भाई के एक्सीडेंट ने बदला नजरिया, आलू बेचने वाले लड़के ने 8वीं बार में न‍िकाला NEET, अब बनेगा डॉक्टर

बरेली के नवाबगंज के अल्ताफ की जिद और संघर्ष की कहानी आज सक्सेस स्टोरी बन गई है. भाई के हादसे के बाद डॉक्टर बनने का सपना देखने वाले अल्ताफ 2019 से लगातार NEET दे रहे हैं. फिर कोटा जाकर तैयारी की और आठवें प्रयास में सफलता हासिल कर ली.  आइए जानें उनकी पूरी कहानी...

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अल्ताफ के पिता आज भी हैं आलू व‍िक्रेता, बेटा बनेगा डॉक्टर अल्ताफ के पिता आज भी हैं आलू व‍िक्रेता, बेटा बनेगा डॉक्टर

चेतन गुर्जर

  • कोटा,
  • 27 अगस्त 2026,
  • अपडेटेड 11:34 AM IST

उत्तर प्रदेश के बरेली जिले के नवाबगंज कस्बे के अल्ताफ ने अपनी मेहनत, जिद और लगातार प्रयास से NEET-2026 में सफलता हासिल कर मिसाल पेश की है. उनके घर की आर्थिक स्थिति ऐसी थी कि कोटा जाकर पढ़ाई करना आसान नहीं था. शुरुआत में कोटा से पढ़कर लौटे दोस्तों से नोट्स और स्टडी मैटेरियल लेकर तैयारी की, ऑनलाइन लेक्चर देखे और लगातार परीक्षा देते रहे. 

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जब लगा कि सिर्फ अपने दम पर तैयारी से मंजिल मुश्किल है तो कोटा जाकर कोचिंग करने का फैसला किया. कोटा में पढ़ाई के लिए पैसे जुटाने के लिए पिता के साथ सड़क किनारे आलू बेचने तक का काम किया. आखिरकार आठवें प्रयास में अल्ताफ ने NEET-2026 में 563 अंक हासिल कर अपना और परिवार का डॉक्टर बनने का सपना पूरा करने की दिशा में बड़ा कदम बढ़ाया.

अल्ताफ ने ऑल इंडिया रैंक 27,910 और OBC कैटेगरी में 13,437वीं रैंक हासिल की है. उसने वर्ष 2019 में पहली बार NEET की परीक्षा दी थी, तब उसे 323 अंक मिले थे. इसके बाद उसने हार नहीं मानी और लगातार अपनी तैयारी जारी रखी. कस्बे के जो विद्यार्थी कोटा से पढ़कर लौटते थे, उनसे नोट्स और स्टडी मैटेरियल लेकर पढ़ाई करता रहा. ऑनलाइन लेक्चर भी देखे. वर्ष 2022 में उसके अंक बढ़कर 516 हुए, जबकि 2023 और 2024 में उसने 590 तक अंक हासिल किए. हालांकि, उन वर्षों में कटऑफ अधिक रहने के कारण उसे मेडिकल कॉलेज में प्रवेश नहीं मिल सका. वर्ष 2025 में उसके 501 अंक आए और अब 2026 में आठवें प्रयास में 563 अंक हासिल कर उसने सफलता का मुकाम छू लिया.

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दोस्तों के नोट्स से शुरू हुआ सफर

अल्ताफ का कहना है कि अगर इंसान कुछ ठान ले तो कुछ भी संभव है. उसने कई वर्षों तक बिना कोचिंग के तैयारी की, लेकिन उसे महसूस हुआ कि तैयारी में सही दिशा और मार्गदर्शन की कमी है. इसके बाद वह कोटा आया और एलन कॅरियर इंस्टीट्यूट में एक साल तैयारी की. उसका कहना है कि कोटा में उसे वह सीखने को मिला, जो पिछले सात वर्षों में नहीं सीख पाया था. फैकल्टीज और दोस्तों ने उसकी तैयारी में काफी मदद की. किसी ने नोट्स दिए तो किसी ने सही दिशा और गाइडेंस दी. यही सहयोग उसकी तैयारी के लिए निर्णायक साबित हुआ.

अल्ताफ ने यूपी बोर्ड से 10वीं और 12वीं की पढ़ाई की और दोनों कक्षाओं में करीब 85 प्रतिशत अंक हासिल किए.

भाई के एक्सीडेंट ने बदली जिंदगी की दिशा

अल्ताफ की जिंदगी में एक घटना ने डॉक्टर बनने की उसकी सोच को मजबूत कर दिया. 12वीं पास करने के बाद वह अपने पिता के साथ आलू की फड़ पर बैठने लगा था. उसका बड़ा भाई रात करीब दो बजे बरेली मंडी से आलू लेने जाता था. एक दिन उसका एक्सीडेंट हो गया. इस घटना ने अल्ताफ को भीतर तक प्रभावित किया. उसे महसूस हुआ कि जिंदगी में आगे बढ़ने के लिए कुछ अलग करना होगा.

