आखिर क्यों घबरा रहे हैं कर्मचारी! मेंटल हेल्थ पर बात करने को तैयार लेकिन इस डर से हैं चुप

AI के बढ़ते यूज और ऑटोमेशन की वजह से अब युवाओं में नौकरी खोने का डर पहले से ज्यादा हो गया है. वर्ल्ड मेंटल हेल्थ दिन पर ऑफिस में काम करने वाले मानसिक स्वास्थय के बारे में नई रिपोर्ट सामने आई है.

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वर्क- लाइफ बैलेंस बनाना मुश्किल वर्क- लाइफ बैलेंस बनाना मुश्किल

आजतक एजुकेशन डेस्क

  • नई दिल्ली ,
  • 10 अक्टूबर 2026,
  • अपडेटेड 9:41 AM IST

नौकरी चाहने वालों की बढ़ती संख्या कार्यस्थल पर मानसिक स्वास्थ्य के बारे में खुलकर बात करने को तैयार दिख रही है.लेकिन क्या इस खुलेपन की कीमत उनके करियर को चुकानी पड़ेगी? नौकरी की तलाश कर रहे करीब 10 हजार लोगों पर किए गए एक सर्वे में सामने आया कि अब कर्मचारी मानसिक स्वास्थ्य को लेकर खुलकर बात करने को पूरी तरह से तैयार हैं.

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आठ शहरों और 83 उद्योगों में किए गए इस सर्वे में 61% लोगों ने कहा कि वे मेंटल हेल्थ के लिए छुट्टी लेने की बात खुलकर स्वीकार कर सकते हैं.  हालांकि, 33% लोगों को डर है कि ऑफिस में मानसिक स्वास्थ्य पर बात करने से उनके करियर पर बुरा असर पड़ सकता है और उन्हें आगे बढ़ने के मौके नहीं मिलेंगे. 

पहले से बदलाव लेकिन नौकरी का खतरा 

हालांकि, पहले लोग इन बातों को खुलकर सामने नहीं रखते थे. लेकिन जारी हुए सर्वे में इस बात का खुलासा हुआ है कि पहले के मुकाबले ऑफिस में मानसिक स्वास्थ्य पर बात करना अब पहले से ज्यादा आम हो रहा है. लेकिन कर्मचारियों को अब भी डर है कि इस मुद्दे पर खुलकर बोलने पर उनके बॉस या कंपनी का रवैया कैसा होगा. 

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10 अक्टूबर को विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस मनाया जाता है. इसका मकसद मानसिक स्वास्थ्य और लोगों की भलाई के प्रति जागरूकता बढ़ाना है. सर्वे से यह भी पता चलता है कि कर्मचारी अपने ऑफिस से किस तरह के सहयोग की उम्मीद करते हैं और कौन-सी बातें उन्हें खुलकर अपनी परेशानी बताने से रोकती हैं. 

वर्क- लाइफ बैलेंस बनाना मुश्किल 

सर्वे में शामिल 42% लोगों के लिए काम और पर्सनल लाइफ के बीच बैलेंस बनाना मुश्किल हो रहा है जिसकी वजह से उनका मेंटल हेल्थ प्रभावित हो रहा है. वहीं, 27% लोगों का कहना है कि मैनेजर से पर्याप्त मदद न मिलने और 20% लोगों का मानना है कि ज्यादा काम व समय पर काम पूरा करने के दबाव को इसकी वजह बताया. सर्वे में इस बात का भी खुलासा हुआ है कि कर्मचारियों के लिए ऑफिस में रोजमर्रा के अनुभव उनके मानसिक स्वास्थ्य पर असर डालते हैं. काम और निजी जिंदगी के बीच संतुलन बनाना उनकी सबसे बड़ी जरूरतों में से एक है. कर्मचारी चाहते हैं कि ऑफिस में काम और निजी समय के बीच स्पष्ट सीमाएं तय होनी चाहिए. 

मानसिक स्वास्थ्य पर बात करने से करियर का डर

वहीं, जो बात कर्मचारियों को सबसे ज्यादा परेशान करती है वह है करियर खत्म होने का डर. दरअसल, सर्वे में 61% लोगों ने कहा कि वे मानसिक स्वास्थ्य के लिए छुट्टी लेने की बात खुलकर बता सकते हैं. हालांकि, अपनी परेशानी शेयर करने के नतीजों को लेकर कई लोगों के मन में डर भी है. करीब 33% लोगों को आशंका है कि मानसिक स्वास्थ्य के बारे में बात करने से उनके करियर के मौके छिन सकते हैं.

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वहीं, 32% लोगों को डर है कि उनकी परेशानी पर कोई ध्यान नहीं देगा. इसके अलावा, 19% लोगों को कमजोर समझे जाने की चिंता है, जबकि 16% को डर है कि उनकी निजी परेशानियां ऑफिस में गॉसिप का विषय बन सकती हैं. सर्वे में शामिल लोगों की प्रतिक्रियाओं से साफ है कि मानसिक स्वास्थ्य पर खुलकर बात करने को लेकर कर्मचारियों के मन में कई तरह की चिंताएं हैं. उन्हें डर है कि इससे उनके करियर पर असर पड़ सकता है या ऑफिस में दूसरे लोग उन्हें किस नजर से देखेंगे. 

कर्मचारी कंपनियों से क्या बदलाव चाहते हैं?

सर्वे में जब लोगों से पूछा गया कि कंपनियां मानसिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाने के लिए क्या कर सकती हैं, तो 53% ने काम और निजी जिंदगी के बीच स्पष्ट सीमाएं तय करने की बात कही. वहीं, 22% लोगों ने कहा कि मैनेजरों को तनाव और बर्नआउट के संकेत पहचानने की ट्रेनिंग दी जानी चाहिए. इसके साथ ही 13% लोगों ने मानसिक स्वास्थ्य के लिए अलग से छुट्टी देने और 12% ने काउंसलिंग की सुविधा बढ़ाने की मांग की. इन आंकड़ों से पता चलता है कि कर्मचारी चाहते हैं कि कंपनियां उनके निजी समय का सम्मान करें, मैनेजर उनकी परेशानी को समझें और जरूरत पड़ने पर मदद आसानी से मिल सके.

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