सितंबर आते ही दिल्ली यूनिवर्सिटी (DU) की हवा बदल गई है. कॉलेजों के गेट से बाहर गूंजते नारे, हॉस्टल के गलियारों में 'एक वोट' की मिन्नतें करते छात्र नेता और नुक्कड़ों पर चाय-सुट्टा की दुकानों में छिड़ती गर्मा-गर्मी. एक तरफ दीवारों पर हाथ से लिखे पोस्टरों की भरमार है, तो दूसरी तरफ अचानक कैंपस की सड़कों से गुजरती पोर्श, बेंटले, डिफेंडर और फेरारी जैसी लक्जरी गाड़ियां सबका ध्यान अपनी ओर खींच लेती हैं.
91 कॉलेजों, 16 संकायों और 86 विभागों में फैले 7 लाख से ज्यादा छात्रों के इस विशाल विश्वविद्यालय में DUSU चुनाव सिर्फ चार पदों की जंग नहीं है. इस बार 18 सितंबर को होने जा रहे मतदान में लगभग 2.75 लाख छात्र अपने मताधिकार का इस्तेमाल करेंगे. चुनाव मैदान में 20 प्रत्याशी किस्मत आजमा रहे हैं. यहां अध्यक्ष पद के लिए 7, उपाध्यक्ष के लिए 5, सचिव के लिए 4 और संयुक्त सचिव के लिए 4 उम्मीदवार दांव पर हैं.
लेकिन इस बार का DUSU चुनाव केवल पोस्टर, नारों और बड़ी गाड़ियों के शो-ऑफ तक सीमित नहीं है. 'जेन ज़ी' के नाम से जानी जाने वाली नई पीढ़ी इस तमाशे से परे ठोस जवाबदेही मांग रही है.
JNU का सादगी भरा नैरेटिव बनाम DU का 'शो-ऑफ'
दिल्ली यूनिवर्सिटी में चुनाव प्रचार का जो चकाचौंध भरा और भारी-भरकम अंदाज दिख रहा है, वह जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी (JNU) की छात्र राजनीति से बिल्कुल जुदा है. जेएनयू में बिना गाड़ियों और तामझाम के वैचारिक बहसें होती हैं.
AISA-SFI गठबंधन की संयुक्त प्रत्याशी अनन्या रटौरी इस फर्क को समझाते हुए कहती हैं, 'डीयू के आम छात्रों को बुनियादी सुविधाओं की जरूरत है, न कि लक्जरी गाड़ियों या दिखावे की. एबीवीपी या एनएसयूआई में से कोई भी छात्रों की मूल समस्याओं को हल नहीं कर पाया है. हम एलीटिज्म (अभिजात्य वर्ग) का विरोध करेंगे और हर उस छात्र के साथ खड़े होंगे जो बदलाव चाहता है.'
वहीं, डीयू के कई आम छात्रों का मानना है कि पढ़ाई के तरीकों को बदलने की जरूरत है. नाम न छापने की शर्त पर एक छात्र ने कहा, 'डीयू को एआई (AI) और न्यू-एज लर्निंग के हिसाब से अपडेट होना पड़ेगा. बीएससी के कोर्स अब पुरानी किताबों और लैब तक सीमित नहीं रह सकते. अगर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मुकाबला करना है, तो सिलेबस में एआई का एकीकरण जरूरी है. चुनाव तो आते-जाते रहेंगे, लेकिन राजनीति से परे असली मुद्दों पर बात होनी चाहिए.'
कौन हैं मैदान में और क्यों अहम है यह चुनाव?
हाल ही में दिल्ली के जंतर-मंतर पर परीक्षा धांधली और शिक्षा सुधारों को लेकर चला 36 दिनों का छात्र आंदोलन अब कैंपस के चुनावी घोषणापत्रों का हिस्सा बन चुका है. इस बार ABVP के पैनल में अध्यक्ष पद पर यश डबास, उपाध्यक्ष पद पर ईशू मौर्य, सचिव पद पर रिया छबरी और संयुक्त सचिव पद पर लक्ष्यराज सिंह. रिया छबरी का मुख्य फोकस महिला सुरक्षा और हॉस्टल सुविधाओं पर है. वहीं NSUI के पैनल में अध्यक्ष पद पर विजय शंकर मीणा, उपाध्यक्ष पद पर वीर छत्रथ, सचिव पद पर नम्रता चौधरी और संयुक्त सचिव पद पर गोपाल चौधरी हैं.
