पुलिस की नौकरी की तैयारी कर रहे 23 साल के विवेक की कहानी देश के उन लाखों पढ़े-लिखे युवाओं जैसी है, जो नौकरी के लिए लंबे समय से इंतजार कर रहे हैं. निजी क्षेत्र में पक्की नौकरी मिलना मुश्किल है, जबकि सरकारी नौकरियों में कम भर्तियों, लंबी प्रक्रिया और परीक्षाएं रद्द होने से चुनौती बढ़ गई है.
सरकारी आंकड़े बताते हैं कि युवाओं में बेरोजगारी बढ़ी है और नौकरी चाहने वालों के मुकाबले खाली पद काफी कम हैं. दूसरी तरफ, पढ़ाई और नौकरी के लिए जरूरी हुनर के बीच अंतर, ठेके पर भर्ती, कम वेतन और काम के खराब हालात भी युवाओं की मुश्किल बढ़ा रहे हैं.
विवेक ने दो साल पहले बीए की डिग्री पूरी की थी. वह पुलिस बल में नौकरी पाने के लिए लगातार तैयारी कर रहे हैं. पहले हुई एक परीक्षा रद्द होने के बाद उनका इंतजार और मुश्किल हो गया. फिलहाल वह परिवार की आमदनी में मदद करने के लिए अलीगढ़ की एक पैकेजिंग फैक्ट्री में काम करते हैं. वह तीन युवा सहकर्मियों के साथ एक कमरा साझा करते हैं और दूसरी परीक्षाओं की तैयारी के साथ अंशकालिक कंप्यूटर कोर्स भी कर रहे हैं.
विवेक कहते हैं, अगले छह महीनों के दौरान अगली परीक्षा होनी है. मुझे उम्मीद है कि परीक्षा होगी और मेरी भर्ती हो जाएगी.
विवेक अपने परिवार में सबसे छोटे हैं और उनकी दो बड़ी बहनें हैं. उनकी मां रूपा दिल्ली में आया और पिता अरविंद ड्राइवर हैं. मौजूदा नौकरी से विवेक को कुछ आर्थिक आजादी मिली है, लेकिन उनके माता-पिता चिंतित हैं.
मां रूपा कहती हैं, 'हमने उसकी पढ़ाई के लिए बहुत मेहनत की है. वह अब भी पुलिस की नौकरी का सपना देखता है, लेकिन परिवार से दूर रहकर एक साथ नौकरी और पढ़ाई करना उसके लिए मुश्किल है.'
विवेक की परेशानी देश के लाखों युवा पुरुषों और महिलाओं की स्थिति दिखाती है. स्नातक, स्नातकोत्तर और तकनीकी प्रशिक्षण की डिग्री रखने वाले ये युवा नौकरी की तलाश कर रहे हैं. इनमें सरकारी नौकरी के लिए परीक्षाएं देने वाले युवा भी शामिल हैं, लेकिन उनकी शिक्षा ने उन्हें नौकरी बाजार की जरूरतों के लिए तैयार नहीं किया.
आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 के आंकड़ों के मुताबिक, भारत में 15 साल और उससे अधिक उम्र की कामकाजी आबादी अगले 10 साल में मौजूदा 616 मिलियन से बढ़कर 980 मिलियन से अधिक होने की उम्मीद है. इससे युवाओं पर नौकरी पाने का दबाव और बढ़ेगा.
सरकार की अगस्त 2026 की आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण रिपोर्ट के मुताबिक, 15 साल और उससे अधिक उम्र के युवाओं में बेरोजगारी दर 15.1% थी. यह कुल बेरोजगारी दर 5% से तीन गुना थी. 2025 में ये दरें क्रमशः 9.9% और 3.1% थीं.
केयरएज रेटिंग्स की हालिया रिपोर्ट ने इसके लिए शिक्षा के स्तर और उपयुक्त रोजगार के अवसरों की उपलब्धता के बीच लगातार बने अंतर को जिम्मेदार बताया. रिपोर्ट में कहा गया कि स्वरोजगार बढ़ने और खेती में छिपी बेरोजगारी के कारण बेरोजगारी के आंकड़े सुधार को बढ़ा-चढ़ाकर दिखा सकते हैं. मौसमी, अस्थायी और अनियमित रोजगार वाली अर्थव्यवस्था में बेरोजगारी दर समस्या की वास्तविक सीमा को कम भी दिखा सकती है.
