मध्य प्रदेश में स्कूली बच्चों की यूनिफॉर्म को लेकर जारी लंबे विवाद पर आखिरकार विराम लग गया है. aajtak.in के लगातार असरदार कवरेज के बाद मोहन यादव सरकार ने बड़ा कदम उठाया है.
मंगलवार को मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट बैठक में फैसला लिया गया है कि अब बच्चों को रेडीमेड ड्रेस देने के बजाय सीधे उनके खातों में डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (DBT) के जरिए पैसे भेजे जाएंगे. आइए समझते हैं आजतक की उस पड़ताल की पूरी एबीसीडी, जिसने सरकार को अपना फैसला बदलने पर मजबूर कर दिया.
कैबिनेट का बड़ा फैसला: खातों में आएंगे ₹348 करोड़
कैबिनेट बैठक में राज्य के कक्षा 1 से 8 तक के करीब 58 लाख विद्यार्थियों को दो जोड़ी यूनिफॉर्म खरीदने के लिए सीधे ₹600 की राशि उनके या उनके अभिभावकों के बैंक खातों में भेजने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी गई है. सरकार के अनुसार इस योजना के तहत राज्य के खजाने से कुल ₹348 करोड़ सीधे छात्रों के खातों में ट्रांसफर किए जाएंगे. इससे अब अभिभावक अपनी पसंद का कपड़ा खरीदकर बच्चों के लिए समय पर यूनिफॉर्म सिलवा सकेंगे और सत्र के बीच में घर के कपड़ों में स्कूल जाने की मजबूरी खत्म होगी.
तीन जून के फैसले में क्यों हुआ बदलाव?
दरअसल, इससे पहले 3 जून को हुई कैबिनेट बैठक में सरकार ने सीधे पैसे देने की पुरानी व्यवस्था को बदलकर दो जोड़ी रेडीमेड यूनिफॉर्म खरीदकर बांटने का निर्णय लिया था. तर्क दिया गया था कि ग्रामीण इलाकों में गुणवत्तापूर्ण कपड़ा और सिलाई की सुविधा नहीं मिल पाती. लेकिन सत्र शुरू हो जाने के महीनों बाद भी जब लाखों बच्चे बिना यूनिफॉर्म के स्कूल जाने को मजबूर थे, तब आजतक.इन ने इस पूरे मामले पर ग्राउंड रिपोर्ट और पड़ताल पब्लिश की. आजतक ने उजागर किया कि कैसे नई व्यवस्था के नाम पर यूनिफॉर्म खरीद का टेंडर विवादों में उलझ गया है और बच्चे बिना ड्रेस के भटक रहे हैं.
आजतक की पड़ताल: टेंडर में टर्नओवर का 'गड़बड़झाला'
पड़ताल में सामने आया था कि मध्य प्रदेश पाठ्यपुस्तक निगम द्वारा जारी ₹350 करोड़ के टेंडर में मध्यप्रदेश भंडार क्रय तथा सेवा उपार्जन नियम की अनदेखी की गई थी. राज्य के नियमों के तहत सरकारी खरीदी में स्थानीय MSME, हथकरघा बुनकरों, पावरलूम और महिला स्व-सहायता समूहों को कम से कम 25% या उससे अधिक की प्राथमिकता देना अनिवार्य है, ताकि स्थानीय रोजगार को बढ़ावा मिले.
टेंडर में ड्रेस सप्लाई करने वाली कंपनी के लिए करीब ₹700 करोड़ के टर्नओवर की भारी-भरकम शर्त रख दी गई थी. इस शर्त के कारण राज्य के छोटे स्थानीय निर्माता, बुनकर और स्व-सहायता समूह प्रतियोगिता से सीधे बाहर हो गए. मामला हाई कोर्ट पहुंचा और टेंडर प्रक्रिया पर अंतरिम रोक लग गई. नतीजा यह हुआ कि 50 लाख से ज्यादा बच्चों का इंतजार लंबा होता चला गया.
मुहिम का रंग लाया असर
आजतक ने इस गड़बड़ी और बच्चों की परेशानी को प्रमुखता से उठाए जाने के बाद शासन-प्रशासन हरकत में आया. टेंडर विवाद में बच्चों का भविष्य और पूरा शैक्षणिक सत्र बर्बाद न हो, इसे देखते हुए सरकार ने विवादास्पद टेंडर व्यवस्था को पूरी तरह रद्द करते हुए दोबारा डीबीटी (DBT) के जरिए सीधे पैसे खातों में भेजने का जनहित में बड़ा फैसला सुनाया.
रवीश पाल सिंह