निर्दलीय प्रत्याशियों की एंट्री से बिगड़े समीकरण:
आमतौर पर डूसू चुनाव केवल एबीवीपी और एनएसयूआई के बीच का मुकाबला माना जाता था. लेकिन इस बार एनएसयूआई से बगावत करके निर्दलीय चुनाव लड़ रहे उपाध्यक्ष पद के प्रत्याशी दीपांशु शोकीन ने दोनों मुख्य दलों के गणित को बिगाड़ दिया है. उनके साथ-साथ वामपंथी गठबंधन (AISA-SFI) के प्रत्याशी भी तीसरे विकल्प के रूप में उभरे हैं.
कॉलेज के गेट से चाय के ढाबों तक: कैसे मिल रहे वोट?
नॉर्थ कैंपस से लेकर कमला नगर और सत्या निकेतन की गलियों तक, चुनाव प्रचार अब क्लासरूम से निकलकर छात्रों के रोजमर्रा के ठिकानों तक पहुंच गया है. सभी राजनीतिक दलों का सबसे बड़ा टारगेट फर्स्ट ईयर के वे छात्र हैं जो पहली बार डूसू में वोट डालेंगे.
फ्री पिज्जा, समोसे और अटेंडेंस का 'सपना'
चुनावों में छात्रों को रिझाने के लिए पिज्जा, बर्गर, छोले-भटूरे और समोसे बांटने का पुराना दौर जारी है. इतना ही नहीं, वोट के बदले 75% शॉर्ट अटेंडेंस पूरी कराने के वादे भी किए जा रहे हैं. इकोनॉमिक्स सेकंड ईयर की छात्रा आस्था कालरा (19) बताती हैं, 'पिछली बार मुझे किसी प्रत्याशी ने वोट के बदले हफ्ते भर की अटेंडेंस का वादा किया था, जो कभी पूरा नहीं हुआ. इस बार मैं ऐसे किसी झांसे में आकर दो घंटे लाइन में लगकर वोट नहीं देने वाली.'
सुरक्षा का पुराना सवाल और हॉस्टल का नया संकट
6 सितंबर 2026 को सत्या निकेतन में एक 5-मंजिला पीजी (PG) इमारत ढह जाने से 7 लोगों की मौत हो गई थी, जिनमें अधिकांश छात्र थे. इस हादसे ने कैंपस में छात्रों के रहने की सुरक्षा और हॉस्टलों की भीषण किल्लत को सबसे बड़ा चुनावी मुद्दा बना दिया है.
आंकड़ों के मुताबिक, डीयू के 77 में से 57 कॉलेजों में एक भी हॉस्टल नहीं है. हर साल यूनिवर्सिटी में आने वाले 70,000 से ज्यादा नए छात्रों के लिए महज 7,000 के करीब हॉस्टल बेड्स उपलब्ध हैं. दिल्ली में हाल के दिनों में सामने आई आपराधिक घटनाओं और कश्मीरी गेट के पास बस में हुए सनसनीखेज मामले के बाद महिला सुरक्षा का मुद्दा फिर गरमा गया है. छात्रों का कहना है कि पीजी का भारी किराया, घटिया खाना, बस-मेट्रो के महंगे पास और रास्तों पर सुरक्षा की कमी, ये कोई किताबी मुद्दे नहीं, बल्कि उनकी रोजमर्रा की जिंदगी का कड़वा सच हैं.
18 सितंबर को जब डीयू के छात्र EVM का बटन दबाएंगे, तो यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या वे 'डिफेंडर-पोर्श' के शोर और समोसे-पिज्जा के दावतों से प्रभावित होते हैं या फिर हॉस्टल, सुरक्षा और बेहतर शिक्षा जैसे जमीनी सवालों पर वोट देते हैं.
ऋषभ चौहान