World Suicide Prevention Day: एग्जाम, जॉब, पर्सनल लाइफ तक...जब सब रास्ते बंद लगें, तब कहां से मिलेगी मदद?

छात्रों, किसानों, प्रोफेशनल्स, माता-पिता, युवाओं और बच्चों में आत्महत्या के मामले समाज के लिए गंभीर चिंता बनते जा रहे हैं. व‍िशेषज्ञ मानते हैं कि आत्महत्या रोकने के लिए सिर्फ काउंसलिंग नहीं, बल्कि चेतावनी संकेतों को पहचानना, सुनना और समय पर साथ देना जरूरी है. आइए जानते हैं कि कैसे हम क‍िसी के मददगार बन सकते हैं.

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मानसी मिश्रा

  • नई दिल्ली ,
  • 10 सितंबर 2026,
  • अपडेटेड 7:16 PM IST

आत्महत्या अब सिर्फ कोई आंकड़ा या अखबार के किसी कोने में छपी खबर नहीं रह गई है. छात्रों से लेकर किसानों, प्रोफेशनल्स, युवाओं और बच्चों तक-यह त्रासदी हर दिन हमारे समाज के किसी न किसी हिस्से को झकझोर रही है. हर एक जान जाने के साथ सिर्फ एक जीवन खत्म नहीं होता, बल्कि एक परिवार, एक क्लासरूम, एक कार्यस्थल और पूरा समाज भीतर तक टूट जाता है.

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10 सितंबर को 'विश्व आत्महत्या रोकथाम दिवस' (World Suicide Prevention Day) के मौके पर इस गंभीर चुनौती पर बात करना बेहद जरूरी है. सवाल सिर्फ यह नहीं है कि लोग इस मोड़ तक क्यों पहुंच रहे हैं, बल्कि सवाल यह भी है कि क्या हम अपने आसपास के लोगों में छपे उस दर्द और संकट के शुरुआती संकेतों को समय रहते पहचान पा रहे हैं?

आंकड़ों के पीछे छुपे दर्द को समझिए

तमाम संस्थानों और परीक्षाओं के संदर्भ में सामने आ रहे आंकड़े मानसिक तनाव और संकट की गहराई को बयां करते हैं. प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले युवाओं के बीच सामने आए मामले बताते हैं कि शैक्षणिक और मानसिक दबाव किस कदर बढ़ रहा है. वहीं, पारिवारिक और वैवाहिक तनाव से जूझ रहे लोग भी इस मानसिक संकट की चपेट में आ रहे हैं. लेकिन इन आंकड़ों को देखते हुए हमें यह समझना होगा कि समस्या कितनी भी गंभीर क्यों न हो, मानसिक संकट कभी भी स्थायी नहीं होता.

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जिंदगी नहीं, दर्द खत्म करना चाहते हैं लोग

डॉ. सत्यकांत त्रिवेदी (मनोचिकित्सक व सदस्य, राष्ट्रीय आत्महत्या रोधी नीति समिति) का कहना है कि आत्महत्या केवल एक व्यक्तिगत या क्षणिक आवेग की परिणति नहीं है, बल्कि यह एक जटिल सामाजिक व मनोवैज्ञानिक संकट है. इसके पीछे गरीबी, अशिक्षा, बेरोजगारी, सामाजिक एकाकीपन और पलायन जैसे बायो साइको सोशल फैक्टर्स जिम्मेदार होते हैं, जो व्यक्ति के मानसिक स्वास्थ्य को गहराई से प्रभावित करते हैं. भारत में आत्महत्या की रोकथाम के लिए एकीकृत 'राष्ट्रीय नीति' के लागू न होने और सामाजिक स्तर पर व्याप्त पूर्वाग्रहों के कारण, समय रहते इस दिशा में जरूरी जागरूकता और समयबद्ध हस्तक्षेप की आज भी भारी कमी है.

नशा रोग व‍िशेषज्ञ मनोचिकित्सक डॉ अन‍िल शेखावत का कहना है कि आत्महत्या से होने वाली मौतों का एक बड़ा और अमूमन अनदेखा कारण नशा और मादक पदार्थों की लत है. नशे की लत केवल शारीरिक नुकसान तक सीमित नहीं रहती, बल्कि यह मस्तिष्क में न्यूरोकेमिकल असंतुलन पैदा कर व्यक्ति के सोचने-समझने की क्षमता को गंभीर रूप से प्रभावित करती हैजिससे ड‍िप्रेशन और आत्महत्या के आवेग का खतरा कई गुना बढ़ जाता है. यद्यपि सरकारें समय-समय पर नशा-विरोधी अभियान चलाती हैं, लेकिन जब तक इसे एक गंभीर मानसिक बीमारी मानकर क्लीन‍िकल और सामुदायिक पुनर्वास से नहीं जोड़ा जाएगा, तब तक इस संकट पर प्रभावी अंकुश लगाना मुश्किल है.