नौकरी मिलने के बाद भी कई युवाओं की समस्या खत्म नहीं होती. बीए स्नातक इंद्रजीत की उम्र 20 साल के आखिरी पड़ाव में है. दिल्ली हवाई अड्डे की नौकरी से हाल में निकाले जाने के बाद वह अभी एक भोजन मंच के लिए डिलीवरी साझेदार के रूप में काम करते हैं और दूसरी नौकरी खोज रहे हैं. कम वेतन के कारण उन्हें फैक्ट्री की नौकरी पसंद नहीं है.
इंद्रजीत कहते हैं, 'डिलीवरी साझेदार के रूप में मैं रोज 700-800 रुपये कमाता हूं. मेरे कई दोस्त ड्राइवर हैं और मुझे भी ऐसी नौकरी मिलने की उम्मीद है. तब मैं महीने में कम से कम 30,000 रुपये कमा सकता हूं.'
खर्च घटाने के लिए इंद्रजीत ने लखनऊ के पास रहने वाले अपने परिवार से मिलना बंद कर दिया है. वह कहते हैं, दिल्ली में मेरा गुजारा मुश्किल से हो रहा है. यात्रा से बेवजह खर्च बढ़ता है.
अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन की हालिया रिपोर्ट के मुताबिक, धीमी वैश्विक आर्थिक वृद्धि, नौकरियां कम बनने, भू-राजनीतिक तनाव और तेजी से बदलती तकनीक के कारण दुनिया भर में युवा बेरोजगारी बढ़ रही है. 2025 में यह दर 12.4% थी. कई क्षेत्रों में युवाओं की आबादी जितनी तेजी से बढ़ रही है, उतनी तेजी से नौकरियां नहीं बन रही हैं.
भारत में भी 2026 के दौरान युवाओं की नाराजगी कई विरोध प्रदर्शनों में सामने आई. दिल्ली और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में औद्योगिक कर्मचारियों ने कम वेतन और काम के खराब हालात को लेकर प्रदर्शन किया. छात्रों ने नीट परीक्षा रद्द होने के खिलाफ प्रदर्शन किया. झारखंड और बिहार जैसे राज्यों में राज्य प्रशासनिक सेवाओं की भर्ती परीक्षाओं में गड़बड़ी के खिलाफ भी प्रदर्शन हुए.
मानव विकास संस्थान के निदेशक अलख एन. शर्मा कहते हैं कि आर्थिक वृद्धि की रफ्तार के साथ नौकरियां और वेतन नहीं बढ़ रहे हैं. उनके मुताबिक, बेरोजगारी खासकर शहरी क्षेत्रों के पढ़े-लिखे युवाओं के लिए समस्या है. ग्रामीण इलाकों में पढ़े-लिखे युवा खेती या पारिवारिक कारोबार में अंशकालिक काम करके खुद को रोजगार में बता सकते हैं, लेकिन शहरी पढ़े-लिखे युवाओं के पास ऐसे विकल्प कम हैं.
2025 की आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण रिपोर्ट के आंकड़े भी इस बात का समर्थन करते हैं. माध्यमिक और उससे अधिक शिक्षा वाले लोगों में बेरोजगारी दर सभी समूहों में सबसे अधिक 6.5% थी. पढ़े-लिखे नहीं माने जाने वाले लोगों में यह दर 0.3% थी. इंजीनियरिंग और एमबीए जैसी डिग्री रखने वाले लोग भी नौकरी पाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं.
ऊंची पढ़ाई भी नौकरी की गारंटी नहीं.
देश भर में इंजीनियरिंग और प्रबंधन की पढ़ाई करने वाले युवाओं को पता चल रहा है कि डिग्री नौकरी बाजार का दरवाजा तो खोल सकती है, लेकिन नौकरी मिलने की गारंटी नहीं देती. औसत एमबीए कॉलेजों से पढ़ने वाले छात्रों का कहना है कि वे डिग्री और भर्ती करने वाली कंपनियों की ओर से मांगे जाने वाले हुनर के बीच फंस रहे हैं.
