10 अगस्त को रांची की सड़कों से जिस तरह की तस्वीरें सामने आई है, उसे देखने के बाद लोगों के रोंगटें खड़े हो गए हैं. सरकारी अफसर बनने की तैयारी में जुटे हुए युवाओं पर इस तरह का हमला न केवल उनकी क्षमता पर सवाल करता है बल्कि आने वाले समय में युवाओं और भर्ती परीक्षाओं में हो रही जोखिमों को और गहरा कर रहा है. प्रदर्शनकारी छात्रों का सीधा आरोप है कि रात के अंधेरे में पुलिस ने उन पर बर्बरता से लाठियां बरसाईं, जिसमें कई छात्र गंभीर रूप से चोटिल हो गए. लेकिन यह कहानी यहीं पर खत्म नहीं होती है.
GATE पास, असिस्टेंट इंजीनियर का भरा फॉर्म, सब-इंस्पेक्ट का फॉर्म भरने का बाद भी कोई नियुक्ति नहीं की गई है. लेकिन सरकारी अफसर बनने की बजाय आज उसकी पहचान विरोध प्रदर्शन करने वाले की कैटेगरी में आ गई है. यह केवल एक व्यक्ति की कहानी नहीं है, बल्कि रांची में रहने वाले लाखों युवा की है, जो बनने तो अफसर आए थे लेकिन बन कर रह गए प्रदर्शनकारी.
मुझे मरने दो…ये किसी ऐसे इंसान के शब्द नहीं हैं जो जिंदगी से हारकर ये बात कह रहा हो. ये उस बेचैनी की आवाज है, जो झारखंड की सड़कों पर आज नौकरी की तलाश में भटकते युवाओं के बीच सुनाई दे रही है. सोशल मीडिया में ऐसे युवाओं के इंटरव्यू तैर रहे हैं जिनके पास बीटेक की डिग्री है और GATE क्लियर है लेकिन नौकरी एक भी नहीं मिली. वहीं एक पिता ऐसे हैं जो अपनी दो बेटियों के लिए विरोध प्रदर्शन में उतर गए हैं. किसी के हाथ में डिग्री है, किसी के पास सालों की तैयारी… लेकिन नौकरी की जगह अब हाथ में पोस्टर है और जुबान पर विरोध.
क्या है महेंद्र प्रसाद की कहानी?
विरोध प्रदर्शन में बैठे महेंद्र प्रसाद की फॉर्मों की संख्या देख लोगों का दिमाग घूम जाएगा. वह इस प्रदर्शन में अपनी दोनों बेटियों के भविष्य को लेकर सरकार से सवाल कर रहे हैं. सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे वीडियो में महेंद्र प्रसाद ने बताया कि उन्होंने बीटेक की पढ़ाई की है. इतना ही नहीं पहले प्रयास में उन्होंने GATE भी पास किया है. इसके बाद साल 2015 में उन्होंने असिस्टेंट ऑफिसर का फॉर्म भी भरा.
इसके बाद झारखंड स्टाफ सिलेक्शन कमिशन का भी फॉर्म भरा. इसके बाद उन्होंने झारखंड ऊर्जा विभाग का फॉर्म भरा, जेईई परीक्षा का भी फॉर्म भरा. उन्होंने कक्षपाल के पद पर यानी जेलर के पदों पर भर्ती के लिए फॉर्म भरा है. इस दौरान उनका कहना है कि साल 2015 की वैकेंसी को अभी तक क्लियर नहीं किया गया है. लेकिन साल 2017 में उनकी शादी कर दी गई और अब उनकी दो बेटियां हैं.
हम उनके लिए विरोध प्रदर्शन में शामिल हुए हैं. उन्होंने आगे कहा कि अगर मेरे पिता की नौकरी नहीं लगी, मेरी नहीं लगी तो कम से कम हमारी बेटियों की तो नौकरी लग जाए. अगर इन लोगों की नौकरी भी नहीं लगेगी तो, आगे भविष्य में क्या होगा? इसका जिम्मेदार कौन होगा? इस दौरान उन्होंने यह भी कहा कि अगर मेरे मरने से झारखंड के युवाओं को अच्छी वैकेंसी मिलेगी या सही नियम के साथ परीक्षा होगी तो मुझे मरने दो... अगर मेरे मरने से नौकरियों को 20 से 25 लाख में बेचा नहीं जाएगा, तो मुझे मरने दो.
बता दें कि झारखंड में सरकारी भर्ती परीक्षाओं की कथित अनियमितताओं को लेकर छात्रों और नौकरी के अभ्यर्थियों का गुस्सा लगातार बढ़ रहा है. JPSC और JSSC की परीक्षाओं को लेकर सवाल उठ रहे हैं. हजारों छात्र सड़कों पर उतर चुके हैं और 10 अगस्त को विधानसभा की ओर मार्च के बाद आंदोलन ने और तीखा रूप ले लिया. पुलिस कार्रवाई, हिरासत और सरकार के साथ बातचीत के बावजूद छात्रों की नाराजगी कम होती नहीं दिख रही.
लेकिन इस आंदोलन को सिर्फ परीक्षा में गड़बड़ी या भर्ती प्रक्रिया का विवाद समझना शायद पूरी कहानी नहीं है. इसके पीछे उन युवाओं के कई साल हैं, जो किताबों के बीच अपना भविष्य तलाशते रहे. उनके परिवारों की उम्मीदें हैं, माता-पिता की जमा-पूंजी है और उस नौकरी का सपना है, जिसे वे अपने जीवन की स्थिरता का रास्ता मान बैठे हैं.
आजतक एजुकेशन डेस्क