कभी चंबल की पहचान बंदूकों की आवाज, गहरी खाइयां और बिखरी हुई बस्तियां से हुआ करती थी. लेकिन मध्य प्रदेश के मुरैना जिले के इसी गांव में देव प्रभाकर सिंह तोमर ने अलग कहानी लिखी. डकैतों और हिंसा से भरे इतिहास वाले परिवार से ताल्लुकात रखने वाले देव प्रभाकर सिंह ने पढ़ाई का दामन थामा.
IIT की पढ़ाई पूरी की और बाद में उन्होंने UPSC परीक्षा में 629वीं रैंक हासिल की. उनकी कहानी सालों के संघर्ष, कड़ी मेहनत और एक ऐसे पारिवारिक अतीत की कहानी है जिसे पीछे छोड़ना मुश्किल था. इन सब के बावजूद, सिंह ने हार नहीं मानी और आगे बढ़ने का रास्ता खोज ही लिया. इसके बाद उनकी विदेश में नौकरी भी लगी लेकिन उन्होंने प्रशासनिक सेवा के लिए भारत लौटने का फैसला किया. लेकिन पहले जानते हैं कि उनकी इस सफर की शुरुआत कब, कहां और कैसे हुई?
दादा जी से शुरू होता है सफर
देव प्रभाकर सिंह ने एक इंटरव्यू में बताया कि उनके इस सफर की शुरुआत UPSC परीक्षा या आईआईटी रोपड़ से शुरू नहीं होती है बल्कि उनके दादा के टाइम से शुरू होती है. जोश टॉक्स के एक इंटरव्यू में तोमर ने बताया कि उनके दादा जी लगभग 75 साल पहले पारिवारिक समस्याओं और तत्कालीन अधिकारियों के साथ विवादों के चलते बागी बन गए थे. हालांकि पुलिस रिकॉर्ड में उन्हें डकैत के रूप में भी दर्ज किया जा सकता था. इसके बाद से परिवार को कई परेशानियों का सामना करना पड़ा. बातचीत के दौरान तोमर ने याद किया कि इसके बाद उनके परिवार को खाने के लिए भी संघर्ष करना पड़ता था. बात यहीं पर खत्म नहीं हुई. दादा जी के बाद उनके चाचा भी बागी बन गए.
लेकिन पिता ने चुना दूसरा रास्ता
लेकिन उनके पिता ने दूसरा रास्ता चुना. तोमर ने आगे बताया कि उनके पिता पढ़ाई करना चाहते थे, ऐसी नौकरी पाना चाहते थे जो उन्हें सैलरी दे जिससे वह घर चला सकें. इतना ही नहीं वह गांव से बहुत दूर बसना चाहते थे. उन्होंने किसी को बिना बताए ग्वालियर शिफ्ट होने का फैसला किया और वहीं से अपनी पढ़ाई जारी रखी. कड़ी मेहनत के बाद वह शिक्षक बन गए. परिवार के लिए यह एक नई दिशा का परिवर्तन था. तोमर ने भी उसी राह पर चलने का फैसल किया.
शुरुआती पढ़ाई
इसके बाद से तोमर ने अपनी शुरुआती 5 सालों की पढ़ाई मध्य प्रदेश बोर्ड से की. इसके बाद छठी क्लास में वह CBSE बोर्ड के स्कूल में आगे की पढ़ाई करने के लिए चले गए. स्कूल बदलना भी उनके लिए आसान नहीं था. अलग भाषा और नया वातावरण में उन्हें घुलने में थोड़ा समय लगा.
आईआईटी में एडमिशन पर विचार
हालांकि, समय के साथ यह चीजें सही होती गई लेकिन जब वह कक्षा 11 में पहुंचे तब उन्होंने पहली बार आईआईटी में प्रवेश लेने के बारे में सोचना शुरू कर दिया. उनके अगल-बगल रहने वाले छात्र इंजीनियरिंग प्रवेश परीक्षा में शामिल होने की तैयारी कर रहे थे, जिसके बाद उन्होंने भी ऐसा ही करने का फैसला किया. हालांकि, कोचिंग के लिए कोटा जाना उनके लिए संभव नहीं था क्योंकि उनके परिवार की हालात इतनी अच्छी नहीं थी कि वह उनका खर्च उठा सके. इसलिए उन्होंने घर में ही इंजीनियरिंग की परीक्षा की तैयारी शुरू कर दी. उन्होंने आईआईटी रोपड़ में दाखिला लिया और इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई की.
