MP में RGPV के तीन टुकड़े होंगे तो कौन भरेगा करोड़ों का बिल, 26 साल पुरानी पहचान पर उठे बड़े सवाल

मध्यप्रदेश की 26 साल पुरानी राजीव गांधी प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय यानी RGPV को तीन विश्वविद्यालयों में बांटने और नाम बदलने के प्रस्ताव पर विवाद बढ़ गया है. कर्मचारी और विपक्ष खर्च को लेकर सवाल उठा रहे हैं. दावा है कि तीन विश्वविद्यालय बनने पर हर साल 30 से 40 करोड़ रुपए अतिरिक्त प्रशासनिक खर्च और नए भवनों पर करीब 200 करोड़ रुपए तक खर्च हो सकता है.

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सरकार के फैसले के खिलाफ RGPV स्टाफ का प्रदर्शन. (Photo: Screengrab) सरकार के फैसले के खिलाफ RGPV स्टाफ का प्रदर्शन. (Photo: Screengrab)

रवीश पाल सिंह

  • भोपाल ,
  • 03 सितंबर 2026,
  • अपडेटेड 7:01 PM IST

मध्य प्रदेश में तकनीकी शिक्षा के सबसे बड़े नामों में शामिल राजीव गांधी प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय यानी RGPV अब खुद अपनी पहचान और भविष्य को लेकर सवालों के घेरे में है. 26 साल पुरानी इस यूनिवर्सिटी को तीन हिस्सों में बांटने और इसका नाम बदलने के प्रस्ताव ने सियासी बहस को तेज कर दिया है. एक तरफ कांग्रेस RGPV के नाम से राजीव गांधी का नाम हटाने का विरोध कर रही है. तो दूसरी तरफ अब यूनिवर्सिटी का स्टाफ भी इसे तीन हिस्सों में बांटने के प्रस्ताव के खिलाफ खड़ा हो गया है. गुरुवार को यूनिवर्सिटी के कर्मचारियों ने सरकार के तीन विश्वविद्यालय बनाने के फैसले के खिलाफ प्रदर्शन किया.

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कर्मचारियों का कहना है कि मामला सिर्फ यूनिवर्सिटी के बंटवारे का नहीं है. इसके साथ आर्थिक सवाल भी जुड़े हुए हैं. उनका कहना है कि RGPV सेल्फ फाइनेंस्ड यूनिवर्सिटी है और इसी व्यवस्था से कर्मचारियों की सैलरी समेत दूसरे खर्च पूरे होते हैं. ऐसे में अगर यूनिवर्सिटी के तीन हिस्से कर दिए जाते हैं, तो आर्थिक व्यवस्था पर इसका असर पड़ सकता है. RGPV के तीन हिस्से करने के प्रस्ताव के बीच सबसे बड़ा सवाल अब खर्च का है. एक विश्वविद्यालय में कुलपति, कुलसचिव, परीक्षा नियंत्रक से लेकर प्रशासनिक और गैर-शैक्षणिक कर्मचारियों का पूरा ढांचा होता है.

तीन यूनिवर्सिटी बनेंगी तो तीन प्रशासनिक ढांचे भी होंगे

ऐसे में अगर एक विश्वविद्यालय को तीन अलग-अलग विश्वविद्यालयों में बांटा जाता है, तो क्या तीनों के लिए अलग-अलग प्रशासनिक ढांचे की जरूरत नहीं होगी. सवाल यह भी है कि इन पदों के साथ कार्यालय और दूसरी प्रशासनिक सुविधाओं का खर्च कितना बढ़ेगा. दावा है कि तीन अलग-अलग विश्वविद्यालय बनने के बाद हर साल करीब 30 से 40 करोड़ रुपए का अतिरिक्त प्रशासनिक खर्च बढ़ सकता है. यानी मामला सिर्फ नाम बदलने या विश्वविद्यालय के पुनर्गठन तक सीमित नहीं है. हर साल होने वाले अतिरिक्त खर्च का सवाल भी इसके साथ जुड़ा हुआ है.

