21 साल की उम्र में ज्यादातर युवा पढ़ाई पूरी करने, नौकरी की तैयारी करने या अपने करियर की दिशा तय करने में जुटे होते हैं. लेकिन कई बार जब आप अपने शौक के पीछे तेजी से भागते हैं, तो वह कब आपकी पहचान बन जाती है पता ही नहीं चलता है. रॉबी कार्टराइट के लिए यह शौक स्नीकर्स का था. शुरुआत में शायद उन्होंने भी नहीं सोचा होगा कि स्नीकर्स खरीदने और बेचने की उनकी पसंद एक दिन बड़े कारोबार में बदल जाएगी. यॉर्कशायर ट्रेनर्स के संस्थापक रॉबी कार्टराइट ने अपने इसी शौक को बिजनेस में बदलने का फैसला किया. उनका कारोबार इतनी तेजी से बढ़ा कि कंपनी ने सिर्फ एक महीने में 2,80,000 डॉलर (2.64 करोड़) से ज्यादा की बिक्री कर ली. लेकिन सवाल ये है कि इसकी जर्नी कब शुरू हुई? चलिए जानते हैं.
बचपन से शुरू हुआ सफर
बता दें कि रॉबी कार्टराइट ने बचपन में ही कैंडी बार से लेकर फिजेट स्पिनर तक, चीजें खरीदना और उन्हें बेचना शुरू कर दिया था. उनकी इस जर्नी में सबसे खास किस्सा ये था कि उन्होंने 10 डॉलर (करीब 940 रुपये) को 1,000 डॉलर (94,000 रुपये) के निवेश में बदल दिया था. हालांकि, 14 साल की उम्र तक आते-आते उन्होंने दोबारा से स्नीकर्स बेचना शुरू कर दिया था. वह eBay पर अच्छे सौदे तलाशते और खास रिलीज होने वाले स्नीकर्स खरीदने के लिए दुकानों के बाहर घंटों इंतजार करते थे. कई बार करीब 200 डॉलर (लगभग 18,800 रुपये) में खरीदा गया एक जोड़ा उसी रात 1,000 डॉलर (करीब 94,000 रुपये) तक में बिक जाता था.
उन्हें इस काम में इतना मजा आने लगा कि 17 साल की उम्र तक रॉबी इस काम में पूरी तरह जुट गए. इसके बाद उनका छोटा सा शौक धीरे-धीरे बड़े कारोबार का रूप लेने लगा. मई उनके लिए अब तक का सबसे सफल महीना रहा, जब उन्होंने 2,80,000 डॉलर (लगभग 2.64 करोड़ रुपये) से ज्यादा की कमाई की. हालांकि, यहां एक बात समझना जरूरी है कि 2.64 करोड़ रुपये का यह आंकड़ा कुल बिक्री का है, रॉबी की व्यक्तिगत कमाई या मुनाफे का नहीं. बिजनेस इनसाइडर की रिपोर्ट में भी इसे बिक्री का आंकड़ा बताया गया है.
कैसे करता था ये काम?
रॉबी कार्टराइट की कहानी सिर्फ एक युवा के शौक और कमाई की कहानी नहीं है. यह उस कारोबार की भी झलक देती है, जहां कभी स्नीकर्स खरीदना एक खास शौक माना जाता था, लेकिन अब इनकी खरीद-बिक्री एक बड़ा बिजनेस बन चुका है. इस कारोबार का तरीका सुनने में काफी आसान लगता है.
रीसेलर किसी लिमिटेड एडिशन या ज्यादा मांग वाले स्नीकर्स को खुदरा कीमत पर खरीदता है और बाद में मांग बढ़ने पर उसे ज्यादा कीमत में बेच देता है. हालांकि, असली कमाई का हिसाब इतना सीधा नहीं होता. स्नीकर्स को दोबारा बेचने में प्लेटफॉर्म की फीस, शिपिंग, टैक्स, जूते की असली होने की जांच, स्टोरेज और लंबे समय तक नहीं बिकने वाले स्टॉक का खर्च भी शामिल होता है. ऐसे में खरीद और बिक्री की कीमत के बीच दिखने वाला पूरा अंतर मुनाफा नहीं होता.