आईआईटी रोपड़ से नीदरलैंड्स तक
आईआईटी से ग्रेजुएशन पूरा करने के बाद तोमर ने कैंपस प्लेसमेंट प्रोसेस से नौकरी की तलाश की. उनकी तलाश उन्हें नीदरलैंड्स स्थित फिलिप्स कंपनी तक ले गई, जहां उन्होंने एम्स्टर्डम के पास काम किया और बाद में उन्हें प्री-प्लेसमेंट ऑफर रिसीव हुआ. इस पद ने उन्हें विदेश में अपना करियर बनाने का खास मौका मिला. फिर भी, जैसा कि उन्होंने बाद में याद किया, उन्हें यह महसूस होने लगा कि वे जिस तरह का जीवन जी रहे थे, वह उनकी इच्छाओं से बिल्कुल मेल नहीं खाता है. लेकिन जैसे ही उन्हें सिविल सेवा परीक्षा के बारे में मालूम चला, वह इसे लेकर और ज्यादा उत्सुक होने लगे.
UPSC की तैयारी के लिए छोड़ी नौकरी
लंबे समय तक विचार करने के बाद उन्होंने सिविल सेवा की तैयारी करने के लिए नौकरी छोड़ने का फैसला किया. उनका मानना था कि फुल टाइम नौकरी के साथ UPSC की तैयारी करना बहुत मुश्किल है. इसलिए उन्होंने नौकरी छोड़ दी और भारत वापस आ गए. पहली कोशिश में वह प्रीलिम्स पास नहीं कर पाए. वह कटऑफ से 12.5 नंबरों से पीछे रह गए. दूसरे प्रयास में उन्होंने अपना प्रदर्शन बेहतर किया, लेकिन इस बार भी सफलता नहीं मिली. वह कटऑफ से सिर्फ 2.5 अंक पीछे रह गए.
लगातार दो असफलताओं के बाद उन्होंने अपनी तैयारी के तरीके पर दोबारा ध्यान दिया. उन्होंने समझा कि सिर्फ पढ़ाई करना और ज्यादा से ज्यादा स्टडी मटेरियल जुटाना काफी नहीं है. परीक्षा के पैटर्न और जरूरत को समझकर तैयारी करना भी जरूरी है. इसके बाद उन्होंने अपनी तैयारी का तरीका बदल दिया.
एक कोशिश और लिस्ट में नाम
तोमर ने हार नहीं मानी और एक बार और कोशिश की. इस बार उन्होंने प्रीलिम्स और मेन्स परीक्षा पास कर इंटरव्यू तक का सफर तय किया था. लेकिन अंतिम रिजल्ट में उनका चयन नहीं हुआ. इसके बाद भी उन्होंने हार नहीं मानी और एक बार फिर UPSC की तैयारी शुरू कर दी.
इस दौरान वह दिल्ली में शिक्षक के तौर पर काम करने लगे. परिवार ने भी उन्हें परीक्षा की तैयारी जारी रखने के लिए हौसला दिया. नौकरी के साथ उन्होंने दोबारा परीक्षा दी. इस बार भी उन्होंने प्रीलिम्स पास किया और इंटरव्यू तक पहुंचे.
इसके बाद उन्हें रिजल्ट का इंतजार था.
जिस दिन रिजल्ट आने की उम्मीद थी, तोमर अपनी पत्नी के साथ घर पर थे. उनके मुताबिक, दोपहर करीब 1:30 बजे रिजल्ट जारी हुआ. उन्होंने UPSC की लिस्ट खोली और अपना नाम ढूंढना शुरू किया. पहले कई बार नाम खोजने पर निराशा मिली. लेकिन इस बार तस्वीर अलग थी.
लिस्ट में उनका नाम था- देव प्रभाकर सिंह तोमर.
UPSC सिविल सेवा परीक्षा 2025 में उन्होंने ऑल इंडिया रैंक 629 हासिल की. इसके बाद उनका चयन भारतीय रेलवे यातायात सेवा (IRTS) में हुआ. फिलहाल वह रेल मंत्रालय में कार्यरत हैं. मुरैना के एक गांव से शुरू हुआ उनका सफर ग्रामीण स्कूल से IIT रोपड़, फिर नीदरलैंड्स की नौकरी और कई कोशिशों के बाद सिविल सेवा तक पहुंचा. उनकी ये कहानी उनके परिवार के तीन पीढ़ियों का अलग-अलग सफर भी नजर आता है.
आजतक एजुकेशन डेस्क