कई कर्मचारियों के लिए नौकरी सिर्फ कमाई का जरिया नहीं होती. इससे आर्थिक सुरक्षा, करियर में आगे बढ़ने का मौका और भविष्य की योजना बनाने का भरोसा मिलता है. लेकिन आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी एआई कंपनियों के कामकाज और भर्ती के तरीकों को बदल रहा है. ऐसे में कर्मचारियों को कम मौकों के लिए ज्यादा मुकाबला करना पड़ सकता है और नौकरी बने रहने के बावजूद बेहतर वेतन की मांग करना मुश्किल हो सकता है.
यूरोपियन सेंट्रल बैंक के चीफ इकोनॉमिस्ट फिलिप लेन ने चेतावनी दी है कि एआई कर्मचारियों की मोलभाव करने की ताकत कमजोर कर सकता है. इससे वेतन बढ़ने की रफ्तार पर दबाव पड़ सकता है और आमदनी में श्रम की हिस्सेदारी घट सकती है. रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, लेन की चेतावनी यूरोप पर केंद्रित है, लेकिन भारत के रोजगार बाजार में भी ऐसे ही सवाल उठ रहे हैं. यहां एआई से जुड़े हुनर की मांग बढ़ रही है, जबकि फ्रेशर्स और दूसरे कर्मचारियों के लिए मौके काफी धीमी रफ्तार से बढ़ रहे हैं.
इस बदलाव के बीच बड़ा सवाल यह है कि क्या कर्मचारी बेहतर वेतन, प्रमोशन और कामकाजी हालात की मांग करने की अपनी ताकत बनाए रख पाएंगे.
क्या कहता है जॉब मार्केट का डेटा
सितंबर 2026 में भारत के व्हाइट कॉलर रोजगार बाजार में बढ़ोतरी एक जैसी नहीं रही. एआई और मशीन लर्निंग से जुड़ी भर्ती सालाना आधार पर 20% बढ़ी, जबकि कुल व्हाइट कॉलर भर्ती में सिर्फ 1% की बढ़ोतरी हुई. जीरो से तीन साल के अनुभव वाले फ्रेशर्स की भर्ती भी केवल 1% बढ़ी. वहीं, चार से सात साल का अनुभव रखने वाले पेशेवरों की भर्ती में 2% की गिरावट आई.
ये आंकड़े बताते हैं कि कुल भर्ती की रफ्तार धीमी रहने के बीच कंपनियां खास हुनर वाले उम्मीदवारों को ज्यादा तरजीह दे रही हैं. इसका असर कर्मचारियों पर सिर्फ नौकरी तलाशने तक सीमित नहीं रह सकता. किसी क्षेत्र में पद कम होने पर कर्मचारियों के पास बेहतर वेतन के लिए कंपनी बदलने या दूसरे नौकरी प्रस्ताव के आधार पर ज्यादा वेतन मांगने के मौके घट सकते हैं.
हालांकि, भर्ती के ये आंकड़े अकेले यह साबित नहीं करते कि एआई कर्मचारियों की मोलभाव करने की ताकत कमजोर कर रहा है. ये उस बदलाव की ओर इशारा करते हैं, जिस पर गौर करना जरूरी है क्योंकि कंपनियां अपनी जरूरत के हुनर और भूमिकाओं का फिर से आकलन कर रही हैं.
रिकॉर्ड में भारत में एआई से जुड़ी 83,100 भर्तियां दर्ज
भारत का अनुभव यह भी दिखाता है कि एआई के असर को केवल नौकरियां जाने की कहानी के तौर पर नहीं देखा जा सकता. ब्लूमबर्ग न्यूज को सबसे पहले मिले नोमुरा के एक रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में एआई से जुड़ी 83,100 भर्तियां दर्ज की गईं. इसके मुकाबले एआई से जुड़ी छंटनी और नौकरी छोड़ने के 31,921 मामले सामने आए.
इन आंकड़ों से पता चलता है कि एआई से नई नौकरियां बनने और पुरानी नौकरियां प्रभावित होने की प्रक्रिया एक साथ चल सकती है. हालांकि, नई भूमिकाओं के लिए उन नौकरियों से अलग योग्यता और अनुभव की जरूरत हो सकती है, जो ऑटोमेशन से प्रभावित हो रही हैं.