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यही वजह है कि अब यह सवाल उठ रहा है कि अगर RGPV के तीन हिस्से किए जाते हैं, तो इन तीनों विश्वविद्यालयों का प्रशासनिक खर्च कैसे चलेगा. तीन विश्वविद्यालय बनने का मतलब केवल प्रशासनिक पदों का बंटवारा नहीं होगा. इसके लिए नए कार्यालय, भवन और दूसरी जरूरी सुविधाओं की जरूरत भी पड़ सकती है. अनुमान के मुताबिक नए भवन और इंफ्रास्ट्रक्चर पर करीब 200 करोड़ रुपए तक खर्च हो सकता है. ऐसे में एक तरफ हर साल बढ़ने वाले प्रशासनिक खर्च का सवाल है, तो दूसरी तरफ शुरुआत में नए ढांचे को तैयार करने के लिए बड़ी रकम की जरूरत का मुद्दा भी सामने है.

नए भवन और इंफ्रास्ट्रक्चर पर भी करोड़ों का सवाल

यानी अगर तीन विश्वविद्यालय बनाए जाते हैं, तो सरकार को सिर्फ उन्हें बनाने का फैसला ही नहीं करना होगा, बल्कि उनके संचालन के लिए लगातार होने वाले खर्च की व्यवस्था भी करनी होगी. इसी को लेकर यूनिवर्सिटी के कर्मचारी सवाल उठा रहे हैं कि आखिर इस अतिरिक्त खर्च की भरपाई कहां से होगी. गुरुवार को प्रदर्शन कर रहे RGPV के कर्मचारियों ने कहा कि यूनिवर्सिटी सेल्फ फाइनेंस्ड है. इसी आय से सैलरी से लेकर दूसरे खर्च पूरे किए जाते हैं.

कर्मचारियों का कहना है कि अगर सरकार यूनिवर्सिटी को तीन हिस्सों में बांटने का फैसला करती है, तो उसे यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि नए विश्वविद्यालयों के पास अपनी आय का पर्याप्त स्रोत हो. उनका कहना है कि केवल तीन विश्वविद्यालय बना देना पर्याप्त नहीं होगा. उनके प्रशासन, कर्मचारियों की सैलरी और दूसरे खर्चों के लिए आर्थिक व्यवस्था भी जरूरी होगी. कर्मचारियों ने आशंका जताई कि अगर आय का स्रोत स्पष्ट नहीं हुआ और तीन अलग-अलग विश्वविद्यालयों का खर्च बढ़ गया, तो आर्थिक समस्याएं सामने आ सकती हैं.

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कर्मचारियों ने कहा, आय का स्रोत भी तय करे सरकार

यानी कर्मचारियों का सवाल सीधा है कि अगर एक यूनिवर्सिटी की मौजूदा व्यवस्था को तीन हिस्सों में बांटा जा रहा है, तो तीनों की आर्थिक जरूरतें कैसे पूरी होंगी. RGPV के तीन हिस्से करने के प्रस्ताव को लेकर विपक्ष भी सरकार पर सवाल उठा रहा है. कांग्रेस की छात्र विंग NSUI के रवि परमार का कहना है कि सरकार पहले से ही कर्ज में डूबी हुई है. ऐसे में तीन विश्वविद्यालय बनाने का अतिरिक्त खर्च कैसे निकाला जाएगा.

विपक्ष का सवाल है कि जब तीन विश्वविद्यालयों के लिए अलग-अलग प्रशासनिक व्यवस्था, कार्यालय और दूसरी सुविधाओं की जरूरत होगी, तो इसका आर्थिक बोझ कहां से आएगा. यह सवाल इसलिए भी अहम है क्योंकि प्रस्ताव के साथ हर साल 30 से 40 करोड़ रुपए तक के अतिरिक्त प्रशासनिक खर्च और नए भवनों व इंफ्रास्ट्रक्चर पर करीब 200 करोड़ रुपए तक खर्च का अनुमान सामने आ रहा है.

यानी RGPV के पुनर्गठन की योजना के साथ अब शिक्षा के साथ-साथ आर्थिक प्रबंधन का सवाल भी जुड़ गया है. RGPV के तीन हिस्सों में बंटवारे के साथ यूनिवर्सिटी के नाम को लेकर भी विवाद है. कांग्रेस राजीव गांधी का नाम हटाए जाने का विरोध कर रही है. इस तरह एक ही प्रस्ताव के दो अलग-अलग पहलू सामने आ रहे हैं. पहला यूनिवर्सिटी का पुनर्गठन और दूसरा उसका नाम बदलने का मुद्दा.