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मानस‍िक समस्याओं के कठिन दौर से गुजर रहा व्यक्ति अक्सर अपनी जिंदगी खत्म नहीं करना चाहता, बल्कि उस असहनीय मानसिक दर्द और घबराहट से बाहर निकलना चाहता है. यदि उस नाजुक घड़ी में व्यक्ति को थोड़ा सा साथ, सुरक्षा और सही पेशेवर मदद मिल जाए तो स्थिति को पूरी तरह बदला जा सकता है. इसलिए जब भी कोई व्यक्ति अत्यधिक हताशा की बात करे या खुद को नुकसान पहुंचाने का संकेत दे, तो उसे कभी नजरअंदाज न करें. यह सोचना कि व्यक्ति सिर्फ ध्यान खींचने के लिए ऐसा कह रहा है, बेहद नुकसानदेह हो सकता है.

व्यवहार में छिपे इन संकेतों को पहचानें

बातचीत में निराशा: 'मेरी किसी को परवाह नहीं है', 'मैं सब पर बोझ हूं' या 'अब जीने का कोई मतलब नहीं है' जैसी बातें कहना. अचानक अलगाव: दोस्तों और परिवार से दूरी बना लेना, कमरे में खुद को बंद रखना और पसंदीदा गतिविधियों में रुचि खत्म हो जाना. व्यवहार में बड़ा बदलाव: अत्यधिक उदासी, चिड़चिड़ापन, घबराहट, गुस्सा या अचानक अपनी प्रिय चीजें दूसरों को देना. यदि किसी अपने में ऐसे बदलाव दिखें, तो बिना किसी आलोचना या तंज के उसकी बात शांति से सुनें. कई बार आपका यह कहना कि-'मैं तुम्हारे साथ हूं, तुम मुझसे अपनी बात शेयर कर सकते हो'-किसी डूबते को तिनके का सहारा दे सकता है.

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नंबर और सफलता से कहीं ज्यादा कीमती है जिंदगी

बच्चों और युवाओं के जेहन में यह बात बिठाना बेहद जरूरी है कि उनकी अहमियत केवल परीक्षा के अंकों, डिग्री, नौकरी या सैलरी पैकेज से तय नहीं होती. किसी परीक्षा में असफल होना या करियर में रुकावट आना जिंदगी का अंत नहीं है. आज जब समाज हर व्यक्ति को उसकी सफलता से आंकने लगा है, तब परिवार, स्कूल और दोस्तों की जिम्मेदारी है कि वे युवाओं को यह महसूस कराएं कि उनकी मौजूदगी और उनकी जिंदगी किसी भी मार्कशीट से हजार गुना ज्यादा कीमती है.

रोकथान में हम सबकी भूमिका

आत्महत्या रोकना सिर्फ मनोवैज्ञानिकों या डॉक्टरों की जिम्मेदारी नहीं है. एक साधारण फोन कॉल भी किसी की जिंदगी बदल सकता है. अपने उन दोस्तों या सहयोगियों का हाल-चाल जरूर पूछें जो अचानक चुप हो गए हैं. किसी को यह अहसास कराना कि कोई उसकी चिंता करता है, उस अंधेरे वक्त में रोशनी की किरण बन सकता है. समय पर दिया गया साथ, थोड़ी सी संवेदनशीलता और सही हेल्पलाइन की मदद से किसी की अनमोल जिंदगी बचाई जा सकती है.

मदद उपलब्ध है...
 

यदि आप या आपका कोई परिचित किसी भी तरह के मानसिक तनाव, अवसाद या संकट से गुजर रहा है, तो कृपया अकेले न रहें. पेशेवर मदद लें और इन हेल्पलाइन नंबरों पर संपर्क करें.

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Tele-MANAS (भारत सरकार): 14416 या 1800 891 4416 (24x7 टोल-फ्री)
KIRAN (मानसिक स्वास्थ्य हेल्पलाइन): 1800-599-0019

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