एक छात्रा के लिए रोज 5 KM जंगल का सफर, 13 साल से नहीं बदली इस शिक्षक की ड्यूटी

बैंक के अध्यक्ष के नौकरी से हुआ ट्रांसफर ऐसा होगा कि जीवन मिथारी ने सोचा भी नहीं होगा. घने जंगलों से होकर 5 किलोमीटर पैदल की यात्रा कर वह स्कूल में केवल एक छात्रा को पढ़ाने के लिए जाते हैं. छात्रा का नाम स्वरा बोडाके है और वह क्लास 3 में पढ़ती है. अच्छे लाइफस्टाइल के चलते लोगों ने गांव छोड़ दिया जिसके बाद से छात्रों की संख्या भी कम होती गई.      

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रोज 5 किलोमीटर चलते हैं... रोज 5 किलोमीटर चलते हैं...

आजतक एजुकेशन डेस्क

  • नई दिल्ली,
  • 13 सितंबर 2026,
  • अपडेटेड 5:49 PM IST

स्कूल का दिन शुरू होने से पहले, जीवन मिथारी घने जंगल से होते हुए करीब 5 किलोमीटर पैदल का सफर तय करके अपने स्कूल पहुंचते हैं, केवल एक छात्रा के लिए. यह सफर वे पिछले 13 सालों से हर रोज कर रहे हैं. 55 वर्षीय टीचर उस स्कूल में पढ़ाने के लिए जाते हैं, जहां केवल एक छात्रा उनका इंतजार करती है. बारिश, खराब और दुर्गम रास्तों के साथ-साथ जंगलों के बीच से जाना उनके लिए बहुत जोखिम भरा होता है. इसके बावजूद वह अपनी जिम्मेदारियों से कभी पीछे नहीं हटे. मिथारी महाराष्ट्र के कोल्हापुर जिले के गगनबावड़ा तालुका में सिंधुदुर्ग सीमा के पास स्थित दूरदराज गांव कावलटेक धनगरवाड़ा के जिला परिषद स्कूल में पढ़ाते हैं. उन्होंने 26 जुलाई, 2013 को इस स्कूल में काम शुरू किया था और तब से लगातार यहीं पढ़ा रही हैं. 

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एक ऐसा तबादला, जो जिम्मेदारी बन गया

मिथारी का दूरदराज के स्कूल में जाना पहले एक चुनौती ही था. तबादले से पहले वे कोल्हापुर जिला प्राथमिक शिक्षक सहकारी बैंक के अध्यक्ष थे. उन्होंने अपने साथी शिक्षकों की बातें याद करते हुए कहा कि  प्रभावशाली लोगों को आमतौर पर अच्छे संपर्क वाले स्कूलों में पोस्टिंग मिल जाती थी, जबकि दूसरे शिक्षकों को कठिन और दूरदराज के इलाकों में भेजा जाता था. मिथारी ने पीटीआई को बताया कि उन्होंने सिर्फ इतना कहा था कि मैं चला जाऊंगा. इसके बाद उन्होंने तबादले के लिए आवेदन किया और खुद ही इस दूरदराज के स्कूल को चुना. इस बात को 13 साल से ज्यादा समय बीत चुका है और मिथारी आज भी उसी स्कूल में पढ़ा रहे हैं. 

कभी थे 100 परिवार अब केवल एक छात्र 

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बातचीत के दौरान उन्होंने बताया कि एक समय स्कूल में काफी हलचल रहा करती थी. कावलटेक धनगरवाड़ा और पड़ोसी आनंदुर धनगरवाड़ा में लगभग 70 से 100 परिवार रहते थे. हालांकि, साल 2000 के बाद काम और बेहतर जीवन की तलाश में परिवार कोल्हापुर शहर की ओर पलायन करने लगे. जैसे-जैसे गांव खाली होता गया, स्कूल जाने वाले बच्चों की संख्या भी कम होती गई. इस साल तो केवल एक ही छात्रा रह गई. उसका नाम स्वरा बोडाके है और वह क्लास 3 में पढ़ती है. छात्रों की घटती संख्या ने मिथारी की जिम्मेदारी की भावना को नहीं बदला है. उनका मानना ​​है कि छात्रों की संख्या कम होने से शिक्षक के रूप में उनका कर्तव्य कम नहीं होता और उन्हें अपना काम जारी रखना चाहिए. 

रोज 5 किलोमीटर चलते हैं...

स्कूल पहुंचने के लिए मिथारी को रोज करीब 5 किलोमीटर का सफर तय करना पड़ता है. उनका रास्ता घने जंगल से होकर गुजरता है, जहां गौर, तेंदुए और दूसरे जंगली जानवर हमेशा दिखाई देते हैं. रास्ते में मिथारी का कई बार गौरों से सामना हो चुके हैं. गांव के लोगों ने उन्हें बताया है कि अगर गौर अकेला हो या झुंड में हो, तो ऐसी स्थिति में कैसे सावधानी बरतनी चाहिए. 

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मिथारी का कहना है कि इस सफर के साथ उन्हें यह भी ध्यान रखना पड़ता है कि वे वन्यजीवों के इलाके से होकर गुजर रहे हैं. एक बार बस्ती के पास एक तेंदुए ने एक बछड़े को मार दिया था. इसके बाद वन विभाग के अधिकारियों ने वहां ट्रैप कैमरा लगाया, जिसमें तेंदुए की सैकड़ों तस्वीरें कैद हुईं. वन अधिकारियों ने मिथारी को भी सलाह दी थी कि स्कूल जाते और लौटते समय रास्ते में कहीं भी रुकें या बैठें नहीं. 

सबसे पास स्कूल 11 KM दूर है

इस छोटे से गांव में बच्चों के लिए दूसरे स्कूल में जाना आसान नहीं है. धुंडावाडे में सबसे नजदीकी स्कूल करीब 5.5 किलोमीटर दूर है. छोटे बच्चों को वहां जाने के लिए रोज करीब 11 किलोमीटर की यात्रा करनी होगी. मानसून के दौरान यह सफर और भी मुश्किल हो जाता है. यहां के लोग मुख्य रूप से छोटी खेती, जलाऊ लकड़ी इकट्ठा करने और जामुन व करवंद जैसे जंगल से मिलने वाले उत्पादों पर निर्भर हैं. किसान अपनी फसलों को गौरों से बचाने के लिए दोहरी बाड़ लगाते हैं. ऐसी दूरदराज की बस्ती में यह स्कूल बच्चों की पढ़ाई के लिए बहुत अहम है.

कब रिटायर होंगे मिथारी? 

बता दें कि मिथारी मई 2029 में रिटायर होंगे. कई सालों से जंगल में पैदल चलकर स्कूल जाने के बाद उनका कहना है कि यह रोज का सफर अब उनके लिए एक तरह की कसरत भी बन गया है. हालांकि, उनका मानना है कि बच्चों की सुरक्षा के लिए स्कूल के चारों ओर चार दीवारी बनाना जरूरी है. फिलहाल उनकी दिनचर्या में कोई बदलाव नहीं आया है. वे रोज जंगल के रास्ते 5 किलोमीटर पैदल चलकर स्कूल पहुंचते हैं, जहां उनकी कक्षा और पढ़ने के लिए इंतजार करता एक छात्र उनका इंतजार करता है.

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