24 साल के आयुष नेगी ने ऋषिकेश की एक यूनिवर्सिटी से एमबीए किया है. उनका ध्यान मुख्य रूप से डिग्री हासिल करने पर रहा और नौकरी के लिए जरूरी व्यावहारिक हुनर पर उन्हें बहुत कम मार्गदर्शन मिला. उनके मुताबिक, छात्रों को जो पढ़ाया जाता है और नौकरी बाजार जो मांगता है, उनके बीच अंतर बढ़ रहा है.
आयुष का मानना है कि औसत कॉलेजों के छात्र उन भूमिकाओं के लिए जरूरी हुनर को साफ तौर पर समझे बिना डिग्री पूरी कर सकते हैं, जिनके लिए वे आवेदन करते हैं. उनके मुताबिक, यह समस्या पढ़ाई के दौरान सीमित करियर सलाह और उद्योग की बदलती जरूरतों की पूरी जानकारी नहीं मिलने से काफी पहले शुरू हो जाती है.
आयुष के दोस्त और सहपाठी देव शर्मा कहते हैं कि शुरुआती स्तर की नौकरियों के लिए भर्ती करने वाली कंपनियां सिर्फ योग्यता नहीं देखतीं. वे ऐसे उम्मीदवार चाहती हैं, जिनके पास बुनियादी काम संभालने के लिए कम से कम जरूरी व्यावहारिक और तकनीकी हुनर हो.
देव कहते हैं, 'जिन छात्रों को कॉलेज में इन हुनरों के लिए मार्गदर्शन नहीं मिलता, उन्हें नौकरी बाजार में आने के बाद ही इस अंतर का पता चलता है.'
आयुष नेगी और देव शर्मा दोनों नौकरी की तलाश में हैं और अलग-अलग कंपनियों में आवेदन कर रहे हैं. वैश्विक भर्ती मंच इनडीड की हालिया रिपोर्ट में भी इन परेशानियों का जिक्र किया गया. रिपोर्ट के मुताबिक, भारत के युवा नौकरी चाहने वालों के लिए पढ़ाई से रोजगार तक का सफर अधिक प्रतिस्पर्धी और मुश्किल हो गया है. सर्वेक्षण में 70% लोगों ने कहा कि तीन से पांच साल पहले के मुकाबले आज पहली नौकरी पाना कठिन है.
देश भर के 2,633 नौकरी चाहने वालों पर आधारित इनडीड की नई भर्ती रिपोर्ट में कहा गया कि बढ़ती प्रतिस्पर्धा, करियर की जानकारी के सीमित अवसर और करियर की शुरुआत में समझौते के बढ़ते दबाव के बीच शुरुआती स्तर की भर्ती की उम्मीदें बदल रही हैं.
इनडीड इंडिया के प्रबंध निदेशक शशि कुमार के मुताबिक, पिछले तीन महीनों की नरमी के बाद जुलाई में मंच पर नई नौकरियों में बढ़ोतरी हुई. सूचना तकनीक क्षेत्र में नौकरियां धीमी हुई हैं, लेकिन मौजूदा मुश्किल बाजार में युवाओं के लिए प्रशासन और बिक्री सहायता, शिक्षा, सेवा, कारोबारी सहायता और लोगों से जुड़े काम उपलब्ध हैं.
शशि कुमार कहते हैं, नियोक्ता ऐसे नए उम्मीदवार चाहते हैं जिन्होंने अपना हुनर बढ़ाया हो, जिनके व्यवहार से जुड़े हुनर अच्छे हों, जो ठीक से बात कर सकें और टीम में काम कर सकें. उनके मुताबिक, पहले के अनुभव पर भी ध्यान दिया जा रहा है.
नौकरी की तलाश और उम्मीदवारों की भीड़.
श्रम मंत्रालय के अनुमान बताते हैं कि भारत ने वित्त वर्ष 18 से वित्त वर्ष 24 के छह साल में करीब 168.3 मिलियन नौकरियां बनाई होंगी. इसके बावजूद ये नौकरियां बढ़ते श्रम बल की जरूरत पूरी करने के लिए पर्याप्त नहीं रहीं. भारत का श्रम बल दुनिया में दूसरा सबसे बड़ा है और इसमें हर साल अनुमानित 7-8 मिलियन लोग जुड़ते हैं.