मिसाल के तौर पर, किसी कर्मचारी की कस्टमर सपोर्ट वाली भूमिका ऑटोमेट होने पर वह अपने आप एआई इंजीनियरिंग की नौकरी के योग्य नहीं हो जाएगा. हुनर और योग्यता का यह अंतर कुछ कर्मचारियों के लिए नए मौकों तक पहुंचना मुश्किल बना सकता है, भले ही कंपनियां खास भूमिकाओं के लिए भर्ती कर रही हों.
अलग अलग पेशों की डिमांग बदल रहा एआई
एआई डेटा सेंटर की नौकरियों पर आई एक हालिया रिपोर्ट में बिजली मिस्त्रियों, निर्माण कर्मचारियों और एआई से जुड़े ढांचे को सहारा देने वाले दूसरे तकनीकी पेशेवरों की मांग का भी जिक्र किया गया है. इससे पता चलता है कि एआई केवल सॉफ्टवेयर इंजीनियरों या तकनीकी कंपनियों को प्रभावित नहीं कर रहा, बल्कि अलग-अलग पेशों में डिमांड बदल रहा है.
वेतन पर एआई का असर भी इस बहस का अहम हिस्सा हो सकता है. कंपनियां काम की रफ्तार और उत्पादन बढ़ाने के लिए एआई का इस्तेमाल कर रही हैं. ऐसे में वे कर्मचारियों के नतीजों, एआई से मिले जवाबों को समझने की उनकी क्षमता और तकनीक का इस्तेमाल करते समय उनके फैसलों पर ज्यादा जोर दे सकती हैं.
सवाल यह है कि कामकाज में बढ़ी उत्पादकता का फायदा कर्मचारियों को बेहतर वेतन के रूप में मिलेगा या कम लागत और ज्यादा उत्पादन के जरिए मुख्य रूप से कंपनियों को फायदा होगा.
ज्यादा काम करने में मदद करेगा AI
वर्कडे की हालिया ग्लोबल वर्कफोर्स रिपोर्ट के मुताबिक, सर्वे में शामिल 28% कारोबारी नेताओं को उम्मीद थी कि एआई से कर्मचारियों की संख्या घटेगी. वहीं, 40% का मानना था कि एआई मौजूदा कर्मचारियों से ज्यादा काम लेने में मदद करेगा.
इससे एक और संभावना सामने आती है. कर्मचारियों की नौकरी बनी रह सकती है, लेकिन उनसे ज्यादा उत्पादकता की उम्मीद की जा सकती है. उनकी जिम्मेदारियां बदल सकती हैं और प्रमोशन के लिए मुकाबला बढ़ सकता है.
एआई नए मौके पैदा कर सकता है, उत्पादकता बढ़ा सकता है और कारोबार को आगे बढ़ने में मदद कर सकता है. लेकिन इसका फायदा अलग-अलग पेशों, अनुभव के स्तरों और हुनर वाले समूहों में बराबर बंटे, यह जरूरी नहीं है.
कर्मचारियों के लिए चुनौती यह समझने की है कि उनकी भूमिका कैसे बदल रही है और वे ऐसे हुनर कैसे सीखें जो ऑटोमेशन के साथ काम आ सकें. कंपनियों के सामने सवाल यह है कि बढ़ी हुई उत्पादकता का फायदा वेतन, करियर में तरक्की और सीखने के मौकों के जरिए कर्मचारियों के साथ कैसे बांटा जाएगा.
ईसीबी की चेतावनी भारत के बदलते रोजगार बाजार के लिए भी एक बड़ा सवाल खड़ा करती है. काम का भविष्य सिर्फ इस बात से तय नहीं होगा कि एआई कितनी नौकरियां बनाता या खत्म करता है. यह भी अहम होगा कि इस पूरी प्रक्रिया में बेहतर वेतन, प्रमोशन और कामकाजी हालात के लिए कर्मचारियों की मोलभाव करने की ताकत कितनी बनी रहती है.
आजतक एजुकेशन डेस्क