यह सवाल सुनने में भले ही छोटा लगे, लेकिन हजारों युवाओं की जिंदगी इससे जुड़ी है. पढ़ाई पूरी करने के बाद नौकरी की तलाश में छोटे शहरों और कस्बों से युवा नोएडा, दिल्ली, गुरुग्राम, बेंगलुरु और पुणे जैसे शहरों में बड़े सपने के साथ आते हैं. उन्हें लगता है कि बड़े शहर में नौकरी मिलेगी तो करियर आगे बढ़ेगा लेकिन पहली नौकरी की सैलरी जब 10-15 हजार रुपये होती है, तब शहर में रहना ही एक चुनौती बन जाता है.
ये कहानी किसी एक युवा की नहीं है. कभी इंटर्न के नाम पर तो कभी फ्रेशर्स के नाम पर कम सैलरी में ज्यादा काम करवाना कंपनियों की पुरानी आदत को झेल रहे सैकड़ों युवाओं की है. हाल ही में नोएडा में सैलरी को लेकर हुए कर्मचारियों के प्रदर्शन में ये मुद्दा पूरी दुनिया के सामने आया था. लेकिन हालात अभी भी बहुत सुधरे नहीं हैं. दिल्ली एनसीआर में में काम के लिए आईं इन लड़कियों की लाइफ तो आज भी उसी ढर्रे में चल रही है. पढ़ाई पूरी करके दिल्ली नोएडा में अच्छे पैकेज पर नौकरी का सपना लेकर आई लड़कियां यहां असली जिंदगी का सच जी रही हैं.
एक साल तो पढ़ाई में ही निकल गया
नव्या (बदला हुआ नाम) करीब तीन साल पहले पंजाब से दिल्ली पढ़ाई और नौकरी की तलाश में आई थी. शुरुआत का एक साल तो, नोएडा में सेटल होने, पढ़ाई करने और नौकरी खोजने में लग गया. बातचीत के दौरान उसने बताया कि वह यहां पर एक साल का डिप्लोमा कोर्स करने के लिए आई थी. हालांकि, इसके पहले वह BBA कर चुकी थी लेकिन उसे मालूम था कि इस डिग्री से कुछ खास होना नहीं था, इसलिए वह एक ऐसा कोर्स करना चाहती थी, जो उसे अच्छी नौकरी दिला सके.
भूखी भी रही... पैदल किया सफर
नव्या बताती हैं कि केवल 10 हजार की सैलरी के लिए वह बहुत मेहनत करती हैं. (हालांकि, अब उनकी सैलरी में थोड़ी बढ़त हुई है) इतनी कम सैलरी में उन्हें तरह-तरह की दिक्कतों का सामना करना पड़ता है, जिनका सामना वह करती हैं. भले ही सैलरी थोड़ी बढ़ी है लेकिन खर्च नहीं थम रहा है. ऑफिस आने-जाने के लिए वह पब्लिक ट्रांसपोर्ट का सहारा लेती है, जिसमें महीने का 1000 रुपये चला जाता है. लेकिन कई बार वह कुछ पैसे बचाने के लिए पैदल भी चलती हैं... 7,500 रुपये रेंट में चले जाते हैं और बाकी में खाना-पीना और बिल की व्यवस्था करनी होती है. नव्या की परेशानी यहां पर ही खत्म नहीं हुई. कई बार पीजी में किसी कारण से खाना नहीं बनता तो, वह कई बार भूखी भी रही हैं.
