मांसाहार गायब, जा‍त‍िगत भेदभाव भी हटाया... 6वीं की किताब में वैद‍िक काल के इतिहास से छेड़छाड़!

महाराष्ट्र की कक्षा 6 की नई इतिहास की किताब में वैदिक काल के खान-पान और वर्ण व्यवस्था के चित्रण को लेकर विवाद छिड़ गया है. नई किताब में मांसाहार को पूरी तरह हटाकर भोजन को शाकाहारी बताया गया है और जाति व्यवस्था के जन्म आधारित बदलाव को भी हटा दिया गया है. इतिहासकारों ने इसे ऐतिहासिक साक्ष्यों के विरुद्ध बताया है और बालभारती की इस संशोधित सामग्री की आलोचना की है.

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Maharashtra Class 6 History Book Row: वैदिक समाज पर क्यों छिड़ा विवाद? जानिए नई और पुरानी किताब का अंतर (AI Generated photo) Maharashtra Class 6 History Book Row: वैदिक समाज पर क्यों छिड़ा विवाद? जानिए नई और पुरानी किताब का अंतर (AI Generated photo)

ओमकार

  • मुंबई ,
  • 21 अगस्त 2026,
  • अपडेटेड 5:01 PM IST

महाराष्ट्र राज्य पाठ्यपुस्तक निर्मिती व अभ्यासक्रम संशोधन मंडल (बालभारती) की ओर से कक्षा 6 के लिए जारी इतिहास की नई किताब में वैदिक काल के चित्रण को लेकर इतिहासकारों और विद्वानों के बीच एक नया विवाद छिड़ गया है. नई किताब में वैदिक काल के लोगों के खान-पान को पूरी तरह 'प्लांट-बेस्ड' (शाकाहारी/वनस्पति आधारित) बताया गया है और मांसाहार का जिक्र तक हटा दिया गया है.

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इसके अलावा, पुरानी किताब में दर्ज उस महत्वपूर्ण अंश को भी हटा दिया गया है, जिसमें बताया गया था कि कैसे वर्ण व्यवस्था आगे चलकर जन्म आधारित जाति व्यवस्था और सामाजिक असमानता में बदल गई. प्राचीन भारत के इतिहासकारों और शोधकर्ताओं ने इन बदलावों की कड़ा आलोचना की है. उनका कहना है कि नया पाठ्यक्रम वैदिक समाज की एक अति-सकारात्मक और सामंजस्यपूर्ण तस्वीर पेश करता है, जो जटिल सामाजिक और सांस्कृतिक ऐतिहासिक साक्ष्यों को दरकिनार करती है.

मांसाहार गायब, भोजन को बताया 'प्लांट-बेस्ड'

कक्षा 6 की पुरानी इतिहास की किताब में स्पष्ट लिखा था कि वैदिक काल के लोग शाकाहारी भोजन के साथ-साथ मांसाहार का भी सेवन करते थे. इसके विपरीत, नए संस्करण में अनाज, दूध, दही, घी, शहद और सब्जियों को उनके भोजन का मुख्य हिस्सा बताया गया है और निष्कर्ष निकाला गया है कि उनका आहार मुख्यतः वनस्पति/पौधों पर आधारित था.

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इतिहासकारों ने प्राचीन भारतीय साहित्य के कई संदर्भों का हवाला देते हुए कहा है कि उस काल में मांस का सेवन सामान्य था:

वैदिक साहित्य के साक्ष्य: संस्कृत विद्वान प्रोफेसर बाहुलकर ने प्राचीन और मध्यकालीन भारत में आहार के इतिहास पर अपने शोध में वैदिक साहित्य में विभिन्न प्रकार के मांस की तैयारी और सेवन के लिखित प्रमाण दर्ज किए हैं. उनके शोध में बैल, बकरा, भेड़, भैंस और घोड़े के मांस के उपयोग के अलावा मछली के सेवन के संदर्भ भी मिलते हैं.

सावित्रीबाई फुले पुणे यूनिवर्सिटी की राय: विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग की प्रमुख प्रोफेसर श्रद्धा कुंभोजकर ने कहा कि वैदिक ग्रंथों में अनुष्ठानों (यज्ञों) और सामान्य जीवन, दोनों में ही विभिन्न प्रकार के मांस के सेवन के स्पष्ट संदर्भ मौजूद हैं.

बालभारती का तर्क: हड़प्पा सभ्यता में किया है मांसाहार का जिक्र

इन बदलावों पर बालभारती की कक्षा 6 से 8 की इतिहास समिति की अध्यक्ष और पुरातत्वविद शुभांगना अत्रे ने स्वीकार किया कि मांसाहार वाकई वैदिक आहार का हिस्सा था. हालांकि, उन्होंने दलील दी कि कृषि के विकास ने वनस्पति आधारित भोजन को लोगों के आहार का मुख्य घटक बना दिया था.