राष्ट्रीय करियर सेवा पोर्टल के आंकड़ों के मुताबिक, जुलाई 2026 तक 28.9 मिलियन सक्रिय नौकरी चाहने वाले दर्ज थे, जबकि सक्रिय खाली पद केवल 1.76 मिलियन थे. यह नौकरियों और उम्मीदवारों के बीच बड़ा अंतर दिखाता है.
दिल्ली के एक जिला रोजगार कार्यालय के अधिकारी कहते हैं, हर एक खाली पद के लिए हम 20 संभावित उम्मीदवार भेजते हैं. कार्यालय में प्रवेश करने पर वहां असामान्य रूप से कम लोग दिखाई देते हैं, लेकिन अधिकारी के मुताबिक पूछताछ के लिए कम से कम एक या दो उम्मीदवार खुद कार्यालय आते हैं. बाकी उम्मीदवार राष्ट्रीय करियर सेवा पोर्टल पर दर्ज हैं.
कार्यालय की ओर से 250-300 नौकरियों वाला रोजगार मेला लगाने की योजना बनाई जा रही है. इनमें ज्यादातर नौकरियां बैंकों और बीमा कंपनियों की हैं और ये दसवीं, बारहवीं पास और स्नातकों के लिए हैं. अधिकारी कहते हैं, इनमें से कई नौकरियां फोन पर ग्राहकों से बात करने की हैं, लेकिन कम से कम नौकरियां उपलब्ध तो हैं. हमारे पास कुछ तकनीकी खाली पद भी हैं.
नियमित वेतन वाली औपचारिक नौकरियां कम हैं. इनमें से कई नौकरियों और असंगठित क्षेत्र के काम में लंबे घंटे, खराब कामकाजी हालात, कम वेतन और पर्याप्त सामाजिक सुरक्षा नहीं होने की समस्या है. कृत्रिम बुद्धिमत्ता और डिजिटलीकरण के आने से भी कई क्षेत्रों में चिंता बढ़ी है.
सरकारी नौकरी की चुनौती.
पिछले कुछ वर्षों में सरकारी नौकरियां लगातार घटी हैं, खाली पद बढ़े हैं और काम बाहर की एजेंसियों से कराने का चलन बढ़ा है. कई भर्ती परीक्षाएं रद्द होने से समस्या और बढ़ी है. मार्च 2023 तक उपलब्ध आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, केंद्र सरकार में आम कर्मचारियों के 4.04 मिलियन मंजूर पद थे, लेकिन इनमें केवल 3.06 मिलियन पद भरे गए थे. इस तरह 24.21% पद खाली थे. गैर-आधिकारिक अनुमान इस संख्या को और अधिक बताते हैं.
ऑल इंडिया रेलवेमेंस फेडरेशन के महासचिव और नेशनल काउंसिल जॉइंट कंसल्टेटिव मशीनरी के कर्मचारी पक्ष के संयोजक शिव गोपाल मिश्रा आठवें वेतन आयोग से जुड़ी बातचीत में भी शामिल हैं. उनके मुताबिक, 31 दिसंबर 2024 तक 4.03 मिलियन पद थे और इनमें 3.1 मिलियन भरे गए थे. वह कहते हैं, हमारे अनुमान के मुताबिक केंद्र सरकार में आम कर्मचारियों के करीब 0.95 मिलियन पद खाली हैं.
हिंद मजदूर सभा के अध्यक्ष हरभजन सिंह सिद्धू के मुताबिक, रेलवे, बंदरगाह और गोदी कर्मचारी, कोयला खदान, सड़क परिवहन, सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियां और सरकारी मंत्रालय मिलाकर सभी सरकारी नौकरियों में अनुमानित 3 मिलियन पद खाली हैं.
सिद्धू कहते हैं, 'रेलवे में कर्मचारियों की संख्या पहले के 1.8 मिलियन से घटकर 1.2 मिलियन हो गई है. बंदरगाह और गोदी कर्मचारियों की संख्या पहले के 0.5 मिलियन से घटकर अब करीब 18,000 रह गई है. कोयला खदानों में केवल करीब 0.21 मिलियन नियमित और करीब 0.5 मिलियन ठेका कर्मचारी हैं.'
मिश्रा और सिद्धू दोनों सरकारी नौकरियों में ठेका कर्मचारियों की बढ़ती संख्या की ओर ध्यान दिलाते हैं. उनका कहना है कि इन कर्मचारियों से लंबे समय तक काम कराया जाता है और उन्हें तय वेतन नहीं मिलता, क्योंकि वेतन का बड़ा हिस्सा ठेकेदार रख लेता है.