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नाम बदलने को लेकर भी सियासी विवाद

कांग्रेस जहां नाम को लेकर विरोध कर रही है, वहीं यूनिवर्सिटी का स्टाफ मुख्य रूप से तीन हिस्सों में बांटे जाने और उससे पैदा होने वाली आर्थिक समस्याओं को लेकर अपनी चिंता जाहिर कर रहा है. इस वजह से RGPV को तीन विश्वविद्यालयों में बांटने का प्रस्ताव अब सिर्फ प्रशासनिक फैसला नहीं रह गया है. इसके साथ राजनीतिक और आर्थिक दोनों सवाल जुड़ गए हैं.

RGPV के तीन हिस्से करने के प्रस्ताव को लेकर सबसे बड़ा सवाल यही है कि इससे तकनीकी शिक्षा की व्यवस्था कितनी मजबूत होगी. क्या तीन विश्वविद्यालय बनने से छात्रों को बेहतर तकनीकी शिक्षा और बेहतर सुविधाएं मिलेंगी. या फिर एक मौजूदा व्यवस्था के तीन हिस्से होने से प्रशासनिक ढांचा बड़ा हो जाएगा और उसके साथ खर्च भी बढ़ जाएगा. एक तरफ सरकार के स्तर पर विश्वविद्यालय के पुनर्गठन का प्रस्ताव है. दूसरी तरफ कर्मचारी आर्थिक व्यवस्था को लेकर सवाल उठा रहे हैं. विपक्ष अतिरिक्त खर्च को लेकर सरकार को घेर रहा है. वहीं नाम बदलने को लेकर भी राजनीतिक विरोध सामने आ रहा है.

ऐसे में 26 साल से मध्यप्रदेश के इंजीनियरिंग और तकनीकी शिक्षा के छात्रों की पहचान रहे RGPV का भविष्य अब बड़े सवालों के बीच है. RGPV के तीन हिस्से करने के प्रस्ताव के साथ आखिरकार सवाल पैसे पर आकर टिकता है. अगर तीन विश्वविद्यालय बनते हैं, तो तीन अलग-अलग प्रशासनिक ढांचे की जरूरत होगी. कुलपति, कुलसचिव, परीक्षा नियंत्रक और दूसरे प्रशासनिक व गैर-शैक्षणिक अमले की व्यवस्था करनी होगी. इसके अलावा नए कार्यालय, भवन और इंफ्रास्ट्रक्चर की जरूरत भी होगी.

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दावे के मुताबिक प्रशासनिक खर्च हर साल 30 से 40 करोड़ रुपए तक बढ़ सकता है, जबकि नए भवन और इंफ्रास्ट्रक्चर पर करीब 200 करोड़ रुपए तक खर्च होने का अनुमान है. ऐसे में सवाल यह है कि इस पूरे खर्च का इंतजाम कौन करेगा. खासकर तब, जब RGPV के कर्मचारी खुद कह रहे हैं कि यूनिवर्सिटी सेल्फ फाइनेंस्ड है और उसकी आय से मौजूदा खर्च पूरे होते हैं.

सबसे बड़ा सवाल, तीन विश्वविद्यालयों का खर्च कौन उठाएगा

क्या सरकार नए विश्वविद्यालयों के लिए अलग से आर्थिक व्यवस्था करेगी. क्या तीनों विश्वविद्यालयों की अपनी आय का स्रोत तय होगा. या फिर इसका आर्थिक बोझ सरकार को उठाना पड़ेगा. इन सवालों का जवाब फिलहाल RGPV के प्रस्तावित पुनर्गठन के साथ सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा बन गया है.

RGPV के तीन हिस्से करने का प्रस्ताव इसलिए अब सिर्फ एक यूनिवर्सिटी को तीन हिस्सों में बांटने की कहानी नहीं है. इसके केंद्र में 26 साल पुरानी पहचान, छात्रों का भविष्य, कर्मचारियों की आर्थिक चिंता, राजनीतिक विरोध और सबसे बढ़कर करोड़ों रुपए के संभावित अतिरिक्त खर्च का सवाल है. यानी असली सवाल यही है कि तीन विश्वविद्यालय बनने से तकनीकी शिक्षा का विस्तार होगा  या सिर्फ प्रशासनिक ढांचा और खर्च बढ़ेगा.

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