अत्रे के अनुसार, लेखकों ने खान-पान के विस्तृत ब्योरे के बजाय सांस्कृतिक विकास पर ध्यान केंद्रित करने का फैसला किया. उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि हड़प्पा सभ्यता से जुड़े अध्याय में मांसाहार पर चर्चा की गई है.

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जाति और सामाजिक असमानता वाला अध्याय गायब
सबसे बड़ा और गंभीर बदलाव वर्ण व्यवस्था के चित्रण में किया गया है. जहां पुरानी किताब में समझाया गया था कि चार वर्णब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र शुरुआत में आजीविका/व्यवसाय से जुड़े थे, जो धीरे-धीरे जन्म आधारित हो गए. इसी बदलाव ने आगे चलकर जाति व्यवस्था और सामाजिक विषमता को जन्म दिया.

वहीं नए संस्करण से यह पूरा संबंध ही हटा दिया गया है. अब इसमें वैदिक समाज को चार वर्णों में विभाजित बताया गया है, जहां लोगों को विशेष जिम्मेदारियां और सामाजिक स्थान दिए गए थे. साथ ही, समाज के आपसी संबंधों को 'सहयोग और स्नेह' से भरा दर्शाया गया है.

इतिहासकारों की आपत्ति: इतिहास को काल्पनिक रूप न दें

प्रोफेसर श्रद्धा कुंभोजकर ने कहा कि वर्ण से जन्म आधारित जाति में बदलाव और उससे जुड़ी असमानता को हटाकर ऐतिहासिक विमर्श का एक बेहद महत्वपूर्ण हिस्सा गायब कर दिया गया है.

उन्होंने ऋग्वेद के उन संदर्भों का हवाला दिया जिनमें विभिन्न समूहों के बीच संघर्ष का वर्णन है. कुंभोजकर ने तर्क दिया कि वैदिक समाज को पूरी तरह से 'सहयोगी' के रूप में चित्रित करना ऐतिहासिक साक्ष्यों के विपरीत है. मवेशियों के लिए होने वाली लड़ाई और 'दाशराज्ञ युद्ध' (दस राजाओं का युद्ध) के संदर्भ स्पष्ट करते हैं कि वैदिक समाज संघर्षों से अछूता नहीं था.

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बच्चों की उम्र का हवाला देकर किया बचाव

बालभारती की इतिहास समिति की अध्यक्ष शुभांगना अत्रे ने छोटे बच्चों के लिए विषय सामग्री को सरल बनाने के फैसले का बचाव किया. उनका तर्क है कि इतनी कम उम्र में जन्म आधारित जाति की अवधारणा से परिचय कराने से बच्चों की मानसिकता पर असर पड़ सकता है, जब तक कि वे व्यापक ऐतिहासिक संदर्भ को समझने में सक्षम न हों. जैसे-जैसे छात्र ऊंची कक्षाओं में जाएंगे, वे इस जटिल सामाजिक संरचना को पढ़ेंगे.

सुलगते सवाल: क्या इतिहास के साथ हो रहा है समझौता?

प्रोफेसर कुंभोजकर ने जोर देकर कहा कि स्कूल की इतिहास की किताबें छात्रों में अतीत की समझ विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं, इसलिए उनमें से असहज या विरोधाभासी साक्ष्यों को चुन-चुनकर नहीं हटाया जाना चाहिए. उन्होंने कहा कि इतिहास की व्याख्या साक्ष्यों के आधार पर होनी चाहिए, न कि किसी विशेष कालखंड का महिमामंडन करने या उसे नीचा दिखाने के प्रयास में.

आगे और भी किताबों में होंगे बदलाव

कक्षा 6 की यह किताब महाराष्ट्र की स्कूली शिक्षा प्रणाली में एनसीईआरटी (NCERT) पर आधारित संशोधित पाठ्यक्रम लागू करने की एक बड़ी प्रक्रिया का हिस्सा है. इस साल कक्षा 2, 3, 4 और 6 के लिए नई किताबें पेश की गई हैं, जबकि कक्षा 1 की किताब पिछले साल लागू की गई थी. शेष कक्षाओं की संशोधित किताबें अगले तीन वर्षों में चरणबद्ध तरीके से लागू की जाएंगी.

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इस पूरे विवाद पर बालभारती की निदेशक अनुराधा ओक ने कहा कि कक्षा 6 की इतिहास की किताब को लेकर जताई गई सभी चिंताओं और आपत्तियों को पाठ्यपुस्तक निर्माण समिति के समक्ष रखा जाएगा. यदि कोई आवश्यक संशोधन जरूरी समझा गया, तो उसे आगामी संस्करणों में शामिल किया जा सकता है.

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