10 हजार रुपये आखिर होते ही कितने हैं... महीने शुरू होता नहीं कि उनका 75 फीसदी सैलरी का हिस्सा सिर्फ रहने की जगह पर खर्च हो जाता था. बातचीत के दौरान उसने बताया कि पीजी में रहना भी आसान नहीं है. हर साल रेंट बढ़ जाता है. कभी बिजली का बिल इतना ज्यादा आ जाता है. कई बार तो ऐसी परेशानियां आती थीं कि उनका बजट ही हिल जाता था. लेकिन बातचीत के दौरान जब उनसे पूछा गया कि वह कोई पार्ट टाइम नौकरी क्यों नहीं करती हैं, तो उन्होंने कहा कि खुद को प्रूफ करने के लिए ऑफिस का इतना ज्यादा हो जाता है कि पीजी आने के बाद कुछ करने की हिम्मत नहीं बचती है, लेकिन कुछ पैसों के लिए वह ऑनलाइन ट्यूशन पढ़ाती हूं. उन्होंने आगे कहा कि वैसे तो मुझे यहां पर कोई नहीं जानता लेकिन पढ़े-लिखे होने की वजह से वह मेड का काम भी नहीं कर सकती हैं.
घर वापस क्यों नहीं लौंटी?
अब जो सवाल सबसे पहले उठता वह ये है कि जब उन्हें यहां पर रहने में इतनी परेशानियों का सामना करना पड़ता है, तो, वह अपने घर क्यों नहीं लौंटी? इसपर उन्होंने जवाब दिया... ऑफिस वालों ने कहा कि कुछ महीनों में पैसे बढ़ा देंगे. हालांकि, ऐसा हुआ लेकिन पहले उन्हें बताया गया था कि 6 महीने में उनकी सैलरी बढ़ा दी जाएगी लेकिन ऐसा हुआ नहीं इसके लिए उन्होंने करीब एक साल का इंतजार किया. लेकिन क्या पंजाब में 10 हजार का जॉब नहीं मिल सकती थी. इसपर उन्होंने कहा कि बाहर निकलने से केवल परिवार ही नहीं बल्कि समाज में भी इज्जत मिलती है.
10 लाख का किया MBA लेकिन सैलरी 20 हजार
वहीं, दूसरी ओर पीजी में रहने वाली पूजा (बदला हुआ नाम) ने बताया कि उसने पहले एयर होस्टेस बनने के लिए पढ़ाई की लेकिन जब उसने नौकरी के लिए ट्राई किया तो उसे शुरुआती सैलरी करीब 15 हजार रुपये मिल रही थी. लेकिन इसके बाद से उसने PGDM का कोर्स किया. इसे पूरा करने के बाद से उसने नौकरी की तलाश शुरू की लेकिन इसके बावजूद उसे केवल 20 हजार रुपये की नौकरी मिली. बातचीत के दौरान पूजा ने बताया कि उसने इस कोर्स को पूरा करने के लिए करीब 10 लाख रुपये खर्च किए थे ताकि उसे अच्छे पैकेज के साथ एक अच्छी नौकरी मिल सके. लेकिन अब जब उसने नौकरी की तलाश की शुरुआत की तो, 20 हजार के ऊपर उसे कोई कंपनी देने के लिए तैयार नहीं, जिसके बाद उसे हारकर 20 हजार की नौकरी के ऑफर को एक्सेप्ट करना पड़ा.
तो क्या 10 हजार रुपये के लिए आते हैं यहां?
सवाल यह भी है कि जब कमाई इतनी कम है तो युवा अपने घर से इतनी दूर क्यों आते हैं? इसका जवाब केवल पैसे नहीं होता है. किसी भी युवा के लिए दूसरा शहर उनके लिए एक बड़ा मौका होता है, जहां उन्हें परिवार और समाज के सामने खुद को साबित करने का मौका मिलता है. हालांकि, छोटे शहरों में नौकरी के विकल्प सीमित हो सकते हैं लेकिन नोएडा, दिल्ली-एनसीआर, बेंगलुरु, पुणे और दूसरे बड़े शहरों में अलग-अलग क्षेत्रों में शुरुआती स्तर की नौकरियां ज्यादा मिल सकती हैं. युवा कम सैलरी पर भी नौकरी इसलिए स्वीकार कर लेते हैं क्योंकि उनके लिए पहली नौकरी का मतलब सिर्फ आज की कमाई नहीं बल्कि अनुभव, स्किल और आगे बेहतर नौकरी की संभावना भी होता है.
निवेदिता गुप्ता