मिश्रा कहते हैं, रेलवे सहित केंद्र सरकार की नौकरियों में करीब 1.1 मिलियन बाहरी एजेंसियों के कर्मचारी हैं. इससे लागत बचती है, लेकिन कर्मचारियों का बहुत शोषण होता है, क्योंकि उन्हें नियमित कर्मचारियों जैसा वेतन और दूसरी सुविधाएं नहीं मिलतीं. मिश्रा के मुताबिक,
देश में बेरोजगारी अब भी बड़ा मुद्दा है. वह कहते हैं, मान लिया जाए कि पेपर लीक नहीं होते, तब भी युवाओं के लिए नौकरियां कहां हैं. सरकारी क्षेत्र में जो हो रहा है, उसे देखिए.
सिद्धू कहते हैं कि अब बाहरी एजेंसियों और ठेका कर्मचारियों पर अधिक ध्यान दिया जा रहा है, जिससे उनका शोषण होता है. सरकार में नए पद बनाना मुश्किल है और मौजूदा खाली पद भी नहीं भरे जाते. स्कूल शिक्षकों, स्वास्थ्य सेवा, राज्य परिवहन और सड़क परिवहन जैसे क्षेत्रों में भी नियमित कर्मचारियों के बजाय ठेका कर्मचारियों की भर्ती पर ज्यादा जोर है.
केंद्र सरकार ने सार्वजनिक सेवाओं में भर्ती सुधारने के लिए कदम उठाए हैं और मंजूर पदों की खाली जगह भरने के लिए रोजगार मेले आयोजित किए हैं. भर्ती संघ लोक सेवा आयोग, कर्मचारी चयन आयोग और रेलवे भर्ती बोर्ड जैसी तय एजेंसियों और व्यवस्थाओं के जरिए होती है.
रोजगार मेलों की शुरुआत अक्टूबर 2022 में 1 मिलियन सरकारी नौकरियों के शुरुआती लक्ष्य के साथ हुई थी. आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, इनका तेजी से विस्तार हुआ और अब तक 20 आयोजनों में 1.27 मिलियन नियुक्ति पत्र बांटे गए हैं.
सरकार प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए एक साझा कैलेंडर के प्रस्ताव पर भी विचार कर रही है. इसका मकसद परीक्षाओं की तारीखें टकराने से रोकना और उम्मीदवारों को तैयारी तथा यात्रा की बेहतर योजना बनाने में मदद करना है.
मजबूत और भरोसेमंद सरकारी नौकरी की चाह अब भी बड़ी संख्या में युवाओं में है, लेकिन सरकारी नौकरियां पूरे नौकरी बाजार का अनुमानित 10% हैं. रोजगार पैदा करने की मुख्य जिम्मेदारी निजी क्षेत्र पर बनी हुई है.
समस्या का आसान समाधान नहीं.
2023-24 के आर्थिक सर्वेक्षण में बढ़ते श्रम बल की जरूरत पूरी करने के लिए 2030 तक गैर-कृषि क्षेत्र में हर साल औसतन 7.85 मिलियन नौकरियां बनाने की जरूरत बताई गई थी. हालांकि, ऐसा करना आसान नहीं है. छात्र और नियोक्ता दोनों कक्षा की पढ़ाई और कार्यस्थल की जरूरतों के बीच अंतर की बात करते हैं. प्रधानमंत्री इंटर्नशिप योजना जैसे प्रयोगों का असर सीमित रहा है.
विशेषज्ञों ने विनिर्माण क्षेत्र में अधिक नौकरियां बनाने, लगातार नए हुनर सीखने और पुराने हुनर को बेहतर करने तथा व्यावसायिक शिक्षा को मुख्य शिक्षा व्यवस्था में लाने की जरूरत दोहराई है.
मानव विकास संस्थान के शर्मा कहते हैं कि कम समय के लिए बेरोजगारी भत्ता या दूसरी सहायता पढ़े-लिखे युवाओं की मदद कर सकती है. ग्रामीण क्षेत्र में पहले महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी कानून था और अब वीबी-जी राम जी है, लेकिन शहरी क्षेत्रों में पढ़े-लिखे बेरोजगारों के लिए ऐसी कोई वैकल्पिक व्यवस्था नहीं है. शर्मा यह भी कहते हैं कि यह संसाधनों का मामला है.
