देशभर में नीट-यूजी विवाद और जंतर-मंतर पर युवाओं का भारी आंदोलन धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद खत्म हो चुका है. अब प्रह्लाद जोशी नए शिक्षा मंत्री का कार्यभार संभाल चुके हैं. लेकिन हकीकत ये है कि शिक्षा मंत्रालय की कुर्सी इस वक्त किसी कांटों के ताज से कम नहीं है.
अब तक केंद्र और राज्य स्तर पर कई प्रशासनिक फेरबदल सभी ने देखे हैं, लेकिन देश के 25 लाख से अधिक अभ्यर्थियों और अभिभावकों का डगमगाया हुआ भरोसा बहाल करना शायद इस मंत्रालय के इतिहास की सबसे बड़ी चुनौती है. आइए समझते हैं कि नए शिक्षा मंत्री प्रह्लाद जोशी की मेज पर इस वक्त कौन सी 5 सबसे बड़ी चुनौतियां पहली प्राथमिकता के तौर पर रखी हैं.
1. NTA का पुनर्गठन और लीक-प्रूफ ऑनलाइन मोड (CBT) लागू करना
पेपर लीक के कारण नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (NTA) की साख पर पिछले कुछ समय में गंभीर सवाल खड़े हुए हैं. अब नंदन नीलेकणि की अगुवाई में गठित हाई-पावर्ड टास्क फोर्स की सिफारिशों को लागू करना और पेपर-पेन मोड से कंप्यूटर बेस्ड टेस्ट (CBT) की ओर सुरक्षित ट्रांजिशन सुनिश्चित करना शिक्षा मंत्रालय की एक बड़ी चुनौती है. NTA के आंतरिक तंत्र से 'काली भेड़ों' को बाहर निकाल कर एजेंसी को पूरी तरह पारदर्शी बनाना ही पहली और सबसे प्राथमिक परीक्षा है.
2. 'सख्त एंटी-पेपर लीक कानून' और फास्ट ट्रैक कोर्ट का गठन
ऐसा देखा गया है कि केवल अधिकारियों पर गाज गिराने या परीक्षा रद्द करने से माफिया का दुस्साहस कम नहीं हो रहा है. अब केंद्र सरकार द्वारा लाए जा रहे नए एंटी-पेपर लीक कानून के तहत विशेष टास्क फोर्स (STF) और फास्ट-ट्रैक कोर्ट्स (Fast-Track Courts) का त्वरित गठन सुनिश्चित करना भी चुनौती है. दोषी पाए जाने वाले अंतरराज्यीय नकल माफियाओं पर ऐसी नज़ीर पेश करना जिससे भविष्य में कोई देश की युवा पीढ़ी के भविष्य के साथ खिलवाड़ करने की हिम्मत न कर सके.
3. आंदोलनकारी छात्रों पर दर्ज FIR और 5-पॉइंट चार्टर पर रोडमैप
जंतर-मंतर पर 35 से अधिक दिनों तक चले 'कॉकरोच जनता पार्टी' (CJP) और अन्य छात्र संगठनों के विरोध प्रदर्शन के बाद अब स्थिति को सामान्य करना जरूरी है. अब विपक्षी नेताओं और सीनियर वकीलों की सलाह के अनुसार, शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने वाले छात्रों पर दर्ज सभी गैर-वाजिब मुकदमों (FIRs) को वापस लेना का समझौता हुआ है. इसके साथ ही, छात्र संगठनों द्वारा सौंपे गए '5-पॉइंट एजुकेशन रिफॉर्म चार्टर' पर अगले 4 हफ्तों के भीतर ठोस और समयाबद्ध रोडमैप पेश करना भी चैलेंज है.
4. 'एक देश, एक परीक्षा' के मॉडल पर राज्यों का विश्वास बहाल करना
नीट और यूजीसी-नेट में हुई गड़बड़ियों के बाद तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल और पंजाब जैसे कई राज्य अपनी राज्य स्तरीय प्रवेश परीक्षाएं वापस शुरू करने और केंद्रीयकृत परीक्षा का विरोध करने लगे हैं. संघवाद (Cooperative Federalism) के ढांचे को बचाते हुए एक चुनौती ये भी है कि अब सभी राज्य सरकारों को यह विश्वास दिलाना होगा कि राष्ट्रीय स्तर की प्रवेश परीक्षाएं पूरी तरह निष्पक्ष, सुरक्षित और तकनीकी रूप से अभेद्य हैं.
5. NEP 2020 का कार्यान्वयन और ड्रॉपआउट-आत्महत्या का संकट
एक बड़ी समस्या यह है कि परीक्षा के दबाव और कोचिंग कल्चर के चलते कोटा और देश के अलग-अलग हिस्सों से लगातार मानसिक तनाव और छात्रों की आत्महत्या के मामले सामने आ रहे. आज एक चुनौती राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEET/NEP) के तहत सिलेबस और एक्सेसमेंट में ऐसे बदलाव लाना जो 'रटने' और 'कोचिंग पर निर्भरता' को कम करना है. साथ ही, देश के शैक्षणिक संस्थानों में मेंटल हेल्थ सपोर्ट और काउंसलिंग सिस्टम को अनिवार्य बनाना है.
वैसे मंत्रालय में चेहरे बदल जाना कोई बड़ी बात नहीं है, लेकिन नीतियों की नीयत बदलना असली चुनौती है. प्रह्लाद जोशी के पास प्रशासनिक अनुभव है, लेकिन शिक्षा मंत्रालय की कसौटी फाइलों पर नहीं, बल्कि देश के 25 लाख छात्रों के चेहरों पर लौटने वाले भरोसे से तय होगी. अगर अगले 100 दिनों में परीक्षा प्रणाली की सेंधमारी का पक्का इलाज नहीं किया गया, तो यह सिर्फ एक मंत्रालय का नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम का संकट बन जाएगा.
आजतक एजुकेशन डेस्क