किसी स्नीकर की कीमत कितनी बढ़ेगी, यह भी कई चीजों पर निर्भर करता है. उसकी कमी, किसी बड़े ब्रांड या डिजाइनर के साथ सहयोग, सेलिब्रिटी का असर, सोशल मीडिया पर चर्चा और बदलते फैशन ट्रेंड इसकी मांग और कीमत को प्रभावित कर सकते हैं. इस बाजार का आकार भी तेजी से बढ़ रहा है. StockX के अनुमान के मुताबिक, वैश्विक स्नीकर रीसेल बाजार 2030 तक 30 अरब डॉलर (करीब 28.2 लाख करोड़ रुपये) तक पहुंच सकता है. प्लेटफॉर्म के अनुसार, 2024 के अंत तक उसके यहां 6 करोड़ से ज्यादा लाइफटाइम ट्रेड और 2 करोड़ लाइफटाइम खरीदार दर्ज हो चुके थे.
बदलते मार्केट
हालांकि, अब रीसेल मार्केट में लोगों की मांग बदल रही है. नाइकी और जॉर्डन लोगों के बीच अपनी पहचान बनाए हुए हैं. लेकिन स्टॉकएक्स के आंकड़ों से पता चलता है कि एएसआईसी, न्यू बैलेंस, एडिडास, सौकोनी, मिज़ुनो और ब्रूक्स जैसे ब्रांडों की मांग बढ़ रही है. कस्टमर की पसंद में भी तेजी से बदलाव आ रहा है.
सोशल मीडिया ने कारोबार करने के तरीके में सबसे बड़ा बदलाव किया है. अब सेलर अब दुकानों पर जूते बेचने के बजाय इंस्टाग्राम, टिकटॉक, यूट्यूब और लाइवस्ट्रीम के माध्यम से सामानों को खरीद या बेच सकते हैं.
लाइवस्ट्रीमिंग का महत्व विशेष रूप से तब बढ़ रहा है जब सेलर मनोरंजन और व्यापार को एक साथ जोड़ रहे हैं. इसलिए, व्यवसाय सीमित संस्करण के स्नीकर खरीदने और तुरंत बेचने की पारंपरिक सोच से आगे बढ़ रहा है.
भारत में कैसा है मार्केट का हाल?
वहीं, अगर भारत में बदलते मार्केट की बात करें, तो अब अपना खुद का स्नीकर रीसेल इकोसिस्टम विकसित कर रहा है. उद्योग जगत के अनुमान अलग-अलग हैं, लेकिन बिजनेस स्टैंडर्ड ने मार्च 2026 में रिपोर्ट किया था कि भारत का कुल स्नीकर बाजार लगभग 4 अरब डॉलर (लगभग 37,600 करोड़ रुपये) का था. रिपोर्ट के मुताबिक, युवाओं खासकर Gen Z में स्नीकर और स्ट्रीटवियर का बढ़ता क्रेज, लोगों की बढ़ती खर्च करने की क्षमता और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर स्नीकर आसानी से मिलना इस बाजार को आगे बढ़ा रहा है.
इसके लिए कई ऑनलाइन प्लेटफॉर्म अब स्नीकर रीसेल के इस बाजार को एक व्यवस्थित रूप देने की कोशिश कर रहे हैं. पहले स्नीकर की खरीद-बिक्री के लिए लोग इंस्टाग्राम सेलर और अपने जान-पहचान के नेटवर्क पर ज्यादा निर्भर रहते थे. अब यह कारोबार बड़े शहरों तक सीमित नहीं है. टियर-2 और टियर-3 शहरों से भी स्नीकर की मांग बढ़ने की खबरें सामने आ रही हैं.
स्नीकर खरीदने-बेचने से आगे बढ़ता कारोबार
युवाओं के लिए अब ये काम केवल स्नीकर रीसेल से केवल महंगे जूते खरीदकर उसे ज्यादा कीमत में बेचने तक सीमित नहीं रह गया है. यह फैशन, ऑनलाइन खरीदारी और सोशल मीडिया से जुड़ा एक कारोबार बनता जा रहा है. इसमें यह समझना जरूरी है कि लोगों को किस तरह के स्नीकर पसंद आ रहे हैं, कौन-सा ट्रेंड आगे बढ़ सकता है, सामान कहां से खरीदा जाए और कितना स्टॉक रखा जाए. इसके साथ ही ग्राहकों का भरोसा बनाए रखना भी इस कारोबार का अहम हिस्सा है.
रॉबी कार्टराइट की कहानी दिखाती है कि एक शौक को सही तरीके से आगे बढ़ाकर कारोबार का रूप दिया जा सकता है. वहीं, भारत में स्नीकर रीसेल बाजार का बढ़ना भी दिखाता है कि यह कारोबार अब सिर्फ कुछ लोगों तक सीमित नहीं रह गया है. धीरे-धीरे यह ज्यादा व्यवस्थित और ऑनलाइन तरीके से चलने वाले बाजार में बदल रहा है.
आजतक एजुकेशन डेस्क