्मान, राज्यसभा और एमएलसी के पदों के कारण कुछ पार्टी साथी उनसे ईर्ष्या करते हैं. वही लोग उनके खिलाफ ये साजिश रच रहे हैं कि वो पार्टी पर कब्जा करना चाहते हैं.
उन्होंने उम्मीद जताई कि ये उनके राजनीतिक विरोधियों की एक सोची-समझी साजिश है, जिसकी सच्चाई एक न एक दिन मायावती के सामने जरूर आ जाएगी.
मायावती ने दी प्रतिक्रिया
वहीं, अशोक सिद्धार्थ के सन्यास को मायावती ने सही फैसला बताया है. उन्होंने एक्स पर लंबा पोस्ट करते हुए कहा, 'आज अशोक सिद्धार्थ के राजनीति से संन्यास का ऐलान बहुत देर से उठाया गया लेकिन सही कदम है. वैसे लोगों का यही कहना है कि अगर ये फैसला वो काफी पहले ही ले लेते तो BSP, बहुजन समाज, बहुजन मूवमेन्ट और उनके दामाद आकाश आनन्द को भी लगातार विपरीत परिस्थितियों का सामना नहीं करना पड़ता.'
मायावती ने आखिर क्या रखी थी शर्त?
दरअसल बसपा प्रमुख मायावती ने सोशल मीडिया पर चार बिंदुओं का एक कड़ा बयान जारी किया था. मायावती ने अपने बयान में कहा था कि अशोक सिद्धार्थ ने पार्टी के मिशन से ज्यादा अपनी निजी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं को प्राथमिकता दी. मायावती के मुताबिक, अशोक सिद्धार्थ की इसी कार्यशैली का नुकसान खुद उन्हें और आकाश आनंद दोनों को उठाना पड़ा.
मायावती ने दो टूक शब्दों में शर्त रखी थी कि अगर अशोक सिद्धार्थ राजनीति से पूरी तरह किनारा कर लेते हैं और संन्यास ले लेते हैं, तभी आकाश आनंद के लिए खुलकर काम करना मुमकिन हो पाएगा. इसके बाद ही पार्टी आकाश आनंद को दोबारा बड़ी जिम्मेदारियां सौंपने पर विचार करेगी.
अब आगे क्या? आकाश आनंद की वापसी पर टिकीं नजरें
अशोक सिद्धार्थ के राजनीति से संन्यास के ऐलान के बाद उत्तर प्रदेश के सियासी गलियारों में हलचल तेज हो गई है. बसपा के कार्यकर्ताओं और राजनीतिक विश्लेषकों की नजरें अब पूरी तरह से पार्टी प्रमुख मायावती पर टिकी हुई हैं.
आशीष श्रीवास्तव / समर्थ श्रीवास्तव