सर अगर मैं मेहनत करूंगी तो मेरी नौकरी लग जाएगी... यह एक ऐसा सवाल है जो हर किसी से कभी न कभी अपने सीनियर से जरूर पूछी होगी. ऐसा इसलिए क्योंकि जब आप कॉलेज की पढ़ाई पूरी करके नौकरी की तलाश शुरू करते हैं, तो कंपनियां आपको इंटर्न के तौर पर मौका देने के लिए तैयार हो जाती है. कई बार कुछ कंपनियां इसके लिए आपको पैसे देती हैं, तो कुछ फ्रेशर्स का हवाला देते हुए उन्हें काम सीखने पर प्रोत्साहित करती हैं.
लेकिन इंटर्नस की उम्मीद उस समय टूटने लगती है जब उन्हें अनुभव दिलाने के नाम पर ज्यादा काम दे दिया जाता है और इसके बदले उन्हें कुछ भी नहीं मिलता... काम के अलावा. अब ऐसे में जो सवाल सबसे ज्यादा उठता है कि क्या इसके लिए कोई नियम नहीं बनाए गए हैं या सालों का यह ट्रेंड आज भी उसी तरह काम करता है. तो चलिए इससे जुड़े नियम के बारे में जानते हैं.
वैसे तो कुछ इंटर्नशिप में भुगतान तय होता है, जबकि कुछ में बिना स्टाइपेंड के काम करने की शर्त हो सकती है. ऐसे में हर मामले को एक ही नजरिए से नहीं देखा जा सकता. यह समझना जरूरी है कि इंटर्नशिप की शर्तें क्या हैं, काम किस तरह का कराया जा रहा है और उस व्यवस्था पर कौन-से नियम लागू होते हैं.
क्या हर इंटर्नशिप में स्टाइपेंड देना जरूरी है?
इसका जवाब हर मामले में एक जैसा नहीं हो सकता है. भारत में सभी प्रकार की इंटर्नशिप के लिए एक समान स्टाइपेंड तय नहीं है. सामान्य इंटर्नशिप में भुगतान की शर्तें कंपनी की पॉलिसी, ऑफर लेटर या संबंधित कार्यक्रम के नियमों पर निर्भर कर सकती है. हालांकि, किसी व्यक्ति को सिर्फ इंटर्न कह देने से यह तय नहीं हो जाता कि उस पर रोजगार से जुड़े कानून लागू नहीं होंगे. यदि वह वास्तव में किसी संस्थान के लिए कर्मचारी के रूप में काम कर रहा है, तो उसकी स्थिति और लागू कानूनों की जांच जरूरी हो सकती है.
अप्रेंटिसशिप में स्टाइपेंड का है प्रावधान
अप्रेंटिसशिप और सामान्य इंटर्नशिप को एक जैसा नहीं समझना चाहिए. Apprentices Act, 1961 के तहत आने वाले अप्रेंटिस के लिए स्टाइपेंड देने का प्रावधान है. इस कानून की धारा 13 के अनुसार, नियोक्ता को अप्रेंटिसशिप की अवधि में निर्धारित न्यूनतम दर या लागू प्रावधानों के मुताबिक स्टाइपेंड देने की बात कही गई है. इसलिए अगर कोई युवा औपचारिक अप्रेंटिसशिप कार्यक्रम में शामिल है और उसे तय स्टाइपेंड नहीं मिल रहा, तो उसे अपने अनुबंध और संबंधित नियमों की जांच करनी चाहिए.
अगर कंपनी काम कराकर भुगतान नहीं करती तो क्या करें?
अगर इंटर्नशिप के ऑफर लेटर में स्टाइपेंड तय है और कंपनी भुगतान नहीं कर रही, तो उम्मीदवार को सबसे पहले लिखित रिकॉर्ड सुरक्षित रखना चाहिए. इसमें ऑफर लेटर, ईमेल, काम से जुड़ी बातचीत, उपस्थिति का रिकॉर्ड और भुगतान के वादे से जुड़े दस्तावेज शामिल हो सकते हैं. इसके बाद कंपनी के HR या संबंधित अधिकारी से लिखित में भुगतान की मांग की जा सकती है.
अगर मामला रोजगार से जुड़े लागू कानूनों के दायरे में आता है, तो संबंधित श्रम विभाग या सक्षम प्राधिकारी से मदद ली जा सकती है. श्रम एवं रोजगार मंत्रालय का SAMADHAN पोर्टल लागू श्रम कानूनों के तहत सैलरी न मिलने, कम भुगतान और अन्य रोजगार से जुड़ी शिकायतें कर सकते हैं. हालांकि, हर इंटर्न का मामला इस पोर्टल के दायरे में आएगा या नहीं, यह उसकी स्थिति और शिकायत की प्रकृति पर निर्भर करेगा.
क्या है सरकारी इंटर्नशिप में भुगतान के नियम?
कुछ सरकारी योजनाओं में इंटर्न को मिलने वाली आर्थिक सहायता स्पष्ट रूप से तय की गई है. उदाहरण के लिए, प्रधानमंत्री इंटर्नशिप योजना के आधिकारिक विवरण में पात्र उम्मीदवारों के लिए 12 महीने की इंटर्नशिप के दौरान कुल 5,000 रुपये महीने की सहायता और एक बार 6,000 रुपये की सहायता का प्रावधान बताया गया है. यह सुविधा इसी योजना की शर्तों के तहत मिलती है. इसे देश की हर निजी या सामान्य इंटर्नशिप पर लागू करना सही नहीं होगा.
इंटर्नशिप शुरू करने से पहले किन बातों का रखें ध्यान?
किसी भी कंपनी में इंटर्नशिप स्वीकार करने से पहले उम्मीदवार को कुछ जरूरी बातें साफ करना बेहद जरूरी है.
आजतक एजुकेशन डेस्क