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अल्ताफ ने बताया कि नवाबगंज कस्बे से हर साल करीब 10 से 12 बच्चे NEET में सफलता हासिल कर मेडिकल कॉलेज में प्रवेश लेते हैं. वह इन बच्चों को देखकर प्रेरित होता था. इसी प्रेरणा और भाई के हादसे के बाद डॉक्टर बनने की जिद ने उसे लगातार NEET की तैयारी के लिए मजबूती दी.

कोटा जाने के लिए पिता के साथ बेचे आलू

अल्ताफ के परिवार की आर्थिक स्थिति उसकी राह में बड़ी चुनौती थी. पिता इकबाल हुसैन अंसारी सड़क किनारे आलू की फड़ लगाकर परिवार का पालन-पोषण करते हैं. कोटा में कोचिंग के लिए पैसे जुटाना आसान नहीं था. ऐसे में अल्ताफ ने पिता के साथ आलू बेचकर पढ़ाई के लिए पैसे जुटाए और कोटा पहुंचा. एक साल एलन में तैयारी करने के बाद आखिरकार उसकी मेहनत रंग लाई.

अल्ताफ का कहना है कि अगर वह पहले ही कोटा आ गया होता तो शायद उसका चयन पहले हो जाता. लगातार सात साल तक उसने प्रयास किया, लेकिन कोचिंग और सही मार्गदर्शन की कमी महसूस होती रही. कोटा आकर उसकी यह कमी पूरी हुई और आठवें प्रयास में वह सफल हुआ.

दो कमरों के घर में 12 लोगों का परिवार

अल्ताफ की सफलता के पीछे उसके परिवार का संघर्ष भी जुड़ा है. उसके पिता इकबाल हुसैन ने केवल नौवीं कक्षा तक पढ़ाई की है और मां कुबरां निरक्षर हैं. परिवार की आजीविका आलू बेचकर चलती है. वर्ष 2015 तक परिवार कच्चे मकान में रहता था. इसके बाद दो कमरों का पक्का मकान बनाया गया, जिसमें परिवार के 12 सदस्य रहते थे.

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अल्ताफ के परिवार में एक बड़ा भाई और आठ बहनें हैं. सभी बहनों की शादी हो चुकी है. परिवार की जिम्मेदारियों और लगातार होने वाले खर्चों के कारण पिता ज्यादा पैसा नहीं बचा सके. वर्ष 2023 में सबसे छोटी बहन की शादी हुई. इन तमाम आर्थिक और पारिवारिक जिम्मेदारियों के बीच अल्ताफ ने अपनी पढ़ाई और डॉक्टर बनने का सपना नहीं छोड़ा.

पिता बोले-कभी सोचा नहीं था बेटा डॉक्टर बनेगा

अल्ताफ के पिता इकबाल हुसैन का कहना है कि उन्होंने कभी नहीं सोचा था कि उनका बेटा डॉक्टर बनेगा. परिवार आलू बेचकर चलता है और आर्थिक स्थिति बहुत मजबूत नहीं थी. उन्होंने अपनी क्षमता के अनुसार बेटे का सहयोग किया. पिता का कहना है कि उन्हें भी लगता है कि अगर अल्ताफ पहले कोटा चला गया होता तो शायद पिछले वर्षों में ही उसका चयन हो जाता.

नवीन माहेश्वरी बोले-अल्ताफ की सफलता दूसरे विद्यार्थियों के लिए प्रेरणा

एलन कॅरियर इंस्टीट्यूट के फाउंडर नवीन माहेश्वरी ने अल्ताफ की सफलता को दूसरे विद्यार्थियों के लिए प्रेरणादायक बताया. उन्होंने कहा कि कोटा ऐसी सफलताओं से भरा हुआ है. यहां आकर विद्यार्थी अपनी क्षमताओं का बेहतर इस्तेमाल करने और खुद का श्रेष्ठ देने के लिए तैयार होता है. यही वजह है कि कोटा से निकलने वाले परिणाम कई विद्यार्थियों के लिए नई उम्मीद और प्रेरणा बनते हैं.

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2019 में 323 अंक से शुरू हुआ सफर, 2026 में 563 तक पहुंचा. आठ प्रयास, आर्थिक तंगी, आलू की फड़ पर पिता का साथ, दोस्तों के नोट्स और आखिरकार कोटा की कोचिंग-अल्ताफ की कहानी बताती है कि मंजिल देर से मिले, लेकिन लगातार कोशिश करने वाला व्यक्ति आखिरकार उसे हासिल कर सकता है.

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