मुख्य आर्थिक सलाहकार वी. अनंत नागेश्वरन ने हाल में निजी क्षेत्र से रोजगार पैदा करने और उचित वेतन देने पर ध्यान देने को कहा. उन्होंने एसोचैम के एक कार्यक्रम में कहा था, निजी क्षेत्र को निवेश करना चाहिए, लोगों को नौकरी देनी चाहिए, उचित वेतन देना चाहिए और अनुसंधान तथा विकास में भी निवेश करना चाहिए, क्योंकि अगले 20 साल द्वितीय विश्व युद्ध के बाद के पिछले 80 साल से बहुत अलग होने वाले हैं.
नागेश्वरन ने यह भी कहा था कि भारत को ऐसे तरीके खोजने होंगे, जिनमें कृत्रिम बुद्धिमत्ता कर्मचारियों की जगह लेने के बजाय उनके काम में मदद करे.
एक बड़ी चिंता ऐसे युवाओं की संख्या भी है, जो न शिक्षा, न रोजगार और न प्रशिक्षण में हैं. इनमें सबसे अधिक युवा 25-29 साल आयु वर्ग में हैं और इसके बाद 20-24 साल आयु वर्ग आता है. रिपोर्ट के मुताबिक, 15-29 साल की उम्र शिक्षा से श्रम बाजार में जाने का अहम दौर है, जिसमें पढ़ाई, हुनर सीखने और रोजगार से जुड़ाव में बड़े बदलाव आते हैं.
अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन के मुताबिक, न शिक्षा, न रोजगार और न प्रशिक्षण वाला आंकड़ा दिखाता है कि युवाओं को काम की दुनिया में प्रभावी तरीके से जोड़ने में कितनी प्रगति हुई है.
नीति आयोग की हालिया रिपोर्ट ने राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण के 78वें दौर के आधार पर इस समूह के युवाओं की संख्या 87 मिलियन बताई थी. ये आंकड़े कोविड-19 महामारी के दौरान वित्त वर्ष 2020-21 में जुटाए गए थे. बाद में सरकार ने कहा कि आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण 2025 के सबसे हालिया दौर में ऐसे युवाओं का प्रतिशत काफी कम है.
जिला स्तर के श्रम बाजार के नए आंकड़ों के मुताबिक, 250 जिलों में से करीब एक चौथाई जिलों में बड़ी संख्या में युवा लाभ वाला रोजगार नहीं कर रहे थे और न शिक्षा या प्रशिक्षण में थे. कुल 23.7% जिलों में 15-29 साल आयु वर्ग के युवाओं के लिए यह दर 30% से अधिक दर्ज की गई.
इस समस्या को अचानक खत्म करने वाला कोई आसान उपाय नहीं है. 2026 में युवाओं के विरोध प्रदर्शनों से यह संकेत मिला कि बेरोजगारी केवल आर्थिक समस्या रहने के बजाय सामाजिक समस्या भी बन सकती है.
भारत का आबादी से मिलने वाला फायदा भी धीरे-धीरे खत्म हो रहा है. मूडीज रेटिंग्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक, भारत के 16 साल में वृद्ध समाज से अत्यधिक वृद्ध समाज बनने की उम्मीद है. रिपोर्ट ने चेतावनी दी कि भारत की आबादी अभी अपेक्षाकृत युवा है, लेकिन जन्म दर पहले ही प्रतिस्थापन स्तर से नीचे चली गई है और देश की आयु संरचना बदलने लगी है. इससे इस सदी के बाद के वर्षों में आबादी के काफी अधिक उम्रदराज होने की स्थिति बन रही है.
विवेक और इंद्रजीत जैसे युवाओं के अनुभव बेरोजगारी, कम वेतन और पढ़ाई तथा नौकरी की जरूरतों के बीच अंतर को सामने रखते हैं. आंकड़ों के मुताबिक नौकरी चाहने वालों की संख्या खाली पदों से कहीं ज्यादा है, जबकि सरकारी भर्ती, निजी क्षेत्र में रोजगार और युवाओं के हुनर से जुड़ी चुनौतियां बनी हुई हैं.
आजतक एजुकेशन डेस्क