IAS बनने आई बहू, सास पाल रही 4 साल का बच्चा... पढ़ें दिल्ली की मह‍िला UPSC अभ्यर्थ‍ियों की कहानी

IAS बनने का सपना और कंधे पर घर-परिवार की भारी जिम्मेदारियां! दिल्ली में सिविल सर्विसेज की तैयारी कर रहीं महिला अभ्यर्थियों की कहानी हर किसी को भावुक कर देने वाली है. अपने चार साल के मासूम बच्चे को पीछे छोड़ आई मां से लेकर बीमार माता-पिता का सहारा बनने के लिए चार बार असफल होकर भी फिर से खड़ी होने वाली बेटियों का जज्बा... पढ़िए ओल्ड राजेंद्र नगर में रात भर जलती उम्मीद की रोशनी की अनकही दास्तान.

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दिल्ली की UPSC तैयारी कर रही महिलाओं की प्रेरणादायक कहानी (Representational Image) दिल्ली की UPSC तैयारी कर रही महिलाओं की प्रेरणादायक कहानी (Representational Image)

आजतक एजुकेशन डेस्क

  • नई दिल्ली ,
  • 01 अक्टूबर 2026,
  • अपडेटेड 3:45 PM IST

कंधे पर भारी बैग, आंखों में नीली बत्ती वाली गाड़ी का सपना और दिल में अपनों से दूर होने की टीस... सिविल सर्विसेज हब कहे जाने वाले दिल्ली के ओल्ड राजेंद्र नगर की तंग गलियों में यह सिर्फ एक शहर की नहीं, बल्कि संघर्ष की वो अनकही दास्तान है जो रोज रात किताबों के पन्नों के साथ लिखी जाती है.

तंग कमरे, मेज पर सजा किताबों का पहाड़, सीमित बजट और सुबह के अखबार से लेकर देर रात तक चलती पढ़ाई. यहां आने वाली हर लड़की की कहानी में सिर्फ किताबें नहीं, बल्कि घर की अनगिनत जिम्मेदारियों का बोझ भी शामिल है. यहां एक अभ्यर्थी ऐसी भी है जो मां है. अपने महज चार साल के मासूम बेटे को पति और सास-ससुर के पास छोड़कर वह दिल्ली में UPSC की तैयारी कर रही है.

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लगता है सब छोड़कर वापस लौट जाऊं 

उत्तर प्रदेश के छोटे से गांव से आई दीप‍िका (बदला हुआ नाम) ओल्ड राजेंद्र नगर के नामी कोच‍िंंग संस्थान में पढ़ती हैं. जब वो कॉलेज की पढ़ाई कर रही थीं तभी उनकी शादी कर दी गई. दीप‍िका का एक ही सपना था कि वो यूपीएससी पास करके आईएएस अफसर बनें. लेकिन जैसा अक्सर लड़कियों के साथ होता है, शादी और फ‍िर बच्चे की जिम्मेदारी. वही दीप‍िका के साथ हुआ. शादी के कुछ ही साल में वो मां बन गईं और दीप‍िका का सपना जैसे कहीं खो सा गया. लेकिन फिर ससुराल वालों से बात की और अपनी ख्वाहिश के बारे में बताया. 

ये बड़ा फैसला था लेकिन ससुराल वाले आख‍िर में राजी हो गए. उनके पति जिनका छोटा सा ब‍िजनेस है, किसी तरह पैसे जोड़कर पत्नी को दिल्ली भेजा. वो चार साल का बेटा घर में उसके दादा दादी के हवाले करके द‍िल्ली आ गईंं.जहां अपनी तरह का अलग ही संघर्ष शुरू हो गया. कोच‍िंग और उसके बाद 10 घंटे की पढ़ाई.  

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दीप‍िका कहती हैं कि कभी कभी जब आधी रात को पढ़ाई के बीच बेटे की तुतलाती आवाज फोन पर सुनाई देती है, तो मन करता है सब छोड़-छाड़कर घर लौट जाऊं. आंखें नम होती हैं, लेकिन आंसू पोंछकर फिर किताब खोल लेती हूं. जानती हूं कि आज की यह दूरी कल मेरे बच्चे को एक बेहतर भविष्य देगी.

बीमार मां-बाप का सहारा बनने की जिद,  4 बार म‍िली नाकामी!

ओल्ड राजेंद्र नगर की एक अन्य छात्रा अनन्या (बदला हुआ नाम) की कहानी भी कम भावुक नहीं है. घर पर बूढ़े और बीमार माता-पिता को छोड़कर आई इस अभ्यर्थी के मन में हर वक्त एक अनजाना डर बना रहता है. आधी रात को जब फोन की घंटी बजती है, तो दिल दहल जाता है कि कहीं कोई अनहोनी तो नहीं हो गई.

चार बार असफलता का स्वाद चखने के बाद भी उसने हार नहीं मानी. महंगी कोचिंग और दिल्ली के खर्चों का बोझ अपने बीमार पिता पर न पड़े, इसलिए उसने पार्ट-टाइम नौकरी के साथ पढ़ाई जारी रखी है. कई रातें ऐसी भी गुजरती हैं जब थकावट और पढ़ाई के दबाव में वह बिना खाए ही सो जाती है.

मुखर्जी नगर से ओल्ड राजेंद्र नगर तक... हर खिड़की के पीछे एक कहानी

दिल्ली के इन कोचिंग इलाकों में रात के सन्नाटे में भी पढ़ाई की रोशनी जलती रहती है. किसी के लिए यह अफसर बनने का सपना है, तो किसी के लिए अपने परिवार को गरीबी और लाचारी से बाहर निकालने का इकलौता रास्ता. असफलताएं टूटती हैं, लेकिन उम्मीदें उन्हें फिर खड़ा कर देती हैं. यह कहान‍ियां साबित करती है कि दिल्ली सिर्फ एक शहर नहीं, बल्कि उन लाखों बेटियों के सपनों की प्रयोगशाला है जो हर रोज अपनी तकदीर खुद लिखने का जज्बा रखती हैं.

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रिपोर्ट: श्वेता झा

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